(कारगिल युद्ध  26 जुलाई ) विजय दिवस

(कारगिल युद्ध 26 जुलाई ) विजय दिवस

कर्नल सारंग थत्ते ( सेवा निवृत्त )

           26 जुलाईहर वर्ष इस दिन पूरे देश में विजय दिवस मनाया जाता है. यह युद्ध हम पर थोपा गया था और यह पाकिस्तान की सोची समझी साजिश थी, जब एक तरफ हम बस डिप्लोमसी में व्यस्त थे तब जनरल मुशर्रफ अपने युद्ध के नक्शे पर काम कर रहे थे. खुफिया जानकारी की विफलता के चलते सही आकलन करने में भारतीय सेना को जबरदस्त कीमत चुकानी पड़ी थी. पाकिस्तान ने लगभग 3000 मुजाहिदों को सेना की चौकियों में भेजा था. तब भारत का स्वयं का कोई उपग्रह मौजूद नही था इसलिए भी हम खुफिया जानकारी से वंचित रह गये थे.

    इस युद्ध में भारतीय सेना ने घुसपेठीयों को खदेड़ने के लिए लगभग पाँच इंफेंट्री डिवीजन, पाँच स्वतंत्र ब्रिगेड, 44 अर्ध सैनिक बलों की बटालियन और अन्य यूनिटों ने अपने दमखम तथा वायु सेना की मदद से हिम-आच्छादित कारगिल की विभिन्न चोटियों से पाकिस्तान के मंसूबो को ध्वस्त कर दिया था. भारत ने इस थोपी हुई जंग की कीमत जरूर चुकाई, लेकिन समय रहते सभी चौकियों को वापस अपने कब्ज़े में करने में भारतीय सेना को सफलता मिली.

   ये दिल माँगे मोर के जयघोष से वीरता का अनुपम स्वरूप देश वासियों को देखने को मिला. लेकिन हमने अपने 527 वीर सैनिकों की शहादत जरूर इतिहास के पन्नों में समेट ली, गर्व से और शान से वे – शूरवीर और शहीद कहलाए !

 युद्ध की पृष्टभूमि

     कश्मीर में जो कोलाहल इस समय छाया हुआ है उससे उबरने में शायद और थोड़ा वक्त लगेगा लेकिन श्रीनगर की वादियों में भी ऐसे कई परिवार है जिनके बच्चे देश की सीमा पर तैनात है या कारगिल युद्ध में अपना सर्वस्व निछावर कर धरती की गोद में समा गये थे – अपना धर्म और अपना कर्म करते हुए ! गर्व है ऐसे युवाओं पर. हिमाचल की पहाड़ी इलाक़ों से आने वाले विक्रम बत्रा जैसे सपूतों के परिवार के आँसू आज भी नही थमते. कारगिल शहर श्रीनगर से 205 किलोमीटर दूर है और दूसरी तरफ द्रास लगभग 160 किलोमीटर. उत्तरी पहाड़ियों की शृंखला के एक तरफ है लाइन ऑफ कंट्रोल और दूसरी तरफ़ है श्रीनगर – लेह राष्ट्रीय राजमार्ग. इस पहाड़ी शृंखला पर मौजूद है हमारी चौकियाँ जिन्हे हम सर्द मौसम में खाली करते है और मौसम के ठीक होते ही वापस सैनिकों को भेज देते है.  नवंबर 1998 में कारगिल द्रास और मश्को घाटी में मौजूद 150 से ज्‍यादा बर्फीले चोटियों को भारतीय सेना ने खाली किया था. अप्रेल 1999 में पाकिस्तान ने इलाक़ा कारगिल के पश्चिम और उत्तर में एक गहरी चाल चली थी.

          पाकिस्तान ने इसका फायदा उठाया और अपने लश्कर समय से पहले ही इस बर्फीली उँचाई पर हमारे मोर्चों पर कब्जा करने भेज दिए थे. पाकिस्तानी सेना ने भेष बदल कर हथियार और राशन पानी के साथ हमारे कब्जे वाले तमाम मोर्चों पर अपना वर्चस्व बना लिया यह थी असली शुरूवात कारगिल युद्ध की. यह एक सोची समझी साजिश थी जिसमे पाकिस्तानी सेना के मुजाहीदीन लड़ाकों ने 168 किलोमीटर की लाइन ऑफ कंट्रोल को पार कर बेहद खुफिया तरीके से पहाड़ियों की चोटियों पर अपने मोर्चे और कुछ भारतीय सेना के मोर्चे अपने कब्ज़े में कर लिए थे – इलाका 18,000 फीट से अधिक उँचाई पर था. बेहद सोची समझी साजिश को जनरल मुशर्रफ और आईएसआई की मदद से अंजाम दिया गया. धीरे – धीरे की गयी इस कार्यवाही को भारतीय खुफिया तंत्र – रॉ, आईबी और सेना की मिलिटरी इंटेलिजन्स सही तरीके और सही समय में दुश्मन की चाल का अनुमान लगाने में विफल रही ! इस बात को हमे मानना पड़ेगा की हमारी कमजोरी क्या थी क्योंकि इसीमें लिखा होता हैं सैन्य इतिहास और देश का भविष्य !  यही कारगिल युद्ध की पृष्टभूमि थी.

              एक तरफ पाकिस्तान हमारी सरहद पर अपने पत्थरों से संगर (मोर्चे) बना रहा था और हम दिल्ली लाहोर बस की राजनीतिक हलचल को चला रहे थे. कारगिल – द्रास – बटालिक सेक्टर में 1999 के मई महीने में शुरू हुआ भारतीय आक्रमण. सबसे पहले 25 मई को भारतीय वायुसेना के ऑपरेशन सफेद सागर शुरू हुआ और दूसरे दिन थल सेना ने ऑपरेशन `विजय’ का आगाज किया था. पहाड़ों की लड़ाई कभी आसान नही होती और जब उँचाई 18,000 फुट से ज्‍यादा हो तब सैनिकों की मुश्किलें और बढ़ जाती है. दुश्मन हमारे उपर हावी होने के लिए हमे नीचे से उपर आते हुए देखता है और यही उसके लिए फायदा साबित होता है एवं कम तादाद में ज्‍यादा इलाके पर वर्चस्व बनाया जा सकता है. इसके बनिस्पत आक्रमण करने वाली सेना को 8 – 9 गुना अधिक ताकत से पहाड़ों को समेटना पड़ता है.

         ज़्यादा सैनिक, बमवर्षक जहाज, गरजने वाली लंबी दूरी की आर्टिलारी की तोपें और सैनिकों के पास पहाड़ चढ़ने के साधन और गोलाबारूद बेहद जरूरी हो जाता है. पहाड़ों की उँचाई चढ़ने में समय तो लगता ही है परंतु यदि बर्फ को भी पार करना पड़े तब हालत बहुत ही भिन्न हो जाते है. 14 जुलाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री ने ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की. 26 जुलाई को भारतीय सेना मुख्यालय ने 1042 पाकिस्तानी सैनिको के मारे जाने की पुष्टि की और ऑपरेशन विजय की समाप्ति हुई थी.

ऑपरेशन विजय

     इस ऑपरेशन में हमने सेना की दो डिवीजन को  शुरू में तैनात किया था लेकिन जब ऑपरेशन अपनी चरम सीमा पर था तब लगभग 2 लाख सैनिक इस जंग के इलाक़े में उलझे हुए थे. भारतीय थल सेना को जनरल व्ही पी मलिक सेनाधक्ष्य की हैसियत से संभाले हुए थे. एक बेहद संघर्षमय आक्रमण में 4 जुलाई को टाइगर हिल, पॉइंट 4590 (जहाँ से श्रीनगर – लेह राजमार्ग आसानी से काबू किया जा सकता है), पॉइंट 5353 पर तिरंगा फहराया था.

           लेकिन पहाड़ी इलाक़े की वजह से बटालियन स्तर पर कार्यवाही को अंजाम देने की योजना बनी साथ में लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली आर्टिलारी को भी आयेज ले जाया गया. हमारी बोफोर्स तोपों ने पहाड़ियों की चोटियों पर निशाना साधा. पाठकों को याद होगा कई मर्तबा टेलीविज़न पर यह सब हमने लाइव देखा था. मल्टी बेरेल रॉकेट लौंचर से दुश्मन पर बिना रुके तेज़ी से फायर डाला गया. दुश्मन अपने बंकरों (संगर) में जगह बदल बदल कर छुपा रहा. भारतीय थल सेना की कई यूनिट अलग अलग इलाक़ों से अपनी पूरी ताक़त के साथ पहाड़ों पर चढ़ाई करने निकल पड़ी थी.

          इन प्रमुख चोटियों और इलाक़े में भारतीय जाँबाजों ने दुश्मन से लोहा लिया थापॉइंट 4268, 4540,  4590, 4700, 4745, 4812, 4875, 5140, 5203, 5285, 5770, टाइगर हिल, ख़ालुबार, मश्कोह, द्रास घाटी, तोलोलिंग, चोरबट ला, बटालिक सेक्टर.

ऑपरेशन सफेद सागर

       वायु सेना के लिए बहुत ही अहम चुनौती थी क्योंकि 20 गुणा 20 किलोमीटर के दायरे में एलओसी को ना पार करते हुए तेज गति से फाइटर जेट से बम बरसाना कोई मामूली बात नही थी – वह भी पहाड़ी के उपरी हिस्से में महज छोटे मोर्चों पर. वायुसेना ने सबसे पहले अपने टोह लेने की कार्यवाही के लिए जेगुआर और मिग लड़ाकू जहाज को भेजा था. लेकिन दूसरे ही दिन भारतीय वायुसेना का एक मिग-21 बटालिक सेक्टर में दुश्मन की जमीन से फायर की हुई मिसाइल से ध्वस्त हुआ तथा दूसरा मिग-27 इंजिन में खराबी से बर्बाद हुआ था. इसके तुरंत बाद अगले ही दिन टोलोलिंग के इलाक़े में एक एमआई-17 हेलिकॉप्टर पाकिस्तानी स्टींगर मिसाइल का निशाना बना. वायुसेना में हलचल हो गयी. एक साथ इतना नुकसान !

       दुश्मन द्वारा जमीन से स्टींगर मिसाइल का उपयोग किए जाने के फलस्वरूप अब हमारे जंगी जहाजों को इनकी मारक क्षमता से उपर रहने की जरूरत थी. अर्थात लगभग 26,000 से 32,000 फुट की उँचाई पर से हमारे हवाई हमलों को अंजाम देना जरूरी हुआ. इतनी उँचाई पर जहाज की काबलियत पर भी असर पड़ता है और पायलट पर जिम्मेवारी बढ़ जाती है. इसके साथ पहाड़ी की दूसरी तरफ सूरज की रोशनी ना पहुँच पड़ने और परबत की छाया ही अवरोध बन गयी थी. ऐसे में बेहद अचूक निशाना लगाना मुश्किल हो रहा था. 11 बजे के बाद बादल घेर लेते थे इस वजह से सुबह 8 से 11 बजे के बीच का समय ही उपयुक्त था.

      30 मई को नंबर 7 स्क्वाड्रन के मिराज 2000 जंगी जहाजों ने 250 किलोग्राम भार के बम द्रास सेक्टर में मुन्थो धालो, टाइगर हिल, पॉइंट 4388  में छुपे दुश्मन के ठिकानो पर बरसाए. इसका आकलन किया गया और तब लेजर बम की जरूरत महसूस हुई जिसकी बदौलत दिए गये छोटे से छोटे टारगेट को ध्वस्त करने की काबलियत थी.  मिराज 2000 का मुख्य बेस ग्वालियर था, लेकिन युद्ध की स्थिति में यहाँ से जहाज और इंजीनियर कार्मिक उत्तरी इलाके में भेजे गये – तीन वायुसेना अड्डों पर मिराज जंगी जहाज को अग्रिम मोर्चे पर लाया गया था. 250 किलो के बम 1971 की लडाई के मौजूद थे जिन्हे मिराज 2000 के भीतर ले जाने का बंदोबस्त किया गया. इसमे भी हमारे कार्मिकों ने जुगाड़ से कई नयी तकनीक विकसित की थी. 1 जून को राजस्थान की महाजन रेंज पर इस बम को मिराज से गिराया गया इसकी काबलियत और असर को देखने के लिए. इस काम मे सफलता मिलते ही इस किस्म के बमों को अग्रिम वायुसेना अड्डों पर भेजा गया. एक मिराज में इस किस्म के 12 बम रखे जा सकते थे, इसके अलावा 2 हवा से हवा में मार करने वाली मेजिक 2 मिसाइल भी मिराज का हिस्सा बनी.

     फिर बारी आयी लेजर गाइडेड बमों की – इन बमों को `पेव्ह वे’ नाम से जाना जाता है. पहली बार भारतीय वायुसेना इस किस्म के बमों का इस्तेमाल कर रही थी.  24 जून को पहली बार वायुसेना प्रमुख टिपणिस ने एक मिराज की पिछली सीट पर बैठ कर युद्ध क्षेत्र में हो रहे इस आक्रमण का जायका लाइव लिया था. जून के मध्य में सभी पाकिस्तानी पोस्ट की जानकारी मिल चुकी थी. सेना ने भी अपना आक्रमण करने की मंशा बना ली थी. बटालिक  सेक्टर में 7 स्क्वाड्रन के मिराज ने अपना रंग दिखाया और दुश्मन का कैंप और गोला बारूद का भंडार ध्वस्त किया. करीब 100 पाकिस्तानी मारे गये और 50 से ज़्यादा बंकर और अन्य भंडार नेस्तनाबूत हुए. 24 जून को दुश्मन की एक बटालियन का मुख्यालय जो टाइगर हिल पर था उसके पेव्ह वे से बर्बाद किया गया. लेजर बम के उपयोग से दुश्मन को भारी नुकसान हुआ था. 4 जुलाई 1999 को लगभग 11 घंटो की लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया था. एक बहुत बड़ी जीत दर्ज हुई जिसमे भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी मोर्चो की तबाही समय रहते कर दी थी.

            युद्ध की कीमत : एक आकलन

              किसी भी जंग की राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय कीमत बहुत अहम होती है और कई वर्षों तक इसका प्रभाव देश पर रहता है. लेकिन युद्ध की असली कीमत देश की अर्थ व्यवस्था पर सीधे सीधे नजर आती है. हालाँकि युद्ध में इस्तेमाल होने वाला गोला बारूद पहले ही बनाया गया और भंडारण कर रखा हुआ है इसलिए यह कीमत पहले ही चुकता हुई है यह संपूर्ण सच नही, क्योंकि जितनी कीमत में युद्ध के अस्त्र शस्त्र बनाए थे उस कीमत में अब दोबारा बनाने में ज़्यादा व्यय होगा यह भी उतना ही सच है. किसी भी युद्ध की सीधी सीधी कीमत देश की सरकार पर ज़्यादा असर डालती है. इसके बाद प्रांतीय सरकार पर जब बमबारी से हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए दोबारा खर्च किया जाता है. बड़े स्वरूप में देश के आर्थिक विकास पर प्रभाव देखने को मिलता है.

      रक्षा मंत्रालय का खर्च वर्ष 1998 – 99 में 39,897 करोड़ रुपये था जबकि जंग के बाद के वित्तीय वर्ष में यह 18 फीसदी बढ़ा और 47,071 करोड़ पर पहुँच गया था. युद्ध का असर इसके बाद के साल में भी नज़र आया जब रक्षा मंत्रालय का आवंटन फिर बढ़कर 16 फीसदी ज़्यादा हुआ और तीसरे साल में यह 54,461 करोड़ पर आकर रुका था. इसका मतलब लगभग 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी इन तीन सालों में. यह पूरा व्यय सिर्फ कारगिल के खाते में नही किया गया होगा, क्योंकि हर वर्ष के लिए नयी योजना को तीनों सेनाए अपनी जरूरत के मुताबिक खर्च करना जरूरी होता है. यदि हम इतिहास के पन्ने देखे तो 1962 – 63, भारत की आर्थिक स्थिति 2 प्रतिशत रही और जब पाकिस्तान के साथ के युद्ध में 1965 के बाद हमारी आर्थिक विकास दर शून्य से नीचे 3.7 प्रतिशत थी जबकि 1971 की जंग के बाद हमने मात्र 0.9 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की. इस सब से उबरने में देश को कई साल और लग गये थे.  एक अनुमान से लगभग 15 करोड़ रुपये प्रति दिन का खर्च कारगिल के युद्ध के दौरान हुआ है. कारगिल युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास में 3 मई 1999 से शुरू हुआ यह दर्ज किया गया और कुल 2 महीने, 3 सप्ताह और 2 दिन तक चला.

इस धरती के नीचे जाबांज शेर सो रहें है ..

                                इस लड़ाई में हमारी सेना ने भी एक कीमत अदा की थी – हमारे 527 जांबांज इस जंग में शहीद हुए थे. कॅप्टन विक्रम बत्रा, 13 जे एंड के रायफ़ल्स, लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे, 1/11 गोरखा रायफल्स (दोनो ही मरणोपरांत), राइफलमॅन संजय कुमार, 13 जे एंड के रायफल्स और ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, 18 ग्रेनेडियर्स को देश का सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा गया था. इसके अलावा 9 महावीर चक्र और 53 वीर चक्र अन्य वीरता पुरस्कारों में दिए गये थे. उनकी हिम्मत और शौर्य की गाथा अब अमर हो गयी है.

     इस देश की सीमा पर जुटे सैनिकों के हाथों में एक विशाल देश की बागडोर है, हमें अपनी तैयारी हमेशा ऐसी रखनी होगी की कारगिल जैसा दुस्साहस पाकिस्तान दोबारा ना कर सके. इन वीरों की असंख्य गाथाओं से ही प्रेरित होकर आज का युवा वर्ग सेना में अपनी सेवा देने को तत्पर रहता है. हमारे वीर सेनानियों को नमन – इन्ही सैनिकों की बदौलत हम अपने अपने घरों में महफूस है. एक कृतग्य राष्ट्र के लिए वाकई में यह विजय दिवस है !

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