जाने कहां गये वो दिन

जाने कहां गये वो दिन

यह बताते हुए अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है कि आपके अपने राष्ट्रीय पाक्षिक समाचार पत्र् ‘उत्कर्ष मेल’ इस अंक (1–15 नवम्बर) के साथ दसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है । प्रभु कृपा और आपका प्यार है । सम्पादकीय लिखते समय सर्वप्रथम उन दो विभूतियों को मैंने भी नमन किया और भावों से श्रद्धा-सुमन अर्पित किये । 31 अक्टूबर लौह पुरुष के नाम से विख्यात सरदार वल्लभ भाई पटेल की 144वीं जयंती है, जिसको पूरे देश ने एकता दिवस के रूप में मनाया । इसी दिन आयरन लेडी के नाम से मशहूर भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि भी है । इन्हें भी देशवासियों ने स्मरण किया और अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित किये ।
दीपावली के तुरंत बाद से ही दिल्ली–एनसीआर की आबोहवा दूषित या कहें इतनी जहरीली हो गई है कि खुली हवा में सांस लेना दूभर हो गया है । पिछले तीन वर्षों से लगातार इसका ठीकरा पंजाब व हरियाणा के किसानों द्वारा पराली जलाये जाने पर फोड़ दिया जाता है ।
मेरा मानना है कि यहाँ बात किसी पार्टी या प्रदेश की नहीं है, राज्य अथवा केंद्र सरकार की भी नहीं है । यदि समस्या का कारण हम पहले से ही जानते हैं फिर आपस में मिलकर समाधान निकाल क्यों नहीं पा रहे हैं ।
जाने कहां गये वो दिन–– अभी स्वच्छता अभियान की बहुत बातें हुर्इं । सरकार ने अभियान छेड़ा हुआ है । शायद हमें बाहरी कचरे के साथ–साथ अपने मन के भीतर जमा कचरे को भी साफ करना होगा । याद करें जब राजनीति में विचारधारा की लड़ाई होती थी । लेकिन व्यक्तिगत रंजिश नहीं होती थी । जब देश में कोई समस्या आती थी तब सभी राजनीतिक दल मिलकर राष्ट्र हित में समाधान निकालते थे । आज हमें क्यों बाहर से डेलीगेट बुलाकर उनसे प्रमाण लेना पड़ रहा है कि जम्मू कश्मीर में सब ठीक है । यह भारत का आंतरिक मामला है । हम क्यों नहीं सभी पार्टियों के मुखिया या विचार प्रकोष्ठ प्रतिनिधि मिलकर समस्या का हल कर लेते हैं ।

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