कार्यकर्ताओं की अनदेखी कहीं भारी ना पड़ जाए

कार्यकर्ताओं की अनदेखी कहीं भारी ना पड़ जाए

अमित शाह को ऐसे ही राजनीति का चाणक्य नहीं कहा जाता है , जब तक वो राष्ट्रीय अध्यक्ष थे भाजपा के कार्यकर्ताओं का उत्साह चरम पर था , स्थानीय मंत्री विधायक और पदाधिकारी सुनते थे किन्तु अब स्थिति ठीक उलट है । कार्यकर्ताओं की उपेक्षा आम बात हो गई है । मंत्री विधायकों की क्या बात करे भाजपा के पदाधिकारी तो कार्यकर्ताओं से संवाद भी ठीक से नहीं करते । पद मिलने के बाद लगता है जैसे अगली विधायकी उनकी पक्की है और वो वी आई पी ही गए । मैंने भी इसकी सत्यता जानने के लिए अभी हाल ही में भाजपा के कुछ कद्दावर नेताओं और पदाधिकारियों को सोशल मीडिया के जरिए संपर्क साधने की कोशिश की किंतु नकारात्मक प्रतिक्रिया ने उक्त बातों को सही साबित कर दिया । अध्यक्ष जेपी नड्डा जी आखिर कार्यकर्ता ही किसी पार्टी की जान होते है उन्हीं से पार्टी है , वो ही जनता से कनेक्ट है और आप सबके रैलियों में भीड़ भी वही लाते हैं । आखिर खुलासा हो  ही गया कि नरेंद्र मोदी सिर्फ इंसानों के ही नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं के भी नेता हैं। एक व्यंग्य याद आ रहा वो हुआ यू कि एक  खुलासा, एक अजब लीला  दौरान हुआ। बात कलयुग की है।                     एक बार, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी को सरेंडर मोदी लिखकर ट्वीट करना चाहा। ठीक उसी वक़्त राहुल गांधी की लेखनी पर स्वयं देव नरेंद्र अवतरित हो गये और सरेंडर की वर्तनी बदल दी। यानी स्पेलिंग मिस्टेक करा दिया। राहुल गांधी जो सरेंडर लिखना चाह रहे थे, दैवीय प्रभाव से सुरेंद्र लिख बैठे। इसी दैवीय लीला के बाद भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को अधिकारिक तौर पर घोषणा करनी पड़ी कि नरेंद्र मोदी भगवानों के भी नेता हैं। बाकी भाजपा के लोकल नेता  सबसे बड़े भगवान हैं।ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी इस बात की पुष्टि करते हैं। वेदों के प्रथम  अध्याय के डेढवें श्लोक में केजरीवाल  के कलयुग में अवतार का ज़िक्र है। स्पेलिंग लीला का उसमें ज़िक्र नहीं है। तो, भाजपा ने इस लीला को वेद में जोड़ने के लिए इतिहास के पुनर्लेखन करने का आदेश दे दिया है। ये काम बिल्डर पसरीजा को सौंपा गया है। पसरीजा बेस्ट सेलर लेखक रहे हैं। उनकी पुस्तक “सफलता की कुंजी” के लिए उन्हें सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ा गया है।          पृथ्वी लोक में भी अनेक उदाहरण हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि नरेंद्र मोदी सचमुच कार्यकर्ताओं  के नेता हैं और सबसे बड़े भगवान हैं। हालांकि कुछ नास्तिक और बुद्धिजीवी लोग इस बात को मज़ाक समझते हैं। लेकिन मैं उदाहरण के साथ उन्हें मुंहतोड़ जवाब देना चाहूंगा।जिस प्रकार, तमाम दुनियावी वास्तविक समस्याओं से विरक्त होकर भगवान अपने आसन में सिर्फ धंसे ही रहते हैं। उसी प्रकार, देश की तमाम समस्याओं से मुंह मोड़कर नरेंद्र मोदी जी 2014 से प्रधानमंत्री की कुर्सी में धंसे हुए हैं।जिस तरह भगवान अपने भक्तों की याचनाओं को नहीं सुनते उसी तरह लोकल मंत्री भी कर्मचारी, दुकानदार, बेरोज़गार, किसान, मज़दूर किसी की अर्ज़ियां नहीं सुनते। जिस तरह भक्त भगवान की कृपा का इंतज़ार करते रहते हैं, उसी तरह से देश के लोग अच्छे दिनों का इंतज़ार कर रहे हैं।जिस तरह भगवान अपने मानने वालों की परीक्षा लेते हैं ठीक उसी तरह विधायक  भी देश की जनता की परीक्षा लेते हैं। पेट्रोल के दाम, महंगाई, बदइंतज़ाम, कोरोना, मज़दूरों का पलायन, बेरोज़गारी, अपराधीकरण, सांप्रदायीकरण, लुढ़की हुई अर्थव्यवस्था ये सब कलयुग में जनता की परीक्षा के ही औज़ार हैं। जिस तरह भगवान लीलाएं करते हैं उसी तरह भाजपा के नेतागण भी  लीलाएं करते हैं। बाल्यावस्था में मगरमच्छ कांड । गुलेल, कोबरा-पोस्ट कांड। इलेक्शन के बाद गुफा प्रवास लीला आदि-आदि।जिस तरह भगवान को अपना गुणगान, चढ़ावा और सेवा पसंद होती है, ठीक उसी तरह नेताओं  को भी मस्के का चस्का है। आप माने या ना माने लेकिन यही सत्य है कि वो सिर्फ पूजने के लिये बने हैं।इसलिये, गर्व से कहो कि सिर्फ भगवानों के ही नहीं बल्कि गधे, खच्चर, अजगर, नेवला, कूप-मंडूक, कूढ़-मगज़ सबके नेता  हैं। ये उपरोक्त उदाहरण तमाम बुद्धिजीवियों, नास्तिकों और कम्युनिस्टों की बोलती बंद कर देंगे।                  ____ पंकज कुमार मिश्रा (एडिटोरियल कॉलमिस्ट पत्रकार एवं शिक्षक) केराकत जौनपुर, उत्तर प्रदेश 8808113709

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