कमल में कीचड़

कमल में कीचड़

कमल कीचड़ में ही खिलता है, जब भाजपा अस्तित्व में आई, अपने चुनाव चिन्ह’कमल’को लेबढ़ चढ़ कर यही दावा करती रहीहम अब तक व्याप्त राजनीति के दलदल में,कीचड़ में,कमल की तरह ऊपर है, अलग है, पार्टी विदए डिफरेंस है बस कुछ समय तकऐसा आभास कराया, जब दो सेचौरासी ,फिर एक सौ बियासी, दो सौ बहत्तर अब तीन सौ तीन। इससफर में यह कीचड़ में कमल नहींरहा,अब कमल ही पूरा कीचड़ में धंस गया है।जिस कांग्रेस की सभीबुराइयों को कोसते वो थकते नहींनहीं थे,अब उन सभी कमियों को,बुराइयों को अपने मे आत्मसात कर लिया है।लम्बे समय से उच्चआदर्शों की अनवरत हुंकार भरनेवाली भाजपा काफी हद तक कांग्रेसमय हो गई है। पिछले बीसवर्षों में सत्ता के मोह,लालसा एवंललक में सिद्धान्तों, मूल्यों औरनैतिकता,विश्वास,ईमानदारी कोताक पर रख दिया है। भाजपा कीकुटिल चालों को आजकल हममध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव मेंगोटी फिट करने व सरकार गिरानेके हथकंडों के रूप में देख रहे हैं।जो ज्योतिराजे सिंधिया कांग्रेस में18 साल में से 17 साल सांसद थे10 साल मंत्री रहे,पार्टी के राष्ट्रीयमहासचिव भी रहे,पिछली बार गुना से लोकसभा चुनाव में हार गए पर विधानसभा के चुनाव मेंखूब मेहनत कर,भाजपा के पन्द्रहसाल के शासन को उखाड़ कांग्रेसको सत्ता दिलाई,कमलनाथ को सी एम बनाया जाना रास नही आया,18 महीने बाद अपनी हीसरकार को गिराने की पटकथा लिख दी। 22  समर्थक विधायकोंको बंगलौर एक रिसोर्ट में ले गए,खुद भाजपा में शामिल हो कर राज्यसभा की टिकट हथिया ली।अब विधानसभा में राजनीति कीशतरंज खेली जाएगी। मुख्यमंत्री न बन पाने का बदला अब खुद केद्वारा बनाई गई सरकार को गिरा कर लेंगे। अब ये लोकतंत्र की हत्या नहीं तो क्या है? इस हत्या का लाइव टेलीकॉस्ट पिछले चारदिन से दिखाया जा रहा है, अभीतो कुछ दिन और चलेगा। टी वीचैनलों को तो टी आर पी बढ़ानेसे मतलब है, चटखारे ले ले करमज़ेदार खबरें परोसी जा रहीं हैंऔर लोकतंत्र बेचारा नैतिकता कीधज्जियां उड़ते देख कहीं कोने मेंसिसकियां ले रहा है।
भाजपा के आने के बाद रिसोर्ट संस्कृति बढ़ी है। हम पहले यहनज़ारा गोवा,मणिपुर, कर्नाटक,उत्तराखंड में देख चुके हैं। घोड़ोंकी तरह बिकाऊ हो गए है हमारेमाननीय सांसद और विधायक।जहां भाजपा को सरकार गिरानी होती है, वहाँ के मुख्यमंत्री के निकट सहयोगियों के खिलाफ छापेमारी करा देते हैं, कर्नाटक केडी शिवकुमार इसके उदाहरण है।जिन रिसोर्ट्स में ये दोनों पार्टियों के विधायक ठहरे हैं, वहां का एकरात का किराया बीस से पच्चीसहज़ार रुपए है। यह कई लाखोंका खर्चा कहाँ से आ रहा है, यहजनता के पैसे की बर्बादी है। गरकोई और कर रहा है, तो वह कईगुणा कीमत वसूलेगा बाद में।अब बताओ देश के कर्णधारों ये कैसा लोकतंत्र है?आने वाली पीढ़ियों को ये क्या संदेश दे रहे होबिकाऊ लोकतंत्र में कदम कदम पर धोखा है, कुटिल चाल है, साथचल रहे विधायक पर भी भरोसा नही है। शुचिता व नैतिकता कादावा करने वाली भाजपा को अपने विधायकों पर भरोसा नहींतभी तो सारे विधायकों को भोपाल से गुरुग्राम के एक महंगे रिसोर्ट में  हिफ़ाज़त,छानबीन केमाहौल में रखा हुआ है, उधर  कमलनाथ जी ने अपने बाकी बचेविधायकों को जयपुर के महंगे होटलों में ठहरा रखा है व इधर कांग्रेस के बागी विधायक आज भोपाल आते आते एयरपोर्ट से हीबंगलोर अपने उसी रिसोर्ट में चलेगए,जहां भाजपा इन कोहेनूर हीरों की हिफाज़त कर रही है, आखिर यही हीरे भाजपा कोसत्ता में लायेंगे। क्या विडम्बनाहै, कोई तुम्हारी पार्टी में आ जायेतो घर वापसी है, ह्रदय परिवर्तनहै, छोड़ कर चला जाये तो पीठ में छुरा घोंप दिया,ग़द्दार है, मीरजाफर है,जयचंद है। ऐसा ही कहना हर बार हर दल का होता है।
जिस निरीह जनता ने 18 माह पहले इनकोचुना था, वो बेबस हो कर सिर्फतमाशा देखने के अलावा और क्या करे?इस हमाम में सब नग्नहै, कौन किस को दूध का धुलाबताएगा। गर इतने ही नैतिकबनते हो सदन की सदस्यता वपार्टी से  इस्तीफा दे कर आओदोबारा चुनाव में। दूसरे की थालीमें टुकड़े फैंक थाली हथियानाछोड़ दो ,यही पीछे बिहार में हुआइससे पहले हरियाणा में दूल्हे  भजनलाल जी पूरी की पूरीबारात ही ले कर जनता पार्टीछोड़ कांग्रेस में चले गये थे। तबसे ये दलबदल एक बार कानून मेंसंशोधन होने के बाद भी आजभी यह कोरोना से भी ज्यादाखतरनाक बीमारी साबित होरहा  है।
राजनीति के कुत्सित व घिनोने खेल में हर बार बराबर का भागीदार होने के अतिरिक्तआदर्शों का ढिंढोरा पीटने वालीभाजपा सरकार कानून व अर्थव्यवस्था दोनों क्षेत्रों में  भी कोईसन्तोषजनक सुधार नहीं लापाई। बेरोजगारी की दर पिछले45 वर्षो में सब से ज्यादा है, यसबैंक को धराशायी करने वाले अनिल अम्बानी, सुभाष चन्द्रा,डी एच एफ़एल  जहां 42000 करोड़ में से 26000 करोड़ रुपये का एन पी ए इन्ही का है और येभाजपा के नजदीकी हैं, एक तोराज्यसभा के भाजपा सांसद हैं।सी ए ए की ढाई महीने से धीरेधीरे सुलगती आंच को भांपनेमें फिर सहसा भड़के दिल्ली केदंगो में जहाँ 53 लोगों की मृत्युहुई ,सेंकड़ों करोड़ो की सम्पत्तिस्वाहा हो गई,को पहले रोक पानेमें पूरी तरह असफल रही। देश, राष्ट्र पर  राजनीति हावी हो गई। प्रचण्ड बहुमत के मद मेंराजधर्म निजी स्वार्थ पर कुर्बानहोता रहा। सिर्फ कांग्रेस के शासनको कोस कर कब तक राजनीतिकी रोटियाँ सेंकते रहोगे अब छह साल हो गए,कुछ तो ऐसा कर केदिखा दो, हम यह मान ले कुछ नया घट रहा है, अभी तो नाम ही बदला लगता है, नीतियाँ वकुरीतियां तो कांग्रेस वाली हैं।
आज देश की जनता एक ऐसेचौराहे पर खड़ी है, उसे रस्ता नहीसूझ रहा किस पर और कैसे  विश्वास किया जाये। हर बार वहझूठे नारों के झांसों में आ कर छल ली जाती है।जनता की परवाह नकरने  वालों को जनता ही मौकामिलते ही उखाड़ फेंकती हैं। पर तब बहुत ही मुश्किल हो जाती है, जब दूसरा भी शुरू शुरूमें  सब्ज़बाग  दिखाता है,आदर्श व नैतिकता का उदघोष कर कुछसमय बाद फिर पहलों के जैसाही आचरण करता है, तब जनता,जो बेचारी एक मतदाता है, जिसके मत से सत्ता में आये उसीको ही धता बता देते हैं, वह अपनेको ठगा सा समझ पूरी तरह सेकिंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है, उसेसमझ ही नहीं आता वो क्या करे।लोकतंत्र की मजबूती के लिये एक मज़बूत विपक्ष का होना जरूरी है, राजनीतिज्ञों द्वारा इसप्रकार का आचरण असन्तोष कोजन्म देता है, इस की आंच में सेकोई युवा पीढ़ी में से ही कोई आवाहन करता  कोई मसीहा जरूर आएगा,जो नए युग का सूत्रपात करेगासम्भावनाओं का कभी अंत नहींहोता वो तो  अनन्त हैं बस उन्हेंएक एहसास की जरूरत है कि  “हम उफनती नदी हैं, हमको अपना रस्ता मालूम है, हम जिधरभी चल देंगे,रस्ता अपने आप बन जायेगा”।-राजकुमार अरोड़ा’गाइड’कवि,लेखक व स्वतंत्र पत्रकार

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