आँसू जो तेज़ाब बन गये

आँसू जो तेज़ाब बन गये

प्रवासी नहीं,ये भारतवासी हैं,सैंकड़ों हजारों किलोमीटर दूर पैदल चलने को मजबूर हैं,इन्हीं को आप राष्ट्र निर्माता कहते हैं,भाग्य विधाता कहते हैं,यही तो आपके मतदाता हैं, जिन्होंने आप को सत्ता तक पहुंचाया है,

यही हैं वो,जिनके बारे में संविधान की प्रस्तावना में लिखा है-“हम भारत के लोग”जिन गाँवो को ये लोग लौट रहे हैं, वे सालों साल बाद भी इन्हें सहेजने लायक तो बनाये नहीं जा सके और जिन शहरों में ये गये थे,उस शहर के दिल में इनकी कोई जगह नहीं, कुछ तो बेचारे बीस-पच्चीस सालों थे वहाँ थे,जिनके पास थे, जिन्होंने इन के द्वारा लाखोँ करोड़ों कमाये वो इनको दो महीने दो जून की रोटी न खिला सके और वो अपनी जमा पूंजी खत्म होते ही,अपने वतन

अपनी मातृभूमि की ओर बिना कुछ विचार किये जरूरत का सामान लिये  छोटे छोटे बालबच्चों समेत निकल पड़े। बेचारे नन्हें नन्हें बच्चे रास्ते में पूछते हैं कि मेला कितनी अभी कितनी दूर है, उन को यही आस बंधा धीरे धीरे चलाया जा रहा है।

रोज़ एक नई हिला देने वाली,झकझोरने वाली तस्वीर सामने आ रही है।

उस दिन तो मेरा दिल रो ही उठा था जब प्रियंका द्वारा भेजी 880 ठीक बसों को भी राजस्थान-

उत्तरप्रदेश के बॉर्डर पर स्वयं अनुमति देने के बाद भी अहं के टकराव में योगी जी ने उलझा दिया।

उन्हीं बसों के आगे से ये बेचारे मज़दूर सैंकड़ो किलोमीटर का सफर कर थकेहारे पैदल ही निकले जा रहे थे,मीडिया टी आर पी बढ़ाने के चक्कर में इन्हीं का इंटरव्यू मार्मिक ढंग से सबसे पहले हम का दमख़म दिखाने में लगा था,कांग्रेस आपके लिये लाख बुरी हो ये मज़दूर तो आपके अपने थे,प्रियंका ने तो यहाँ तक भी कह दिया था,आप इन बसों पर अपने भाजपा के बैनर लगा लीजिये, वो सब बसें वापस  लौट गईं, इन खाली बसों का किराया,डीज़ल सब व्यर्थ,

कुछ हज़ार तो घर पहुंच जाते। मठाधीश से एकाएक सत्ताधीश बने योगी जी,एक गरीब बेबस

मज़बूर का आँसू जब एक सैलाब में बदलता है तो वह तेज़ाब की शक्ल अख्तियार कर लेता है,

तो बड़े बड़े तख़्त पलट जाते हैं।समय की जो परवाह नहीं करता और जो अपने समय को भूल

जाता है, समय आने पर समय उसे सबक सिखा देता है, कभी कभार तो धूल भी चटा देता है। सिर्फ दो से आज तीन सौ दो हो, किसके बलबूते पर इसी पब्लिक के ही न!मत भूलो,ये पब्लिक है सब जानती है।

तुम सब राजनीतिज्ञों ने, चाहे तुम किसी पार्टी के  भी हो,इस बेबस,लाचार मज़दूर को फुटबॉल ही बना दिया है। पंजाब से उत्तरप्रदेश, राजस्थान पैदल चले आ रहे मज़दूरों को तुमने अम्बाला से वापस पंजाब लौटा दिया।

महाराष्ट्र ने मज़दूरों को मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश की सीमा पर छोड़ दिया। दिल्ली भी आखिर कहाँ तक रोकती मज़दूरों को!

यहाँ तो  दिल्ली में ही बैठी केंद्र सरकार नीचा दिखाने के चक्कर में आंखे मूंद लेती हैं। प०

बंगाल की तो इतनी मज़दूर संख्या है, बाहर कि वापस बुलाना मुश्किल हो रहा है और

फिर दोनों पार्टियों में आरोप प्रत्यारोप ही खत्म होने को नहीं आता! इन सब के बीच पिस कौन रहा है?-यही गरीब ,बेबस लाचार,दाने दाने को मोहताज मज़बूर मज़दूर ही न! लगता हैं, अपनी अन्तरात्मा को इन नेताओं ने ऊंची खूंटी पर टांग दिया है, टी वी पर सभी पार्टियों के लोग अपनी बात को तर्क से,कुतर्क से,शोर मचा, ऊंचा बोल, विजयी होने का स्वांग रचते हैं और

ठगी रह जाती है वो जनता जिसने इनको यहाँ तक पहुंचाया,चन्द लोग नेतागिरी चमकाने के लिये बिना मास्क पहने कुछ ही लोगों को मास्क बांट, फ़ोटो करा,प्रिंट व सोशल मीडिया में छा जाने का नाटक कर खुद को भावविभोर कर लेते हैं

ऐसे ही खाना वितरित करने में हो रहा है,कुछ जगह सेवाभाव,परोपकार की भावना से भी यह कार्य हो रहा है और यही तो हमारी भारतीय संस्कृति की अमिट पहचान है।

जो बड़ी बड़ी विदेशी कंपनियां भारत की धरा से करोडों कमा रही थीं, उनमें से कोई अब मदद करने नहीं आया,सरकार हमारी सौ प्रतिशत एफ डी आई करने में लगी है।

कुछ बड़ी बड़ी भारतीय  कम्पनियों ने रिलीफ़ फंडों में योगदान किया है। कुछ  ने अन्य स्तर पर भी किया है। बीस लाख करोड़ के राहत पैकेज में जिस निम्न मध्यम वर्ग के हिस्से में बीस रुपये भी नहीं आये,उसी वर्ग ने अपने आस पड़ोस के गरीब, बेबस मज़दूरों की मदद की है। जो लोग बैंकों का पैसा डकार गये,जिनके खाते एन पी ए हो गये उन्हीं की झोली फिर से भर दी,आखिर ये कैसा तंत्र है। इसी में से नब्बे हज़ार करोड़ रुपये बिजली वितरण कम्पनियों को मिला, जानते हैं!आप उपभोक्ता को क्या मिला? बस दो महीने का सरचार्ज माफ!

मज़दूर के जनधन खातों में मदद पहुंच जाये,अमीर धनाड्य पैकेज का मज़ा ले गये, फंसा कौन? यही मध्यम वर्ग, जिसका तुमने डेढ़ वर्ष का महंगाई भत्ता भी काट लिया,पेंशनर्स को भी नहीं छोड़ा।

हर विपदा में यही मध्यम वर्ग ही बढ़चढ़ कर काम करता है,उसे छोटी सी राहत का झुनझुना दे कर शांत करा दिया जाता है। चलो मध्यम वर्ग की  बलिवेदी पर गरीब मज़दूर की ही मदद तो  कर दो,  वहाँ तो सरकारी राहत की ऐसी बन्दरबांट होती है,वास्तव में जरूरतमंद ही तो रह जाते हैं। यही तो हैं वो जरूरतमंद, बेबस,लाचार जो आज भूखे प्यासे अपने गाँव तक सैंकड़ों मील का सफर कर पैदल जाने को मज़बूर है,उनके पास  कोई चारा नहीं,जानते हैं

गाँव या आसपास कोई संतोषजनक रोजगार नहीं तभी तो पहले इतने हज़ारों मील दूर आये थे,

कुछ तो इतने दुःखी हो गये,बोले वहाँ सौ रुपये ही रोज़ कमा जैसे तैसे गुज़ारा कर लेंगे,पर वापस नहीं आयेंगे।

अभी एक भयावह स्थिति और आने वाली है ,चार पांच माह बाद जब कुछ सामान्य होने लगेगा, बड़े बड़े धनाड्य उद्योगपति मज़दूरों के अभाव में अपना माथा पीटते नज़र आयेंगे,तब इनको अपनी गलती का एहसास होगा कि काश!हमने अपने मज़दूरों का,जिनके बल पर करोड़ों कमाया,चन्द महीने ध्यान रख लेते ! यही हालत कमोबेश पूरे हिंदुस्तान में होने वाली है,

मुम्बई ,दिल्ली जैसे महानगरों में अधिकतर मज़दूर दूसरे राज्यों के ही हैं।

एक विडम्बना यह भी है कि भाजपा अपनी सही आलोचना को भी हज़म नहीं कर पाती,”पार्टी विद ए डिफरेंस” का झूठा तमगा छोड़ने को तैयार ही नहीं,अब चाल, चरित्र, चेहरा वो नहीं रहा,अपनी चन्द सफलताओं का बार बार ढिंढोरा पीटने का क्या फायदा!जनता तो

निरन्तरता व सही सोच सही गति चाहती है।आज भाजपा की आलोचना करना राष्ट्रद्रोह हो गया है, ये लोग अपनी ही प्रंशसा का गुणगान करते नहीं थकते,जब जनता वास्तविकता जान लेती है और कोई परिवर्तन ही नज़र होता नहीं दिखता तो उकता जाना स्वाभाविक ही है और यही उकताहट फिर नया परिवर्तन ही तो लायेगी, नये परिवर्तन की चाह में।

जब भविष्य में कुछ दिखाई न दे तो वर्तमान बुरा और निरर्थक दिखाई देने लगता है, आशा के बिना कोई खिड़की,कोई दरवाजा,कोई फूल,कोई रंग आत्मा को नहीं छूता।

इन मज़बूर,गरीब बेबसों के पैरों के छाले,आँखों में आये आँसू,भूख से बुरी तरह बिलबिलाते पेट जरूर अपना ज़वाब मांगेंगे,बेबस आँसू तेज़ाब की शक्ल में तुम्हें बार बार झकझोरते रहेंगे हम तो पढ़ देख सुन उनकी हालत को अन्दर तक द्रवित,दुःखी और खिन्न हैं, जिन पर यह बीती है, जिन्होंने इस को जिया है, भोगा है और भोग रहे हैं..  उनकी करुण मनोदशा का अंदाजा वही लगा सकते हैं, हम और आप नहीं और ये राजनीतिज्ञ तो बिल्कुल नहीं।

“ये बेबस मज़दूरों के पैरों के छाले,भारत माँ के  मस्तक पर लगे भाले हैं।

अब भी उनकी सुध ले लो,मत भूलो यही तो वतन के असली रखवाले हैं।।

ये ही शान हैं,गौरव हैं, आन और बान हैं,इस पावन पवित्र धरा की।

यही गुरुग्रन्थ हैं,ये ही गीता हैं, यही कुरान हैं और ये ही तो शिवाले हैं।

-राजकुमार अरोड़ा’गाइड’

कवि,लेखक व स्वतंत्र पत्रकार

सेक्टर 2,बहादुरगढ़(हरि०)

मो०9034365672

Special Article नई दिल्ली