किडनी को क्षति पहुँचाता है रैब्डोमायोलिसिस

किडनी को क्षति पहुँचाता है रैब्डोमायोलिसिस

शरीर के किसी हिस्से में दर्द हो तो लोग अक्सर इसे सामान्य रूप से लेते हैं जबकि कईबार ये किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है।  रैब्डोमायोलिसिस भी ऐसी ही एक बीमारी है जो कि मांसपेशियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगी चोट के कारण होता है। हमारे मेडिकल एक्सपर्ट डॉ. शशांक शर्मा बताते हैं कि यह एक सीरियस सिंड्रोम है। मसल फाइबर के मृत हो जाने और उससे निकलने वाले प्रोटीन के रक्तप्रवाह में पहुंच जाने के परिणामस्वरूप यह समस्या उत्पन्न होती है। रैब्डोमायोलिसिस मुख्यतः कंकाल की मांसपेशी के ब्रेकडाउन हो जाने के कारण होने वाली स्थिति है। मांसपेशियों के ब्रेकडाउन के कारण रक्तप्रवाह में मायोग्लोबिन का प्रवाह होने लगता है। मायोग्लोबिन एक प्रकार का प्रोटीन होता है जो मांसपेशियों में ऑक्सीजन को संग्रहित करता है। अगर खून में मायोग्लोबिन की मात्रा बहुत अधिक हो जाए तो यह किडनी को क्षति पहुंचा सकती है। कुछ दुर्लभ मामलों में रैब्डोमायोलिसिस की स्थिति जानलेवा भी हो जाती है। आंकड़ों की बात करें तो संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रत्येक वर्ष रैब्डोमायोलिसिस के लगभग 26,000 मामले सामने आते हैं। रैब्डोमायोलिसिस के अधिकांश रोगियों को नसों के माध्यम से तरल पदार्थ देने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा जिन लोगों को किडनी की गंभीर समस्या हो जाती है, उन्हें डायलिसिस या हेमोफिल्ट्रेशन जैसे उपचार माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है।

मुख्य लक्षण

इस रोग में सबसे ज्यादा कठिनाई बीमारी को पहचानने में होती है क्योंकि डॉक्टर भी देर से समझ पाते है। ये बीमारी इतनी खतरनाक है इंसान को मौत के मुँह तक भी ले जा सकती है। रैब्डोमायोलिसिस में लक्षणों के माध्यम से इसकी पहचान कर पाना थोड़ा मुश्किल होता है। रैब्डोमायोलिसिस और कई अन्य स्थितियों के लक्षण मिलते-जुलते हैं, यही कारण है कि इसे आसानी से पहचान पाना थोड़ा मुश्किल होता है। पारंपरिक रूप से कंधे, जाँघ और कमर के निचले हिस्से में दर्द, मसल्स में कमजोरी महसूस होना या हाथ-पैर हिलाने में कठिनाई, मूत्र का रंग लाल-भूरा होना या कम पेशाब आना इसके लक्षणों में शामिल हैं। ध्यान रखें कि बहुत से मरीजों में मसल्स से संबंधित कोई भी लक्षण दिखाई नहीं देते। दिल की धड़कन का तेज होना, बुखार, उल्टी भ्रम की स्थिति भी इस बीमारी के लक्षणों में है।

होने के कारण

रैब्डोमायोलिसिस कई ट्रॉमेटिक और नॉनट्रॉमेटिक, दोनों वजहों से हो सकता है। ट्रॉमेटिक कैटेगरी में सड़क दुर्घटना, गिर जाने या इमारत गिरने से लगने वाली चोट अथवा बिजली के झटके से लगने वाली चोट या थर्ड-डिग्री बर्न से लेकर साँप-बिच्छू काटने से फैला विष हो सकता है। नॉनट्रॉमेटिक कारण में शराब या अवैध ड्रग्स जैसे हेरोइन और कोकीन आदि का सेवन, एंटीसाइकोटिक्स या स्टैटिन दवाओं की उच्च मात्रा लेना, शरीर का तापमान बहुत अधिक होना (हाइपरथर्मिया) या हीट स्ट्रोक, ऊतकों या रक्तप्रवाह (सेप्सिस) में विषाक्त पदार्थों को बढ़ाने वाले बैक्टीरियल संक्रमण इत्यादि आते हैं।

उपचार

सबसे पहले रोगी के लक्षणों को देखा जाता है। इस आधार पर क्रिएटिन किनेज़ की मात्रा का पता लगाने के लिए खून की जांच, जबकि मायोग्लोबिन की मात्रा का पता लगाने के लिए पेशाब की जांच कराने की सलाह दी जा सकती है। साथ ही अन्य समस्याओं के पता लगाने के साथ रैब्डोमायोलिसिस के कारणों और जटिलताओं की जांच की जा सकती है। समय रहते बीमारी पकड़ आ जाने पर किडनी की क्षति से मरीज को बचाया जा सकता है। शरीर में पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ पहुंचाना, इलाज का पहला कदम होता है। रोगी को बाइकार्बोनेट युक्त तरल चढ़ाया जाता है, जिससे किडनी से मायोग्लोबिन को बाहर निकालने में मदद मिल सके। चिकित्सक वैसी कुछ दवाएँ लिख सकते हैं जिससे किडनी के फंक्शन ठीक रहें। जरूरत होने पर डायलिसिस भी दिया जा सकता है। ध्यान रहे कि कोरोना काल में इस बीमारी से भी बहुत लोगों की किडनी पर बुरा प्रभाव हुआ था।

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डॉक्टर शशांक शर्मा

कंसल्ट डॉक्टर बाला जी हॉस्पिटल

संकल्प हॉस्पिटल रायपुर, छत्तीसगढ़

डायरेक्टर माँ शीतला नर्सिंग होम

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