आती रहेंगी बहारें : कविता मल्होत्रा

आती रहेंगी बहारें : कविता मल्होत्रा

किसी की वेदना है घर से पीछा छुड़ाने की

किसी की व्यथा है अपने घर लौट जाने की

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बीते साल ने कितना कुछ गँवा दिया ये एक नकारात्मक सोच है।बीते हुए लम्हों ने कितना कुछ सिखा दिया ये एक सकारात्मक सोच है।

कोरोना-काल में कितने ही लोगों के रोज़गार छिन गए, कितने ही लोग अपने परिवार के पोषण की ख़ातिर अपनी आत्मा को गिरवी रखकर पूँजीपतियों के आगे हाथ फैलाने को मजबूर हो गए, इसकी गणना करना बहुत मुश्किल है।

लगभग समूचे वतन की अस्मिता इस समय दाँव पर लगी है।

स्वार्थ सिद्धि की भ्रष्टता अपने चरम पर है।सूरज को गठरी में बाँधकर अपने घर ले जाने की इच्छा ने मानव मन को कितना स्वार्थी बना दिया है न।

नादान वर्ग आज भी इसी जुगाड़ में लगा है कि अगर समूचा

पावर हाऊस ही अपना हो जाए तो रोशनी की हर किरण को टैक्स लगाकर बेचें और ख़ूब दौलत कमाएँ।

जबकि यही तो वक़्त का वो मोड़ है जो मानव को सही दिशा के चयन का चिंतन करने का निशब्द निर्देश दे रहा है।ये और बात है कि जो अपने ही अँदर की पुकार नहीं सुन पाता वो किसी और की आवाज़ क्या सुनेगा।

उच्च शिक्षा के अहँकार में लिप्त मानव, बीज डालकर खेती करना तो सीख गया है, लेकिन सूखे पत्ते में जान डालने का हुनर नहीं सीख पाया।बड़े बड़े भूखँडों का स्वामी तो बन गया लेकिन अपनी ही दूषित मानसिकता का ग़ुलाम बन कर निम्न स्तरीय जीवन को ही श्रेष्ठता की उपाधि दिलाने की ज़िद ठाने बैठा है।

कोरोना वायरस से डर कर उसकी वैक्सीन तो तलाशने लगा है,लेकिन अपने स्वार्थ के विषाक्त विषाणुओं के सँक्रमण को दूर करने की उसे कोई सुध नहीं है।वायरस से बचने के लिए दूसरों को मास्क लगाने की शिक्षा देता है और खुद वायरस का विषाणु बनकर मास्क को ही अपना चेहरा समझने की भूल कर बैठा है।कारण जो भी हो निवारण तो केवल जागृति है।

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पड़े अगर राहों का तम भारी

मत करना खुद से तुम ग़द्दारी

माना हर बूँद साग़र की खारी

रहे तृप्त प्रभु का आज्ञाकारी

अहम का वहम मत रखना जारी

हो हृदय दीप जलाने की तैयारी

सारी सृष्टि की तमस अँधियारी

चमकाना है सूरज की ज़िम्मेदारी

अहँकार है चंद लम्हों का मेहमान

बुलबुला समूचे जीवन का विज्ञान

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एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ ने मानव मन को जीवन मूल्यों से भी पल्ला झाड़ना सिखा दिया है।खुद को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने की तमन्ना ही वो दीवार बन गई है जो सूरज की रोशनी को अपने ही घरों के अंदर आने से रोक रही है।

जबकि कितना आसान है, दिलों की बंद खिड़कियाँ खोल दें और परस्पर प्रेम की रँगोली से सूरज की रोशनी का स्वागत करें।

मानव की क्या औक़ात है कि नूर की एक भी बूँद को ख़रीद कर ला सके।लेकिन उसकी ज़िद हमेशा यही रही है कि कोई बड़ा सौदा करे और अपनी रईसी का बिगुल बजाकर अपनी जय जयकार करवाए।भले ही सारी सृष्टि को अपनी इच्छा से चलाने वाला अदृश्य है लेकिन उसकी सत्ता का न्याय किसी से छिपा नहीं है।

संसार में तो रिश्वतें देकर खुद को सम्मानित करवाया जा सकता है लेकिन उसके न्यायालय में कोई रिश्वत नहीं चलती।परम सत्ता के कटघरे में तो हर किसी को केवल निःस्वार्थ प्रेम की शपथ लेने के लिए ही खड़ा किया जाता है।

तो क्यूँ न इतनी सी बात को समझ लिया जाए और प्रकृति के हर तत्व में छिपा निःस्वार्थ सेवा का क़लमा पढ़ कर परस्पर भाईचारे का संकल्प लिया जाए।एक दूसरे को गिराने की बजाय एक दूसरे को उठाने की कोशिश की जाए।दूसरों को हराने की बजाय खुद की “मैं” से जीतने का प्रयास किया जाए।

मानवता के उत्थान का यही तो एक रास्ता है, जो दिमाग़ की नहीं बल्कि दिल की पगडँडियों से होकर गुज़रता है।

कितनी भी आँधियाँ आएँ, कितने भी तूफ़ान आएँ, लेकिन अगर मानव, जीवन मूल्यों को समर्पित जीवन का संकल्प ले सके, तो हर मौसम, बहारों का ही मौसम होगा और रब की रज़ा में रहने के प्रसाद स्वरूप विकराल आपदाओं के बावज़ूद बहारें आती रहेंगी।

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