कभी भी करो-ना तेरा-मेरा

कभी भी करो-ना तेरा-मेरा

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी

फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

पिछले काफ़ी समय से ये जुमला जनमानस की मानसिक अवस्था की सटीक अभिव्यक्ति बना हुआ है।जिसका एकमात्र कारण है – “मैं और मेरी खुशी”! लगभग हर व्यक्ति मैं-मेरी के कोरोना से ग्रस्त है, जिसके चलते,परस्पर भेदभाव की प्रतिस्पर्धा बाज़ारों से अब हर दिल की दहलीज़ पर उतर आई है।

अब देखिए न, दादी और नानी के घरों के रोबोटिक विकल्प हमारी भावी पीढ़ी की नस्ल को सँवेदना रहित रोबोटज़ में ही रूपाँतरित करते जा रहे हैं।

आज हर कोई एक दूसरे पर स्वामित्व जता कर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है।लेकिन प्रकृति भला कब किसी को दूसरा अवसर देती है!

आज जब पूरा विश्व करोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है, एैसे में निश्चित टरमिनेशन की सूचना पाकर भी कोरोना ग्रस्त रोगियों को आइसोलेशन में रखने का निर्णय क्या सँवेदहीन सभ्यता के उदय की घोषणा नहीं करता?

दीवारें दिलों में बनने लगी हैं

और घर सब मकान होने लगे

क़ब्रों में ही सुकून पाते जिस्म

रिश्ते अब शमशान होने लगे

एै करोना ले ही चल उस ओर

मन बजरँगी तन राम होने लगे

साँसों के चलने को जीवन कब कहते हैं, जीवन तो मनुष्य के कार्मिक तत्वों का आधार है जो किसी भी जीवन को अर्थ देकर सार्थक बनाता है।

प्रकृति के सुर से ताल मिलाने में ही मानव जीवन की सार्थकता है।मौसम का परिवर्तन किसी से सहन हो या न हो मग़र ये तो  सच है कि प्रकृति के इस नियम को सभी को स्वीकृति देनी ही पड़ती है।तो क्यूँ न स्वार्थ सिद्धि की राह पर चलती असभ्य जीवन शैली के लक्ष्य को ही रूपाँतरित करने का प्रयास किया जाए!

साझे चूल्हों की महक से, हर रसोई गुलज़ार रहे

कोई करे न कभी तेरा मेरा,सबमें परस्पर प्यार रहे

करोना का सँदेश यही, दिलों में ना हैवानियत हो

सब भेदभाव मिटें, मज़हब सभी का इँसानियत हो

जो क़ायदे, अपने-अपने खुदा गढ़ कर अपने-अपने देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की अराधना करने के लिए,अलग-अलग पूजाघरों का सृजन करने लगें,हम एैसा कोई भी सबक़ न तो खुद पढ़ें और न ही किसी को पढ़ाएँ।

करोना चाहता फिर से वही सवेरा

सब जग अपना,करो-ना तेरा-मेरा

एक दूसरे पर परमाणु या जैविक हमले करके एक दूसरे पर अपना स्वामित्व साबित करने के लिए, किसी भी राजनीति की कोई भी काग़ज़ी नाव,कभी किसी भी देश को विकास की मँज़िल पर नहीं पहुँचा सकती, इसलिए अपने अँदर सोए सारथी को जगाएँ और अखँड भारत की ज्योति जलाकर वैश्विक एकता के लिए एक जागृत आत्म-सत्ता की मिसाल बनें।

प्रकृति के साथ खिलवाड़ का,देख लीजिए नतीजा

कोरोना की चपेट में, समभाव से सब भाई-भतीजा

कोई राजनैतिक अखाड़ा नहीं,ये जीवन है अनमोल

परम सत्ता सिखाना चाहे सबको, प्यार के दो बोल

साँझे चूल्हे फिर से महकें,कोरोना वायरस दे सँदेश

प्रकृति माँगे सबसे ऋण,चाहे बसे कोई देश-विदेश

शॉपिंग मॉल,मूवी थिएटर,पब-बार,छोड़े सब जनता

वास्तविक उत्सव सिर्फ वही,जो अपनों सँग है मनता

दादी-नानी के सूने हैं जो आँगन,सब बस उठें दोबारा

कोरोना का क़हर नहीं, परस्पर प्रेम का है ये इशारा

एक-दूजे के लिए रखें,हर जगह की सब चीज़ें साफ़

बिन भेद अपनाएँ सबको,करके सबकी ग़ल्तियाँ माफ़

चहके हर दिशा सोने की चिड़िया,आए फिर वो सवेरा

कोरोना चाहे, समझें सब जग अपना, करें न तेरा-मेरा

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कविता मल्होत्रा

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