जिन खोजा तिन पाईया ,गहरे पानी पैठ!

जिन खोजा तिन पाईया ,गहरे पानी पैठ!

होम मिनिस्ट्री से उम्मीदे बढ़ गयी है । एकाएक गडकरी चचा की दस बरिश पुरानी दो पहिया प्रदूषण सर्टिफिकेट पाकर ऑक्सिजन उगलने लगी किन्तु यकीन मानिए कल तक उसमे से काला धुँआ निकलते देखा गया था । देश  में एक ग्रहनाशक यज्ञ कराने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए काहे से  कि आजकल पूरा भारत देश भयंकर मंदी से गुजर रहा , मोदी जी सीवन साहब की पीठ थपथपाने मे व्यस्त है राहुल सोनिया एंड कम्पनी पाकिस्तान को मुद्दे होम डिलिवरी करने मे व्यस्त है और देश के ही एक होम मिनिस्टर जेल से आए हैं, दूसरे जेल में हैं और तीसरे के जेल जाने के प्रबल योग बन रहे हैं। ये तीसरा हैं पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद, जिनके लिए तिहाड़ के द्वार स्वागत के लिए खुल भी सकते हैं।

मुझ  पर ऐसे-वैसे आरोपों पर  मित्रों (दोनों पक्षों के) की टिप्पणियों में की आप ओपेन व्यंग्य लिखते है पर  मैंने कई बार कहा  कि बिना आग के धुआं नहीं होता, अब चिन्मयानंद इस वक्त न मंत्री हैं, न सांसद हैं, न संगठन में कोई बड़ी भूमिका में हैं, इसलिए उनके खिलाफ साज़िश वगैरह से किसी को कोई पॉलिटिकल माइलेज़ वगैरह तो मिलने से रहा, साथ ही इनकी इमेज पहले से भी कोई इज्जतदार की है नहीं, जो इस तरह के गंदे आरोप लगाकर कोई धूमिल करने की सोचे, हां ये ज़रूर हो सकता है कि बुढ़ापे में जवान गर्लफ्रेंड रखते हों, सबकुछ सहमति से करते हों, वैसे ही जैसे उनके जैसे वरिष्ठ पार्टी जनों से प्रेरणा लेकर वो यूपी वाले संगठन मंत्री या कुल्लू वाला युवा नेता-नेत्री का जोड़ा करता है, जिनके लीक वीडियो ने हाल के दिनों में जबर्दस्त सुर्खियां हासिल की थी। अब तरह-तरह के खेल होंगे, नए-नए वीडियो आएंगे, कोई दावा करेगा कि लड़की सच्ची है, कोई दावा करेगा नेता सच्चा है, कोई कहेगा यौन शोषण हुआ, कोई कहेगा ब्लैकमेल की साज़िश थी, हो-हल्ला मचेगा, दोषी-निर्दोष की बात होगी, लेकिन चिन्मयानंद ही क्यों? कई ऐसे नेता हैं, जिनका सार्वजनिक जीवन बेदाग रहा है, चिन्मयानंद का क्यों नहीं? खैर बड़े लोगों की बातें हैं, हमें क्या लेना-देना, हम तो भैया ऐसी गंदी बातों पर कतई नहीं लिखना चाहते, क्योंकि घिन आती है । अब जानें अपना धर्म भ्रष्ट करने वाले लोग, हमारी गुज़ारिश बस इतनी है कि जिनका आचरण अनियंत्रित हो, वो अपने नाम के आगे स्वामी, संत वगैरह लगाकर हमारे धर्म की मर्यादा का माखौल न बनाएं, हम सनातनी लोग हैं, जिन्हें ऐसी ख़बरों से आंतरिक ठेस लगती है, कलंक से बड़ा कालिख कुछ नहीं होता, चरित्र से बड़ा बल कुछ नहीं होता, सदियों से ब्राह्मण यही शिक्षा तो देते रहे हैं समाज को, लेकिन ओम बिड़ला ने यही बात कह दी जिस पर तूफान मचा हुआ है।

अब नया समाज है, नई सोच है, लेकिन ओम बिड़ला की सोच अतीत की वर्ण व्यवस्था पर ही टिकी रह गई। उस दौर में हिंदू समाज में ब्राह्मणों के हिस्से में यही काम आया था। सत्ता संचालन क्षत्रियों को करना था, कारोबार-व्यापार वैश्यों को, सेवा-नौकरी शूद्रों को और इस सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की शिक्षा-दीक्षा-जिम्मेदारी ब्राह्मणों को। ये व्यवस्था दौर बदलने के साथ बदली, अब ब्राह्मण भी व्यापार करते हैं, वैश्य भी सत्ता चलाते हैं, शूद्र भी शिक्षण ज्ञान देते हैं और क्षत्रिय भी नौकरी करते हैं। ब्राह्मणों के कार्यक्रम में लोकसभा स्पीकर ने एक राजनेता की तरह वहां मौजूद लोगों की भावनाओं को संतुष्ट करने वाली बात कह दी, नतीजा ये कि सब पीछे पड़ गए। ज़मीनी सच्चाई ये है कि अभी भी ब्राह्मणों का असर दिखता है, हर जाति के लोग अपने परिवार के हर शुभ कार्य में बिना ब्राह्मण को बुलाए नहीं मानते, हर परेशानी में बिना ब्राह्मण से कुंडली, हस्तरेखाएं जंचवाए नहीं मानते और हर मंदिर में ब्राह्मणों से प्रसाद चढ़वाए बिना भी नहीं मानते, यानी ब्राह्मणों को श्रेष्ठ मानते हैं, इस दौर में भी, जब ब्राह्मण सत्ता से बाहर हैं, वोटबैंक में कमज़ोर हैं, सिर्फ अपनी शिक्षा के दम पर आरक्षित व्यवस्था के बावजूद वजूद बनाए हुए हैं। मैंने ब्राह्मण श्रेष्ठता का समर्थन-विरोध किए बिना जो दिखता है, वो आपके सामने रख दिया, अगर ऐसा नहीं है तो फिर आप भी विरोध जता सकते हैं। वैसे भी ये पंक्तियाँ बिल्कुल सही है की जिन खोजा तिन पाईया गहरे पानी पैठ । ——- पंकज कुमार मिश्रा जौनपुरी 8808113709

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