कोविड-19 टर्मिनॉलजी

कोविड-19 टर्मिनॉलजी

(सारिका पंकज )

1. हर्ड इम्युनिटी क्या है?

2.फिजिकल डिस्टेंसिंग से क्या अभिप्राय हैं?

3.क्या होता है इन्क्यूबेशन पीरियड?

4.पेशेंट 31 का अर्थ

5.आइसोलेशन तथा क्वारंटीन की परिभाषा

6.क्वारंटीन और आइसोलेशन में अंतर

7 आरटी-पीसीआर टेस्ट

8.ऐंटीबॉडी टेस्ट

9. लॉकडाउन की परिभाषा और कानूनी आधार 

10. यूपीएससी प्रीलिम्स प्रैक्टिस क्वेश्चन

हर्ड इम्युनिटी क्या है?-

हर्ड (Herd) शब्द का अर्थ होता है झुंड।

जब लोगों का एक बड़ा समूह  किसी संक्रामक बीमारी से प्रतिरोधक हो जाता है, तो उसे हर्ड इम्युनिटी कहा जाता है।

ये शब्द सिर्फ संक्रामक बीमारियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा दो तीन तरीकों से हो सकता है-

पहला, सही तरह से वैक्सीन लगाई जाए।

ज्यादा संख्या में वैक्सीन लगेगी तो लोग इस बीमारी से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बना लेंगे।दूसरा, बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी से इन्फेक्ट हों, और फिर ठीक हों, और इस वजह से उनका शरीर इसके लिए इम्यूनिटी विकसित कर ले।

फिजिकल डिस्टेंसिंग

एक दूसरे के संपर्क में आने से बचना और एक निश्चित दूरी बनाकर रहना फिजिकल डिस्टेंसिंग है। वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए एक दूसरे से निश्चित दूरी बनाकर रखना और अपने-अपने स्थानों पर सुरक्षित रहना है। दूरी बनाकर रहने से वायरस का संक्रमण भी कम होगा और यह फैलेगा भी नहीं। कोरोना वायरस की गति को कम करने के लिए फिजिकल डिस्टेंसिंग बहुत जरूरी कदम है। यह इसलिए आवश्यक है ताकि स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली, वायरस की स्थिति को संभाल सके। इसके तहत सामूहिक समारोहों से दूर रहना है। कार्यालयों, स्कूलों, सम्मेलनों, खेल आयोजनों, शादियों आदि से दूरी और इसके आयोजनों का कुछ समय तक ना होना, जिससे संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ा जा सके।

इन्क्यूबेशन पीरियड ( Incubation )

वायरस जब शरीर के संपर्क में आता है, तो तुरंत बीमारी के लक्षण नहीं दिखते हैं। इन लक्षणों को शरीर पर दिखने में कुछ समय लगता है। कोरोना वायरस के मामले में ये समय दो से चौदह दिन का है। जो समय लक्षणों को दिखने में लगता है, उसे ही इन्क्यूबेशन पीरियड कहा जाता हैं। इससे मिलती-जुलती अवधारणा प्रसुप्ति अवधि (latency period) की है, जो रोगजनक जीव से सम्पर्क होने और रोगी के शरीर द्वारा संक्रमण फैलाने की क्षमता के आरम्भ होने के बीच की अवधि होती है। प्रसुप्ति अवधि का ऊष्मायन अवधि से कम होना खतरनाक माना जाता है क्योंकि इस स्थिति में स्वस्थ्य लगने वाले व्यक्ति के शरीर में फैल सकने वाला संक्रमण हो सकता है। सम्भव है कि व्यक्ति को स्वयं ही आभास न हो कि वह रोगी बनने वाला है। ऐसे में रोग तेज़ी से फैल सकते हैं।

पेशेंट 31(Patient 31)

इस शब्द का इस्तेमाल उस व्यक्ति के लिए किया जाता है, जो बड़ी संख्या में दूसरों को इन्फेक्शन फैला दे।इस शब्द का उद्भव दक्षिण कोरिया से हुआ है। इस शब्द का इस्तेमाल किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए होता है जिसने संक्रमित होने के बावजूद कई लोगों से सम्पर्क किया हो, और इस वजह से वायरस को काफी फैला दिया हो।

दक्षिण कोरिया में  20 जनवरी को पहली बार कोरोना वायरस का पता चला था।

दक्षिण कोरिया में जो पहले 30 पेशेंट पाए गए , उन्होंने इस संक्रमण के पता चलने पर अपना खूब ध्यान रखा।अपनी समझदारी से वायरस को फैलने से बचा लिया था, इस तरह वहां मामले नहीं बढ़े थे। दक्षिण कोरिया में  61 साल की एक महिला, जो 31वीं पेशेंट थी, उसने लापरवाही कर दी और वो एक चर्च के फंक्शन में शामिल होने चली गई।

वहां पर कई लोगों के संपर्क में आई जबकि डॉक्टर्स ने उसे खुद को आइसोलेट करने की सलाह दी थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।कोरियन सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने अपनी पड़ताल में पाया कि वो कम से कम उस दौरान 1,160लोगों के सम्पर्क में आई थी।फरवरी के दूसरे सप्ताह तक आते-आते साउथ कोरिया में  हालात बहुत बिगड़ गए।उसकी जिम्मेदार इसी 31वें पेशेंट को माना गया।

क्या है क्वारंटाइन?

क्वारनटीन एक पूरी व्यवस्था है, जो ऐसे लोगों पर लागू होती है जो संक्रमित व्यक्त‍ि के संपर्क में आए होते है।   ऐसे लोग जो किसी ऐसे दूसरे देश से आए हैं जहां कोरोना वायरस का संक्रमण है तो ऐसे लोगों को किसी जगह एकांत में सबसे अलग रखा जाता है, जिससे उनके लक्षणों पर नजर रखी जा सके। अगर वो 14 दिन के क्वारनटीन काल में संक्रमित पाए जाते हैं तो उनका इलाज किया जा सके। साथ ही इस तरीके से दूसरे लोगों को भी संक्रमण से बचाया जा सकता है।

सामान्यतः क्वारंटाइन शब्द लैटिन भाषा के शब्द क्वारेंटेना (Quarantena) से बना है। जिसका मूल अर्थ ‘40 दिन के समय’ से है। इसका मतलब संगरोध या संगरोधन या किनारे पर आने-जाने से रोकना है। ऐसी कोई बीमारी, जिसकी मानव से मानव में स्थानांतरित होने की पुष्टि हो चुकी है और उस दौरान यदि किसी व्यक्ति के संक्रमित होने की आशंका होती है, भले ही उसमें संक्रमण के लक्षण न प्रकट हुए हो तो भी उस व्यक्ति की गतिविधियाँ को एक स्थान विशेष में सीमित कर दिया जाता है।       

दरअसल, पुराने समय में जिन जहाज़ों में किसी यात्री के रोगी होने या जहाज़ पर लदे माल में रोग प्रसारक कीटाणु होने का संदेह होता था, तो उस जहाज़ को बंदरगाह से दूर चालीस दिन ठहरना पड़ता था। प्राचीन काल में विभिन्न समाजों ने संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिये संगरोध का सहारा लिया है, तथा यात्रा व परिवहन पर प्रतिबंध लगाया है। इतना ही नहीं संक्रमित व्यक्तियों के संक्रमण मुक्त होने तक समुद्री संगरोध (Maritime Quarantine) का भी सहारा लिया।

आइसोलेशन

आइसोलेशन कोरोना संक्रमित व्यक्ति‍ के लिए होता है। कोविड 19 पॉजिट‍िव पाए जाने वाले मरीज को सबसे अलग आइसोलेशन में रखा जाता है  वो दूसरे लोगों से दूरी बनाकर रहता है।जब तक बहुत जरूरी न हो कोई भी उस कमरे में नहीं जाता है उनसे सिर्फ मेडिकल प्रोफेशनल्स ही इलाज के लिए मिलते हैं।

क्वारंटाइन व आइसोलेशन में अंतर 

आमतौर पर क्वारंटाइन की प्रोसेस तब अपनाई जाती है जब किसी समूह या समुदाय के संक्रमित होने की आशंका व्यक्त की जाती है। वहीँ आइसोलेशन की प्रक्रिया तब अपनाई जाती है जब कोई व्यक्ति किसी संक्रामक बीमारी से संक्रमित हो जाता है। इस प्रक्रिया में संक्रमित व्यक्ति को अन्य गैर संक्रमित लोगों से अलग कर दिया जाता है ताकि संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में न स्थानांतरित हो पाए।  

आइसोलेशन का कार्य स्वास्थ्य उपकरणों से लैस परिसरों यथा: हॉस्पिटल, मेडिकल सेंटर, मेडिकल कॉलेज इत्यादि स्थानों पर ही संभव है। जबकि क्वारंटाइन की प्रक्रिया अस्थाई तौर पर सीमित स्वास्थ्य उपकरणों से लैस स्थानों पर अपनाई जा सकती है। व्यक्ति स्वयं को होम क्वारंटाइन भी कर सकता है अर्थात अपने घर के किसी एक कमरे में ही अपनी गतिविधियों को सीमित कर ले।   

जहाँ आइसोलेशन का उद्देश्य संक्रमित व्यक्ति को पूर्णरूप से संक्रमण मुक्त करना है तो वहीँ क्वारंटाइन का उद्देश्य संक्रमण की आशंका वाले समूह या समुदाय की निगरानी करना है।

कोरोना वायरस के संदर्भ में विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, आइसोलेशन की कोई निर्धारित समयावधि नहीं है क्योंकि यह व्यक्ति के पूर्णतः संक्रमण मुक्त होने तक कार्य करती है। जबकि क्वारंटाइन की समयावधि 14 दिन निर्धारित की गई है।

आरटी-पीसीआर टेस्ट

इसका मतलब है रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पॉलिमरेस चेन रिएक्शन (RT-PCR) टेस्ट। यह एक ऐसी लैब टेक्निक है जिसमें आरएनए के डीएनए में रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन को जोड़ते हुए वायरस का पता लगाता है। आरटी-पीसीआर में इस बात की जांच की जाती है कि वायरस मौजूद है या नहीं। इसके लिए व्यक्ति के रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट, थ्रोट स्वैब या नाक के पीछे वाले गले के हिस्से से सैंपल लिया जाता है। इसके नतीजे आने में 12 से 24 घंटे का वक्त लगता है।

रिअल टाइम पॉलीमरेज चेन रिएक्शन या पीसीआर टेस्ट कोरोना की टेस्टिंग का महत्वपूर्ण आयाम है। पॉलीमर वे एंजाइम होते हैं जो डीएनए की नकल बनाते हैं। इसमें कोरोना संक्रमित व्यक्ति के स्वैब सैंपल से डीएनए की नकल तैयार कर संक्रमण की जांच की जाती है।

इसकी जांच वायरस के डीएनए से किया जाता है। अगर मिलान सही मिलता है तो व्यक्ति में कोरोना की पुष्टि हो जाती है। लेकिन यह बहुत अत्याधुनिक लैब में ही किया जा सकता है।

ऐंटीबॉडी टेस्ट

ऐंटीबॉडी टेस्ट में ब्लड का इस्तेमाल होता है ताकि वायरस के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया का पता लगाया जाए।जेनेटिक  टेस्ट के विपरीत सेरेलॉजिकल टेस्ट खून के नमूनों की एंटीबॉडीज पर काम करते हैं। इसलिए इन टेस्ट को ‘एंटीबॉडी टेस्ट’ (Antibody Test) कहा जाता है। एंटिबॉडी हमारे शरीर के प्रतिरोधक सिस्टम के द्वारा पैदा किए गए सुरक्षा प्रोटीन होते हैं जो बीमारी  फैलाने वाले बैक्टीरिया और वायरस को बेअसर (Neutralize) करने का काम करते हैं।ये संक्रमण खत्म होने के बाद भी काफी समय तक खून में बने रहते हैं।

क्या होता है लॉकडाउन?

लॉकडाउन एक प्रशासनिक आदेश होता है। इसको सरकार आपदा के दौरान सरकारी तौर पर लागू कर सकती है। इसमें लोगों से घर में रहने का अनुरोध किया जाता है और जरूरी सेवाओं के अलावा सारी सेवाएं बंद कर दी जाती हैं। इसका मकसद होता है, सब अपने-अपने घरों में सुरक्षित रहें। लॉकडाउन एक इमर्जेंसी जैसी व्यवस्था है जिसके तहत निजी और सार्वजानिक कार्यालयों, निजी प्रतिष्ठानों, एवं सार्वजनिक परिवहन को पूर्ण रूप से बंद कर दिया जाता है। यह एक प्रकार से सरकार द्वारा अपनाई गयी अस्थायी व्यवस्था होती है जिसका मुख्य मतलब होता है कि लोग कम से कम एक दूसरे के संपर्क में आयें और महामारी कम से कम फैले अर्थात लॉकडाउन में एक तरह से कर्फ्यू की स्थिति होती है।

भारत में महामारी अधिनियम 1897 के तहत लॉकडाउन को लागू किया गया है। इस अधिनियम का इस्तेमाल किसी विकराल और विकट समस्या के दौरान किया जाता है। जब केंद्र और राज्य सरकार को ये विश्वास हो जाए कि कोई बड़ा संकट या महामारी देश या राज्य में आ चुकी है और सभी नागरिकों की जान को इससे खतरा हो सकता है तब इसको लागू किया जाता है। महामारी अधिनियम 1897 की धारा 2 राज्य सरकार को कुछ महत्वपूर्ण शक्तियां प्रदान करती है, जिसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें बीमारी की रोकथाम के लिए अस्थायी रूप से कोई नियम बना सकती हैं।

Special Article नई दिल्ली