कांग्रेस: क्या से क्या हो गए

कांग्रेस: क्या से क्या हो गए

(राजनीतिक सफरनामा) कुश्लेन्द्र श्रीवास्तव

वैसे तो अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को मालूम रहा ही होगा कि वे जब अपनी किताब में भारतीय नेताओं के बारे में लिखेंगें तो हंगामा तो होगा ही । अब वे भले कहते रहें ‘‘हंगामा खड़ा करना मेंरा मकसद नहीं’’ पर हंगामा हो ही गया । कांग्रेस तो बहुत दिनों से ‘‘पनौती’’ ढूंढ़ रही है । बराक ओबामा भले ही पनौती का मतलब न जानते हों पर उन्होने हिन्ट तो दे ही दिया है । ‘‘तुझे मिर्ची लगे तो मैं क्या करूं’’ टाइप का हिन्ट । इस हिन्ट को जिन लोगों को समझ लेना चाहिये था उन्होने समझ ही लिया और फिर ‘‘हंगामा है क्यूं बरपा’’ की नाराजगी में आ गए । वैसे भी अब उनकी नाराजगी के कोई ज्यादा मतलब रह ही नहीं गए हैं । कांग्रेस में  हर कोई तो नाराजगी का बाना पहने घूम रहा है । कांग्रेस के अन्दर नाराजगी है और बाहर भी नाराजगी है । बुरे दिन आते हैं तो ऐसा ही होता है । बुन्देलखंड में कहावत है कि ‘‘हाथी फंस ओ कीच में मेढक मारे लात’’ । जो लोग कभी गांधी परिवार के खिलाफ आवाज उठाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे वे अब उन्हें नसीहत देने के काम पर लग गये । उनके पास भी कोई काम है ही नहीं । एक समय था कि कांग्रेसियों को फुरसत नहीं मिलती थी, बड़े नेता छोटे नेता से बात नहीं करता था और छोटा नेता कार्यकर्ताओं को अनदेखा और अनसुना कर देता था पर अब सभी के पास फुरसत ही फुरसत है । ‘‘बैठे-बैठे क्या करे करना है कुछ काम’’ तो आलोचना करना और नसीहत देना शुरू कर दिया । वे जिन्होने कांग्रेस को इस हालत तक पहुंच जाने दिया वे अब मुंह खोलकर बता रहे हैं कि कांग्रेस में क्या-क्या कमी हैं । जिन्हें बता रहे हैं वे सुन ही नहीं रहे हैं । उन्हें अपने धरातल को ज्ञान ही नहीं हैं वे तो अभी भी हवा में ही उड़ रहे हैं ।  रही सही कसर ओबाम ने पूरी कर दी । अब यह तो कोई नहीं कह सकता है कि ओबामा ने जो कहा वह कितना सच है पर इतना जरूर है कि बहुत सारे और विशेषकर भाजपा वाले जो कहते रहे हैं उससे यह सच मिलता-जुलता अवश्य है । भाजपा वालों का सीना चैड़ा हो गया ‘‘देखो हम तो सालों से यही कहते आ रहे हैं अब ओबाम ने भी कह दिया’’ । वे मुंह घुमाकर नहीं मुंह सीधा कर हंस रहे हैं । उनके हंसते हुए चेहरों से झुंझलाए कांग्रेस के नेता भी घुमाफिराकर इस सच को स्वीकार करने की कोशिश करने लगे हैं । वे ‘नर्वस नेता हैं’’  कई बिन्दु उदाहरण के रूप में सामने रखे जा सकते हैं ।  पर ऐसा नहीं हैं कि नर्वस से दूर होने का कोई इलाज न हो पर इसके लिए इस सच को पहले स्वीकार तो करना ही होगा । बिहार के चुनाव में कांग्रेस को कम सीटें मिलने का ठीकारा भी उन्हीं पर फोड़ दिया गया । एक अकेले व्यक्ति से इतनी बड़ी कांग्रेस तबाह नहीं हो सकती इसके लिए बहुत सारे लोगों का योगदान होना जरूरी है पर जिन लोगों ने भी इसमें योगदान दिया है वे भी ठीकरा एक ही जगह फोड़ रहे हैं । मध्यप्रदेश की अच्छी भली सत्ता गंवा देने के बाद और राजस्थान में चमत्कारीक ढंग से सत्ता बच जाने के बाद चिन्तन तो किया ही जाना चाहिए था कि ‘‘हम से क्या भूल हुई’’ पर चिन्तन कौन करे इस पर चिन्तन हो रहा है । जिनको चिन्तन करना चाहिए वे नर्वस हैं जो नर्वस नहीं हैं वे चिन्तन करने की बजाए ठीकरा फोड़ने के खेल में लगे हैं । वह उदाहरण नहीं सुना कि जिस डाल पर बैठे हो जब उसी डाल को काट दोगे तो खुद भी तो गिरोगे । अब भाजपा मे इतना खाली स्थान तो है नहीं कि सारी कांग्रेस को वे समेट सकें और समेटेगें भी तो ‘‘कृप्या क्यू में आईये’’ के बोर्ड के साथ आपको पीछे लगा देगें । कहां तो आप कांग्रेस में दूसरी-तीसरी लाइन के नेता माने जाते रहे हो वहां भाजपा में आप अंतिम पंक्ति के आयाती नेता हो जाओगे । पर कोई नहीं सोच रहा है । सभी लोग  अपने ही जहाज को डुबाने में लग गये हैं । हाईकमान तो वैसे भी उसनींदी पोजीसन में है ही पर जो जाग रहे हैं वे भी सोये होने का अभिनय करने में लगे हैं । बिहार  में तो खैर पूरे चुनाव थे ही जहां कांग्रेस ने अपनी औकात से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा भी पर नतीजा पिछलीबार से ज्यादा खराब दिखाई दिए । चिन्तन तो करना ही होगा कि ऐसा क्यों हो गया । गुजरात और मध्यप्रदेश में तो उनकी ही पार्टी से दलबदल चुके नेताओं के कारण खाली हुई सीटों पर उपचुनाव हुए पर इनमें भी कांग्रेस को पराजय का समाना करना पड़ा । चिन्तन तो करना ही होगा । पर चिन्तन करे कौन सोये हुए लोग चिन्तन नहीं कर सकते और वे लोग जो सोने का नाटक कर रहे हैं चिन्तन वे भी नहीं कर सकते । मतलब साफ है कि जो हो रहा है वह होते ही रहना है और जो होते रहना है उसमें पराजय का स्थाई निवास बन गया मान लिया जाना चाहिये । भगवान भरोसे सब हैं कांगेसी कुछ ज्यादा ही भगवान के भरोसे में हैं । उन्होने गीता का ज्ञान प्राप्त कर लिया है ‘‘तू क्या लेकर आया था और तू क्या लेकर जाने वाला है’’ । पर जो चले जायेगें उनके बाद जो शेष रहेगें उनको तो भगुतना ही है वे भुगतेगें । वे फिर से धुले-धुलाये कुरता-पायजामा पहनकर भाषण देते नजर आयेगें और उनमें से ही बहुत सारे लोग अपने ही नेताओं की आलेचना करते दिखाई देगें । यही वर्तमान है और इसी वर्तमान में कांग्रेस का भविष्य भी दिखाई दे रहा है । भाजपा की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं । वे देश की सर्वमान्य पार्टी के तमगे के साथ सीना चैड़ा किए खड़े हुए हैं ‘‘जो हमसे टकरायेगा चूर-चूर हो जायेगा’’ । टकराने वाले में इतनी दम ही नहीं बची है कि वह सामने वाले का सीना चूर-चूर कर सके । भारत में चुनाव तो होते ही रहते हैं । आज इस राज्य में तो कल दूसरे राज्य मेें । बिहार निपटा तो पश्चिम बंगाल की बारी है । कांग्रेस वहां भी केवल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करेगी । संघर्ष का परिणाम सभी जानते हैं पर उनको करना होगा । वे अपनी पार्टी की मूल समस्या को अनदेखा कर चुनाव लड़ते हैं । मूल समस्या तो संगठन का जीवंत न होना ही है । जब कार्यकर्ता नहीं होगें तो चुनाव में सफलता मिलेगी कैसे । कार्यकर्ता तब होगें जब संगठन मजबूत होगा । संगठन है ही नहीं केवल नेता है वे नेता जिन्हें चुनाव लड़ने के लिए टिकिट चाहिए । जिसको टिकिट मिल जाती है वह काम पर लग जाता है और जिसे टिकिट नहीं मिलती वह काम बिगाड़़ने में लग जाता है । पार्टी से किसी को कोई मतलब नहीं है । समस्या यही है और बहुत बारीक समस्या नहीं है जो किसी को दिखाई ने दे रही हो पर सभी अंधे होने के अभिनय में लगे हैं । आम मतदाता की चिन्ता यह है कि मजबूत विपक्ष विकास को राह इिखाता है और विपक्ष विहीन सत्ता विवेकहीन हो जाती है । भविष्य में ऐसे नजारे देखे भी जा सकेगें ।

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