किसी नए सँकल्प के लिए मुहूर्त का इंतज़ार क्यूँ? : कविता मल्होत्रा

किसी नए सँकल्प के लिए मुहूर्त का इंतज़ार क्यूँ? : कविता मल्होत्रा

Resolution Of Mother Nature in 2021

There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples, my philosophy is kindness.

– Dalai Lama

कैलेंडर का पन्ना पलटा, तारीख़ बदली, और पलक झपकते ही एक सदी बदल गई, लेकिन आदमीयत खुद को नहीं बदल पाई और अँधानुकण के नशे में धुत्त समूचे विश्व का एक दूसरे को बधाईयाँ देने का जुनून सबके सर पर चढ़ कर नाचने लगा।

दायित्वों पर धूल और माणिक जड़ित अधिकार रहे

हर बार की तरह वृद्धाश्रम सूनेपन से ही गुलज़ार रहे

रौनक़ों के अड्डे ईर्ष्या द्वेष और घृणाओं के आधार रहे

आधुनिकता के जूतों की नोक पर आदर सत्कार रहे

सभ्यता नग्न और अज्ञानी नौनिहाल लज्जा उतार रहे

हर साल की तरह तथाकथित शिक्षितों ने नए नए संकल्पों की डायरी बनाई और तमाम मतभेदों की सूची पहले पन्ने पर चढ़ाई।फिर ग्लिटरिंग ज़ैल पेन से प्रतिशोध की ज्वाला चमकाई।

सच है नशा सर चढ़कर बोलता है। मगर विनाश काल में विपरीत बुद्धि का ही ज़हर घोलता है।जिन्हें अपनी नशा पूर्ति के लिए फ़ंडिंग नहीं मिल पाई उन्होंने अपने गार्डियनज़ के ख़िलाफ़ बुलँद आवाज़ उठाई और दँडित करने के लिए प्रताड़ना की सूली बनाई।

कितना अच्छा होता अगर करोना काल में प्रकृति द्वारा सिखाए गए सबक़ को मध्य नज़र रखते हुए शेष पीढ़ियाँ

अपनी संस्कृति को सम्मानित करतीं और एक दूसरे के प्रति वैमनस्य की भावना को क्षमायाचना में बदलने का प्रयास करके सबसे पहला प्रणाम माँ प्रकृति के ही सजदे में करतीं, जिसने निःस्वार्थ सेवा भाव का निःशुल्क वितरण करके समूची सृष्टि को नि:शर्त पोषित किया।

माना माँ प्रकृति के विरूद्ध अज्ञानी पीढ़ियों का विरोध है

ग्लोबल वार्मिंग के बावजूद, क्षमा ही उसका प्रतिशोध है

जागरूक केवल वही पीढ़ियाँ, जागृत जिनका स्वबोध है

✍️

अज्ञानी होना उतने शर्म की बात नहीं है जितना कि सीखने की इच्छा न रखना।

– बेंजामिन फ़्रेंकलिन

✍️

नववर्ष पर ही कई पीढ़ियों को नवीन रिज़ोल्यूशनज़ का बुखार चढ़ता है और स्वार्थ सिद्धि के नए सिद्धांत गढ़ता है।लेकिन प्रकृति ने शेष बची पीढ़ियों को जरूरतमँदों की मददगारी का एक मौक़ा देकर अपना फ़लसफ़ा स्पष्ट कर दिया है।

✍️

एक मुट्ठी राख ही होगी,आखिर सभी का अवशेष

किस बात का ग़ुरूर,कुछ नहीं किसी में भी विशेष

करोना तो एक बहाना है,समझो प्रकृति के सँदेश

चूर हो घमँड जब आएँ,ऊपरी अदालत के आदेश

✍️

माँ प्रकृति नई सदी को अपनी निस्वार्थता की मानसिकता से पोषित करे, नववर्ष पर समूचे विश्व के लिए मेरी यही शुभकामना है।

✍️

माँ प्रकृति अपने तमाम जीवों को

निःस्वार्थ प्रेम के ही सालन खिलाती है

प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से

नई उम्मीदों के दीप जलाना सिखाती है

ग्लोबल वार्मिंग का दोषारोपण नहीं

क्षमा को ही अपना प्रतिशोध बनाती है

क्यूँ न उसी के सजदे में सर झुकाएँ

जो हर राह में प्रेम दीपक ही जलाती है

Special Article