खुद से खुद के सँवाद की लिपि को गढ़ा जाए

खुद से खुद के सँवाद की लिपि को गढ़ा जाए

नववर्ष की ढेरों शुभकामनाओं के साथ एक नया प्रण लिखें

समूची मानवता के उत्थान हेतु बिताया हर एक क्षण लिखें

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समय का महाकुँभ अपनी गति से निर्बाध चलता रहता है और हर साल अपने साथ अनेक खट्टी मीठी सँवेदनाएँ और  जीवन रूपी महासागर में आए मानसिक प्रदूषण की लहरों का कुछ कचरा भी अपने साथ लाता है।

स्वच्छ भारत अभियान की कामयाबी में आने वाली बाधाएँ रगों को चटकाती हुई, मुँह चिढ़ाते हुए निकल जाती हैं, और

चँद घँटों के फ़ासले पर हर रोज़ एक नयी निर्भया जन्म भी लेती है और तिरस्कार की लौ से सुलगाई भी जाती है।

पिछले कुछ दिनों से बलात्कार की शिकार महिलाओं के बयान पर सज़ा पाने के डर से, उन्हें रहते ज़िंदगी अग्नि के सुपुर्द करने का घिनौना कृत्य, आत्मा को निरँतर झिंझोड़ रहा है।

एैसे में किसी भी त्योहार पर जश्न मनाने की कामना लगभग दफन ही हो चुकी है।

कैसे उन परिवारों की वेदना भुलाई जा सकती है, जिनकी परियों की परीकथाएँ नियति का ग्रास बन चुकी हों।कैसे उन रिश्तों की मिठास भुलाई जा सकती है, जिनके चाँद पर ग्रहण लग गया हो।भला किसी सच्चे मुरीद की आशिक़ी भी कभी गुमराह हुई है! कभी मज़हब के नाम पर, कभी स्वामित्व की लालसा में,तो कभी जात पात के नाम पर प्रेम को सूली पर चढ़ा दिया जाता है।लेकिन अहम की चादर में छिपा निस्वार्थता का आइना वास्तविकता से कोसों दूर, परस्पर ईर्ष्या-द्वेष और निजी स्वार्थों के झुनझुने बजा कर, मानव जीवन की अनमोल निधि को धूमिल कर रहा है।

घोर कलयुग,जाने कैसे लौट आए दुश्शासन

कान्हा का सुदर्शन चक्र,भूल गया अनुशासन

वृँदावन सूना,और ताज हथियाते सब शासन

राशन लुप्त हुआ,बँटते सब दावतों में भाषण

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नववर्ष के नवीन प्रण गढ़ने के लिए यूँ तो किराए के विचारों का समूचा बाज़ार भरा पड़ा है, लेकिन क्यूँ न मानव योनि की बुनियाद में बसी मानवता की यथार्थवादी जड़ों को सींचा जाए।

इश्क ए हकीकी की इबादत तो वो सीढ़ी है जो सीधे दरगाह पर पहुँचाती है। फिर आजकल ये किस इश्क की दास्तानें लिखी जा रही हैं, जो जिस्म से रूह तक का सफर ही तय नहीं कर पातीं।

हर बार की तरह फिर एक लेख लिखने की सोच से क़लम उठाई मगर शब्दों और सँवेदनाओं का विरोधाभास लेख के

आदि से अँत तक की यात्रा से ही इँकार कर रहा है।

इसलिए सोचा इस बार –

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नववर्ष पर कुछ नया लिखने की शुरूआत की जाए

भीड़ में शोर मचाने से बेहतर खुद से बात की जाए

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दिनचर्या की भागदौड़ से निकल कर जब क़लम उठाई तो पाया कि –

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विषय की जरुरत कब कहाँ

किसी लेखनी की जागीर है

जागृत अग़र रूह हो चुकी तो

हर सँवेदना में बसा कबीर है

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इसलिए प्रकृति के हर उपहार के साथ सामँजस्य बैठाया जाए। लेकिन ये सँभव तभी होगा जब भीड़ का अँधानुकण न किया जाए बल्कि –

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पँचतत्वों के बहुमूल्य मौन सँदेश को पढ़ा जाए

खुद से खुद के सँवाद की लिपि को गढ़ा जाए

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लिपि गढ़ कर जिन दिशाहीन सँवेदनाओं को दिशा दिखाने की ज़रूरत है, अब उन पर चर्चा की जाए।

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सब अपने अपने मोबाइल में व्यस्त हैं आजकल

सागर सबके अपने अँदर

ढूँढ रहे हैं सोशल मीडिया पर प्यास बुझाते नल

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आज समाज की तीन पीढ़ियाँ जिस व्याधि से ग्रस्त हैं, निश्चित ही इसका उपचार सिर्फ और सिर्फ खुद से सँवाद कर के ही किया जा सकता है।

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कभी ऊँगली पकड़ चलना सिखाया था जिनको

नेह बाँटती लौ पर सवाल उनके

क्यूँ कदम उनसे मिलाकर चलना मुहाल हो गया

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एक समय था जब पीढ़ी दर पीढ़ी स्नेह-सँस्कार हस्तान्तरित हुआ करते थे, लेकिन आज की पीढ़ी वात्सल्य को भी निजी परिधि में क़ैद करके उस पर अपना एकाधिकारी स्वामित्व चाहती है।पीढ़ियों के बीच बढ़ते फासलों पर चिंतन, केवल खुद से खुद का सँवाद ही सार्थक कर सकता है।

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शिकायत यही रहती हर माता पिता की सँतान से

हर पीढ़ी गर्वित अपने ही अज्ञान से

काश इस अहसास ने सोई सोच को जगाया होता

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आज हर सँबँध की इमारत में अहम की सेंध लगी है, इस समस्या का कारण भी हम खुद हैं और निवारण भी, तो क्यूँ न इस गँभीर रोग को भी खुद से खुद का सँवाद करके ही हल कर लिया जाए।

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आज जिस दर्द से गुज़र रही हैं वृद्धाश्रमों की दीवारें

गुँजित होतीं शैशव सी किलकारियाँ

अगर औलादों ने भी माँ बाप का नख़रा उठाया होता

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आज हर कोई पैसा कमाने की दौड़ में शामिल है। किसी को ज़रूरतें पूरी करने के लिए पैसे की दरकार है तो कोई अपनी इल्लतें पूरी करने के लिए पैसा कमाने की मशीन बनने को लाचार है।कारण जो भी हो, जिस स्नेह से अभिभावक अपने नीड़ के परिंदों को पालते हैं, उम्र के आख़िरी पड़ाव पर, अपनी औलाद से उसी स्नेह पर उनका भी तो हक़ बनता है।ये मसला केवल खुद से सँवाद करके ही हल किया जा सकता है।

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आज वतन की आबरू,क्यूँ दाँव पर लगी है इस क़दर

क्यूँ है पराई अस्मिता पर बुरी नज़र

आख़िर क्यूँ चुन रही इँसानियत,अमृत की जगह ज़हर

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कितना शर्मनाक हो गया है आज अख़बार का हर पन्ना, जिसे मानवतावादी सँदेश प्रचारित करने का वाहन बनना था, आज वो हिंसक घटनाओं का पुलिंदा बन कर रह गया है। इस असाध्य रोग की चिकित्सा केवल खुद से सँवाद कर के ही हल की जा सकती है।

इसलिए –

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अब के नववर्ष की ओर हर एक संयमित क़दम उठाया जाए

खुद से खुद के सँवाद का ये कलमा हर रूह को पढ़ाया जाए

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