अन्धेरे चौराहे पर अन्धा कुआँ

अन्धेरे चौराहे पर अन्धा कुआँ

आज सच में हमारे देश की परिस्थिति कुछ ऐसी ही हो गई है,किसी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा कि सही दिशा में,सही विकास की राह पर कैसे आगे बढ़ा जाये। हर कोई अंधेरे में ही हाथ पांव मारता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस के साठ साल के शासन को पानी पी पी कर कोसने वाले आज प्रचण्ड बहुमत के बाद भी स्वयं को अजीब परिस्थितियों में उलझा हुआ पा रहे हैं। अपने को दूसरों से अलग कहने वाले अपने ही कार्यकलापों से जनता से अलग होते जा रहे हैं। यह तो सभी विपक्षी दलों का दुर्भाग्य है कि वह तथाकथित अपनी अपनी चौधराहट की छोटी बड़ी गठरी व अपने अपने स्वार्थ को ले कर येन केन प्रकारेण” कुछ”

पाने की इच्छा में सलंग्न है। इन्हीं की नाकामयाबियों व बिखराव का फायदा उठा कर अच्छे दिन का झांसा दे कर जो सरकार छह वर्ष पहले दो तिहाई बहुमत से आई ,अब पिछले वर्ष फिर

वही दोहराव होने से इतनी भृमित व आत्ममुग्ध है कि वह अपनी असफलताओं  का ढिंढोरा भी सफलता के गायन के रूप में यूँ पीटती है कि जैसे एक दिव्य पुरुष के नेतृत्व में मानो आसमान को धरती पर ही ला दिया हो।

बेरोजगारी पिछले पचास वर्षों की चरम सीमा पर हैं। लाखों करोड़ों को नौकरियां मिलना तो दूर,इतनों की तो नौकरियां ही चली गईं। जिन किसानों को दुगनी आय का झांसा ही देते रहे औरआज,उन्हीं के लिये बनाये,कृषि कानूनों का लाभ उन्हें सही ढंग से समझा नहीं पा रहे हैं। वही बेचारा मंडी में फसल ला कर,सही दाम मिलने की अभिलाषा में,तकनीकी ज्ञान के अभाव के कारण नित नए सरकारी फरमानों से कुंठित हो कर औने पौने दाम पर बेच कसमसाते हुए अपनी किस्मत को रोता हुआ घर जा रहा है।सुरसा की तरह रोज़ बढ़ती महंगाई ने तो लोगों

का जीना ही दूभर कर दिया है,सब के घरों के बजट गड़बड़ा गये हैं,पहले की जमा पूंजी भी धीरे धीरे खत्म हो रही है,रोज़गार के अभाव में आने वाले कल की सोच कुण्ठाग्रस्त कर रही है,कुछ पेट पालने की खातिर मामूली से वेतन में पूरा समय दे कर काम कर रहे हैं,कुछ को यह भी नहीं मिल पा रहा।

इस वर्ष के शुरू में पूरे विश्व में व्याप्त कोरोना महामारी को हल्के में लेकर मार्च के आखिर में बिना परिणाम की चिंता किये लॉक डाउन को एकाएक पूरे देश पर थोप दिया जिससे हज़ारों,लाखों मज़दूरों ,छोटे व्यापारियों,उद्योगपतियों के आगे रोजी रोटी का संकट छा गया।आवागमन के सभी साधनों पर रोक लगा दी गई, बेचारे मजदूर मरते क्या न करते!मायूस हो सेंकडों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल ही चल दिये, इसमें कितने काल कलवित हो गये,सरकार भी यह आँकड़ा बार बार संसद में प्रश्न करने पर भी नहीं बता पा रही है,गरीबों को तो फिर भी कुछ जगह कुछ मिल गया पर मध्यम वर्ग तो नौकरी व रोजगार,व्यवसाय  छिनने से अभी तक सकते में हैं,उसे तो कोई ढंग का झुनझुना भी नहीं मिल पाया जो उसके जख्मों पर मरहम लगा दे।ऐसी परिस्थितियों से सात माह बाद भी अभी तक देश पूरी तरह उबर नहीं पाया है,अब जब कि कोरोना की रफ्तार बढ़ रही है,सभी कुछ धीरे धीरे खुल रहा है तो  उद्योग,व्यापार में खरीदफरोख्त होने से कुछ राहत मिली है,पर सरकारी पैकेज के प्रोत्साहन  को पाने के लिये इतनी पेचीदगियां है,औपचारिकताएं हैं,जिनके कारण प्रोत्साहन का लाभ सब को नहीं मिल पा रहा है।आज पिचहत्तर लाख के आसपास कोरोना मरीज़ों की संख्या है,एक लाख पन्द्रह के आसपास काल के गाल में समा गये।बस सबसे बड़ी राहत की बात यही है कि 85 प्रतिशत लोग ठीक भी हुई है।केन्द्र द्वारा राहत  देने में अपनी व विपक्षी सरकार का फर्क व फिक्र भी हो रहा है।

कोरोना का सही उपचार नही,कारगर दवाई नहीं,बदलते लक्षण के कारण असमंजस ने आम आदमी के जीवन की दिनचर्या,उसके मनोभावों,भविष्य के प्रति चिन्ता को ही बदल दिया है केंद्र के साथ साथ सभी राज्य सरकारोँ को अपने किये उपायों की सफलता पर ही सन्देह हो रहा है। पूरी निष्ठा,समर्पण,लग्न,सब के

विकास की वास्तविक सोच को आगे रख कर ही कुछ ठोस करना होगा। आश्वासनों की दुकान का शटर तो खुला रख लोगे पर सामान के बिना क्या करोगे ?

अभी हाल ही में हाथरस के एक गांव में जो ह्रदयविदारक घटना घटी,उसमें पहले पुलिस,फिर प्रशासन ने जो सनसनीखेज़ व्यवहार किया,गलतियों पर गलतियां दोहराईं गईं,मानवाधिकार आयोग तथा न्यायालय को खुद संज्ञान लेना पड़ा,सयुंक्त राष्ट्र संघ तक इसकी गूंज पहुँची। गैंग रेप या ऑनर किलिंग या अन्य उच्च जाति के लोगों को फ़ंसाया जाना,सभी राजनीतिक दलों द्वारा घड़ियाली आंसू बहा कर अपनी राजनीतिक ज़मीन तलाशने की कुत्सित लालसा,मीडिया द्वारा व्यापक कवरेज करने से मामला भले ही प्रकाश में आ जाये पर महज़ टी आर पी बढ़ाने  के घिनौने हथकंडे अपनाने से उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना,

जबर्दस्ती परिवार वालों को बिना बताये आधी रात को प्रशासन द्वारा दाह संस्कार करने को हर बार अलग  अलग कारण से सही ठहराना,नैतिकता की धज्जियां उड़ा कर भी अपने को पाकसाफ साबित करना।

सौ करोड़ों के फण्ड से कुछ देशद्रोही संगठनों द्वारा दंगा कराने की साजिश,अपने ख़ुफ़िया तंत्र की असफलता को न मानना,बस अपना  हर हाल में गुणगान कराना,घटना के अत्यधिक सर्वविदित होने पर मुआवज़े का मरहम लगा देना,कुछ पुलिस वालों को निलंबित कर लीपापोती करना,एस आई टी गठित करना,फिर मामले को अपने गिरेबान से दूर करने का स्वांग भर सीबीआई से जांच कराना— जनता इन सब क्रियाकलापों की असलियत को जानती है। बिल्कुल ऐसी ही घटना हाथरस से दो सौ किलोमीटर दूर बलरामपुर में भी घटी पर वहाँ एक आरोपी मुस्लिम समुदाय से था,बड़े छोटे विपक्षी दलों को उसमें अपना हित सधता नज़र नहीं आया तो राजनीतिक पर्यटन की आवश्यकता किसी को भी नहीं हुई।बेचारी पीड़िता वहाँ भी दलित थी व यहाँ भी,भले ही वो दोनों भारत की बेटी थी,पर यहाँ राजनीतिक चश्मा भिन्न था। इस पूरे प्रकरण में हुई भयंकर गलतियों के लिये जिम्मेदार जितनी उत्तरप्रदेश की सरकार है,उससे  कहीं ज्यादा केंद्रीय सरकार।कितना अजीब लगता है यह सोच कर भी कि पिछले दिनों कुछ राज्यों में

ऐसी ही बलात्कार,जलाने व हत्या जैसी बर्बरता पूर्ण घटनाये हुई जहाँ कहीं पक्ष तो कहीं विपक्ष की सरकार है,पर घटना  को गम्भीरता से  लेने का पैमाना, सब का अपने अपने गणित से,अलग अलग होता है,भिन्न भिन्न होता है,उसमें मानवीय संवेदना,एकरूपता,नैतिकता का दूर दूर तक कोई स्थान नहीं होता।

लगता है इस हमाम में हम सब वस्त्रहीन है,एक वस्त्रहीन दूसरे वस्त्रहीन के क्या वस्त्र उतारेगा ?आज एक आम नागरिक तो अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहा है,वह हतप्रभ,निराश,हताश,किंकर्तव्यविमूढ़ है उसे

ऐसा कोई रास्ता दिखाई ही नहीं दे रहा जहाँ वह यह उम्मीद कर सके कि किस अमुक के हाथ मे मैं व मेरा हित व मेरा देश सुरक्षित हैं। काले धन को बाहर लाने का हवाला दे कर नोटबन्दी की गई ,उससे भले ही कितने हवाला कांड हो गए हों पर काला धन बाहर नहीं आया,हाँ बहुतों का काला धन सफेद जरूर हो गया। कुछ हद तक सफलता तो मिली पर अपेक्षित नहीं। जी एस टी को ले कर खुद ही सरकार इतनी बार संशोधन कर चुकी है कि उसका मूल स्वरूप ही खो गया,रोज़ ही इस की आड़ ले कर फ़र्ज़ी कम्पनियां बनाने की खबर आ रही है।भृष्टाचार ने एक नये तरह के शिष्टाचार का रूप ले लिया है,हर विभाग में बदस्तूर किसी न किसी रूप में जारी है,सख्ती व पारदर्शिता के नाम पर उसका पैमाना और भी अधिक विस्तृत हो गया है।

आज हम एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं,जहाँ अंधेरा ही अंधेरा है और उसी चौराहे पर एक कुआँ भी हैं जो गहन अंधकार के कारण दिखाई नहीं दे रहा है,चाहे अनचाहे,एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ लगाए,नैतिक-अनैतिक,सही-गलत,पाप-पुण्य की चिन्ता किये बिना तात्कालिक लाभ को देखते हुए उसमे

गिरते जा रहे हैं,यदि स्वयं को इन सब ने किसी भी तरह नहीं सम्भाला तो सोचो! हम सब का भविष्य क्या होगा! आखिर हम ने ने इन्हीं कर्णधारों के हाथ में देश प्रदेश की सत्ता ही नहीं,अपना भविष्य भी  सौंपा है, अपना कल सौंपा हैं,बरसों से सँजोये सुनहरी सपनों को साकार होते देखने की चाहत सजाई है,पर इन्होंने अपने कार्यकलापों से हमारा आज ही खराब कर दिया।आज हमारे सामने विडम्बना यही है कि अपने नेताका,कर्णधार का, जिसे अपने भविष्य की बागडोर सौंपनी है,उस के चुनाव में, यह तो प्रश्न ही नहीं रह कि वोट अच्छे को देना है या बुरे को,बल्कि यह चयन करना है कि हमारी नज़र में कम बुरा कौन है,ज्यादा

बुरा कौन? शायद चयन का यही आधार बताता है कि हमारे सँस्कार,हमारी नैतिकता,हमारे आचरण जिस पर हमें मान था,गर्व था,अभिमान था,हमारे देश की प्रतिष्ठा विश्व गुरु के रूप में थी, का स्तर किस भयावह हद तक नीचे गिर गया है!

-राजकुमार अरोड़ा गाइड

कवि,लेखक व स्वतंत्र पत्रकार

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