।। दर्द एक गवार का ।।

जब आजादी के सत्तर वर्षों का इतिहास सुनाना होता है।

गिरने लगता लहु बाबू जी दिल तड़प तड़प कर रोता है।

बदलों इन पैमानों को गर विकास का ये पैमाना होता है।

सर्द ऋतु में इन सड़कों पर जो कोई भूखे पेट सोता है।

 

युवा भारत का मैं युवा हूं,

मन के भेद खोल रहा हूं।

मेरा हृदय छलनी हुआ है,

गांव का दर्द बोल रहा हूं।

 

अब सूख रही फूलों की डाली,

कि जैसे उपवन हो बिन माली।

जहां धुलते थे सारे कर्म बुरे,

उसी गंगा को मैली कर डाली।

 

लोकतंत्र को अब चोट लगी है,

भ्रष्ट तंत्र को गहरी सोट लगी है।

तब से न्यायपालिका रोने लगी है,

जब से नेताओं के घर सोने लगी है।

 

साठ साल तक जीत मिली है,

व्यापारियों की प्रीत मिली है।

तब चेहरे पर मुस्कान खिली है।

अगला निशाना सिर्फ दिल्ली हैं।

 

लड़े चुनाव नई पार्टी बनाई।

वंशवाद की नई रीत बनाई।

नकारों में अलख जगाई।

भ्रष्टाचार में सब भाई भाई,

 

अब दिल पर गहरी चोट लगी है,

वोट के लिए बहुत नोट लगी है।

सत्ता की ऐसी होड़ लगी है,

कुर्सी के लिए दौड़ लगी है।

 

जब से कच्चा चिट्ठा खुलने लगा है,

मंदिर मंदिर अब घुमने लगा है।

मंदिर की सीढ़ियां चुमने लगा है,

शिव भक्त बन झुमने लगा है।

 

संजय सिंह राजपूत

बागी बलिया उत्तर प्रदेश

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