जय हिंद जय भारत

जय हिंद जय भारत

कविता मल्होत्रा

माँ शारदे को नमन और भारत माता का वँदन करते हुए, आध्यात्मिक समिधा की आहुति के साथ, निस्वार्थ प्रेम का आचमन, हर रूह के जीवन यज्ञ को सफल बनाए, इसी शुभकामना के साथ,इस लेख का आरँभ करती हूँ।

शीत ऋतु की विदाई के साथ बसँत के आगमन की दस्तक समूचे वातावरण में नवसृजन के लिए आत्मिक उर्जा का सँचार करती है।उस उर्जा का बहाव सही दिशा में सही सोच के साथ हो तो परस्पर सद्भावना की बुनियाद पर एक स्वच्छ समाज का निर्माण हो सकता है, जो स्वस्थ भारत की धरोहर को बौद्धिक समृद्धि प्रदान करे।

मकर संक्रान्ति का अमृत तत्व निस्वार्थ आत्मिकता के प्रत्येक  साधक को शताब्दियों का परिणाम देता है।क्यूँ न समाज में फैले आक्रोश के कुहासे को सात्विक पौष्टिकता में परिवर्तित करने का प्रयास किया जाए।

ज्ञान की देवी, माँ सरवस्ती, समस्त ब्रह्माण्ड की कलाओं को रचनात्मकता की आशीष देकर, ज़र्रे ज़र्रे में हरियाली खिलाने का सँदेश देती है।प्रत्येक जीवात्मा का ये कर्तव्य बै कि अपनी बौद्धिकता की सामर्थ्यानुसार वैश्विक कल्याण के लिए परस्पर सद्भावना की सरसों खिलाए।

गणतँत्र दिवस किसी विशेष जाति धर्म या सँप्रदाय से जुड़ा दिवस नहीं बल्कि राष्ट्रीयता की भावना से जुड़ा है।इसलिए महज़ ध्वजारोहण से देश के नागरिकों के कर्तव्य की इति नहीं हो जाती।इस दिन भारत का सँविधान लागू हुआ था, जिसका सम्मान प्रत्येक भारतवासी की कर्तव्यनिष्ठा का अभिमान है।

देश के बचपन को समृद्ध करके अपने वतन की समृद्धि की मशाल प्रज्वलित करने वाले आध्यात्मिक गुरू स्वामी

विवेकानन्द जी की जयँती केवल एक दिवस विशेष की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि समूचे जीवन दर्शन का सार है। विवेकानन्द जी का कहना था कि –

भला हम भगवान को खोजने कहां जा सकते हैं, अगर उसे अपने हृदय और हर एक जीवित प्राणी में नहीं देख सकते।

क्यूँ ना इस तथ्य पर पुन: विचार कर लिया जाए –

“ये दुआ है माँ शारदे की अाशीष जग पर बनी रहे

विवेकानन्द से मानसिक बल की प्रत्यँचा तनी रहे”

एक साथ इतने सारे आध्यात्मिक तत्वों की बरसात प्रत्येक जीव को केवल परस्पर सद्भावना के अमृत से भिगोने का प्रयास करती है।अब ये बात और है कि कौन कितनी मुट्ठी खोलता है और कितनी नकारात्मकता त्याग कर कितनी सकारात्मकता ग्रहण करता है।

पतझड़ में भी चँद गीत सृजन के गाएँ हम

विवेकानंद सी सामर्थ्य जग में फैलाएँ हम

सदा वैश्विक कल्याण का भाव ज्वलँत रहे

मन वचन कर्म में फिर हर पल ही बसँत रहे

माँ शारदे की स्तुति से परिपूर्ण धड़कन रहे

हर गणतँत्र दिवस मानवतावादी चिंतन रहे

गाँधी जयँती का मानक अहिंसा की राह हो

हर पल जग से अनासक्त प्रेम का निबाह हो

बहुत आसान होता है दूसरों पर दोषारोपण करके अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेना।क्रान्तिकारी सोच वाले मनुष्य ही मनुष्यता का प्रमाण बन कर एक स्वच्छ और स्वस्थ समाज का निर्माण करते हैं।आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता के प्रपँचों से मानवता का हनन करने वाले कभी शान्ति प्राप्त नहीं कर सकते। क्यूँकि प्रकृति का ये उसूल है कि मानव जो भी सृष्टि को बाँटता है सृष्टि उसे वही लौटाती है। तो क्यूँ न निस्वार्थता का ही उपहार बाँटा जाए, और अपने आप से ही शुरूआत की जाए, ताकि दृष्टिकोण बदलते ही सृष्टि की निराली छटा हर हृदय को बसँती रँग में रँग सके।

बना रहे मेरे अनमोल भारत की धरोहर का ठाठ

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क्या तुम्हें याद है बँधु

मुझे तो आज भी याद है

आँगन की दहलीज़ पर वो

दस्तक देती तीसरी पीढ़ी का

बाअदब शालीनतापूर्ण अँदाज़

अपनी वाणी बदन और निगाहों में

शालीनतापूर्वक समेट लेना हर भाव

और जुट जाना सत्कार में देकर पानी, चप्पल

परोसना गर्मागर्म दाल सब्ज़ी चावल रोटी फिर गुड़

बग़ल में रख कर अपने तमाम प्रशनचिन्हों के सब साज़

खिलाया क्या होगा उस पीढ़ी ने

जो हर शख़्स की रगों में दौड़ता रहा

परस्पर सद्भावना का सूफ़ियाना जुनून बनकर

परस रहे हैं क्या हम अपनी भावी पीढ़ी को सोचिए

बह रहा सभ्यता की शिराओं में,”सँस्कृति का ख़ून” बनकर

मिनी स्कर्ट,ऑफ़ शोल्डर और बैकलेस चोलियाँ 24 hr मेड

हुआ आज बहू बेटियों की आधुनिकता का एकमात्र पैमाना

शिशु,सदन में पल रहे और अभिभावकों का चुनाव मयखाना

शराब और शबाब में लिप्त,आज की पीढ़ी के, पक्के मकान

हाजी होने के प्रमाण पत्रों की खुली है हर नुक्कड़ पर दुकान

पूरब से होता था जो उजाला,बन गया पश्चिमी अब घोटाला

कभी चेहरों पर कभी बदन पर और कभी रिश्तों पर

आज सरेआम कैसे और क्यों होने लगे हमले तेज़ाबी

आख़िर कौन सा गुनाहगारी फल खा गई आज की पीढ़ी

पराई अस्मिता कुचल,चढ़ना चाहे जो कामयाबी की सीढ़ी

गली गली में स्वच्छता अभियान,और मैला दिलों का उन्वान

क्या विवेकानँद ने इसी भारत की कल्पना की थी

क्या अब्दुल क़लाम ने अलगाव का ख़्वाब बुना था

वासुदेव कुटुँब की महिमा कैसे भूल गया मेरा भारत

जिसने विभिन्नताओं में अभिन्नता का रास्ता चुना था

हैं परस्पर अभियोग,अपनाया मेरे वतन ने कैसा ये योग

वोट के लिए चोट और रोटी के लिए बोटी

फ़ैशन हो गया आज,खींचना एक दूजे की लँगोटी

एक से बढ़ कर एक योजना सरकारी,फिर भी बेरोज़गारी

दिलों के रिश्ते सोशल मीडिया पर ढूँढे,मेरे देश की लाचारी

रक्तमास सबका एक,तो भी इमारतों में रहे सब मस्तक टेक

नानक जीज़स मोहम्मद और राम

समूचे जग की उर्जा में बसे बनकर श्याम

फिर किस बात का झगड़ा और कैसी लड़ाई

जब अपने ही अँश से रब ने सारी दुनिया है बनाई

फैंक दें हथेलियों से मोबाइल,लाएँ चेहरों पर स्माइल

पढ़ लें फिर से एकता और सद्भावना का पाठ

बना रहे मेरे अनमोल भारत की धरोहर का ठाठ

गणतँत्र दिवस की सब भारतवासियों को बधाई दे दें

अपनी ही मानसिकता को वैश्विक बँधुत्व की रूबाई दे दें

अपनी ही स्वच्छ सोच से हो आग़ाज़,बने स्वस्थ सारा समाज

“जय हिंद जय भारत”

Special Article कविता और कहानी