उपहारों को रिगिफ़्ट कीजिए और एक नए अंदाज़ में मनाइए पर्यावरणहितैषी दीपावली

उपहारों को रिगिफ़्ट कीजिए और एक नए अंदाज़ में मनाइए पर्यावरणहितैषी दीपावली

पिछली दीपावली पर सूरत से एक वयोवृद्ध लेखिका ने मुझे दीपावली का एक ग्रीटिंगकार्ड भेजा जो डाक से आया था। आजकल डाक से ग्रीटिंगकार्ड भेजने का प्रचलन नहीं रहा लेकिन मैं इस वजह से ये चर्चा नहीं कर रहा हूं कि डाक से ग्रीटिंगकार्ड आया अपितु चर्चा का कारण है कि ये ग्रीटिंगकार्ड उनके पास किसी और जगह से आया था और उन्होंने उसमें अपेक्षित बदलाव करके मुझे भिजवा दिया था। इस पर उन्होंने अपने हाथ से सुंदर पेंटिंग भी की थी। लिफाफे पर भी मेरे पते का नया स्टीकर चिपकाकर अपेक्षित नए डाक टिकट लगा दिए गए थे। इससे भेजनेवाले की भावना में कोई कमी नहीं आई अपितु एक उपयोगी संदेश भी मिल गया। इस प्रकार के पत्र या पैकेट मुझे पहले भी मिलते रहे हैं और उनसे प्रेरित होकर मैंने भी असंख्य लिफाफों को पुनर्प्रेषित किया है।

     मेरे पास हर महीने सैकड़ों की संख्या में पत्र-पत्रिकाएं आती हैं। पुस्तकें पढ़ने का ही नहीं खरीदकर पढ़ने का शौक भी मुझे कॉलेज के समय से ही रहा है जो आज तक बना हुआ है। आजकल मैं पढ़ने के बाद अधिकांश पत्र-पत्रिकाएं व पुस्तकें अपने उन परिचितों को दोबारा पोस्ट कर देता हूं जो दूर दराज के क्षेत्रों में रहते हैं और पढ़ने में जिनकी रुचि है। आज संपूर्ण विश्व में बढ़ते हुए ग्लोबल वॉर्मिंग को देखते हुए पुनः उपयोग करने योग्य वस्तुओं को बेकार पड़े रहने देना या फेंकना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता अतः ऐसे में ये प्रयोग अत्यंत उपयुक्त एवं व्यावहारिक है और दीपावली के अवसर पर अन्य गतिविधियों के लिए भी इसका लाभ उठाया जा सकता है। दीपावली व अन्य अनेक अवसरों पर उपहारों के आदान-प्रदान की परंपरा भी काफी पुराने समय से चली आ रही है।

     दीपावली पर हम सब प्रायः अपने मित्रों व संबंधियों को उपहार भिजवाने के लिए जमकर ख़रीददारी करते हैं। अन्य लोग भी हमें इसी प्रकार से उपहार भेजते हैं। कई बार हमारे पास बहुत सारे उपहार इकट्ठे हो जाते हैं और सालों अलमारियों में बंद पड़े रहते हैं क्योंकि उन उपहारों का हमारे लिए कोई उपयोग नहीं होता। क्या ही अच्छा हो यदि हम उनको रिगिफ़्ट कर दें। इससे हमारे बजट पर भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और हम अनुपयोगी चीज़ों के निरर्थक संग्रह करने से भी बच जाएंगे। कई बार तो ऐसा होता है कि हम अनुपयोगी चीज़ों के इस निरर्थक संग्रह के कारण अपनी ज़रूरी चीज़ें भी ठीक से नहीं रख पाते। बेकार चीज़ें अलमारियों में सजी रहती हैं और काम की संग्रहणीय वस्तुएँ इधर-उधर पड़ी धूल चाटती रहती हैं। प्रायः लंबे समय तक रखे रहने से पुराने सामान की पैकिंग के डिब्बों में घातक बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक होते हैं।

     आपने नोट किया होगा कि जब भी हम पुराने सामान अथवा किताबों की अलमारियां खोलते हैं तो उसमें से एक ख़ास क़िस्म की गंध आती है जिससे हमें छींके आने लगती हैं और जुकाम हो जाता है। कई बार इससे परिवार के सभी सदस्य संक्रमित हो जाते हैं। वस्तुओं का संग्रह न करना और उपहारों को रिगिफ़्ट करना हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी अनिवार्य है। वैसे भी अपनी ज़रूरत से बहुत ज़्यादा वस्तुओं का संग्रह करना एक दोष या विकार अथवा पाप ही है। रिगिफ़्टिंग द्वारा न केवल अपरिग्रह का पालन संभव होगा अपितु हर वस्तु का अधिकतम उपयोग भी सुनिश्चित हो सकेगा जो धरती को ग्लोबल वॉर्मिंग से बचाने का भी एक कारगर तरीक़ा है। हम जितनी ज़्यादा वस्तुओं का उपभोग करेंगे या उन्हें नष्ट हो जाने देंगे उतनी ही अधिक वस्तुओं का उत्पादन करना पड़ेगा।

     उत्पादन का सीधा प्रभाव प्रकृति व अन्य संसाधनों के दोहन पर पड़ता है जो धरती के स्वास्थ्य के लिए बड़ा ख़तरा है। धरती को मनुष्य व अन्य जीव-जुतुओं के रहने लायक बने रहने देने के लिए संसाधनों व तैयार उत्पादों का विवेकपूर्ण उपयोग अत्यंत आवश्यक है। कई बार हम अपने लिए कपड़े या शर्ट-पेंट आदि के पीस ख़रीद कर लाते हैं लेकिन हमें पसंद नहीं आते अतः हम उन्हें सिलवाते भी नहीं। ऐसे कपड़ों के ढेर लग जाते हैं। ऐसे कपड़े किसी ज़रूरतमंद को गिफ़्ट कर दिए जाएं तो कितना अच्छा हो? यदि हमारे पास बहुत पैसा है और हम उसका अनाप-शनाप इस्तेमाल करते हैं और बिना ज़रूरत के बेकार की ढेर सारी चीज़ें ख़रीद कर डाल देते हैं तो भी यह संपूर्ण विश्व के प्रति अक्षम्य अपराध है। हमें बेतहाशा उपभोग पर अंकुश लगाकर बढ़ते उपभोक्तावाद के चंगुल से निकलने का प्रयास करना चाहिए। रीगिफ़्टिग द्वारा भी हम इस समस्या को कुछ कम कर सकते हैं।

     कुछ लोग कहते हैं कि यदि हम कम वस्तुओं का उपभोग करेंगे तो इससे असंख्य लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित होगी। यह बात कुछ हद तक ठीक है लेकिन इस रोजी-रोटी के लिए ज़रूरी तो नहीं कि हम त्योहारों पर पटाखें चलाएं और जी भरकर शराब पीएं-पिलाएं। इनसे भी असंख्य लोगों की रोजी-रोटी चलती है और शराब जैसी चीज़ों का उत्पादन सरकार की आय का भी बहुत बड़ा स्रोत है। इस दुष्चक्र से कभी न कभी तो निकलना ही पड़ेगा। अपरिमित उपभोग ही हमारी अधिकांश समस्याओं और ग्लोबल वॉर्मिंग अथवा बेतहाशा बढ़ते प्रदूषण का प्रमुख कारण है अतः इस पर समय रहते विचार करना हमारे अपने ही हित में होगा। अब संभव है कि हमें जो उपहार मिलें हैं उनमें से कुछ चीज़ें हम मित्रों और रिश्तेदारों को देने लायक न समझें। यदि ऐसी चीज़ें हैं जो न तो मित्रों और रिश्तेदारों को ही दी जा सकती हैं और न हमारे ही किसी काम की हैं तो उनको रखकर भी हम क्या करेंगे?

     जो चीज़ें सालों से रखी हैं आजतक हमारे काम नहीं आ सकीं वो चीज़ें आगे कुछ काम आ सकेंगी यह संभव ही नहीं। लेकिन हर चीज़ किसी न किसी के लिए तो उपयोगी हो ही सकती है। अतः आपके पास जितने भी पुराने उपहार रखे हैं और जो नए आते हैं उन सबको किसी न किसी को रिगिफ़्ट करते रहिए। दीपावली अथवा अन्य अनेक अवसरों पर बहुत से लोग हमसे कुछ लेने की उम्मीद रखते हैं और हम प्रायः अधिकांश को कुछ रुपए देकर टरका देते हैं। घर में सालों से रखे उपहारों व अन्य अप्रयुक्त सामान को निकालकर उसे दोबारा अच्छे से पैक करवा लीजिए या स्वयं कर लीजिए और इस बार जो भी घर आता है सबको कुछ न कुछ उपहार भी अवश्य दीजिए। इससे लेने वालों से ज़्यादा ख़ुशी हमें मिलेगी। ख़ुशी के लिए ही तो हम विभिन्न पर्वों और तीज-त्यौहारों का आयोजन करते हैं। इस नेक कार्य के लिए दीपावली से अच्छा अवसर हो ही नहीं सकता।

सीताराम गुप्ता,

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