नफरत की लाठी तोड़ो

नफरत की लाठी तोड़ो

मनमोहन शर्मा ‘शरण’ (प्रधान संपादक)
मार्च के प्रथम पखवाड़े में ‘होली’ त्यौहार है । बात ‘होली’ की करूँ या जो दिल्ली में ‘हो + ली’, उसकी करूँ । संपादकीय लिखते समय यही विचार मेरे मन में उपज रहा है ।
‘होली’ त्यौहार आपसी मेलजोल एवं सद्भावना को बढ़ावा देने वाला है, आप सभी को इस अवसर पर ‘उत्कर्ष मेल’ की समस्त टीम की ओर से बधाई देता हूँ कि जिस सद्भावना–प्रेम से हम जीते आ रहे हैं, सर्वे भवन्तु सुखिन: का नाद हमारे दिल में है, फिर नफरत की जगह ही कहां बचती है ।
बात ‘हो + ली’ की करूँ तो यह समझ पाना दिल्लीवासियों के लिए ही नहीं, पूरा देश और यहां तक कि पूरे विश्व की निगाहें टिकी हैं, कि दिल्ली में हो क्या रहा है, क्यों हो रहा है ? क्या सक्षम केन्द्र इसको रोकपाने में असक्षम रहा अथवा हम अपनी बात समझाने में विफल रहे । शाहीनबाग से बात निकली और पूर्वी दिल्ली में कौहराम मच गया । तोड़फोड़, आगजनी, हत्या तक कर दी गयी, 40 से अधिक जानें चली गयी दुकानों में तोड़फोड़ के कारण जो नुकसान पहुँचा, इसको हम क्यों नहीं रोक पाए, यह अभी प्रश्न ही बना हुआ है ।
गृहमंत्री जी स्वयं वहां तक भले ही न जाते किन्तु प्रदर्शनकारियों के शिष्ट मंडल को बुलाकर समझाने–बुझाने का प्रयास तो किया जा सकता था । यदि हम जो कर रहे हैं वह ठीक है तो हम समझा क्यों नहीं पा रहे हैं ।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में एकतरफा जीत प्राप्त कर केजरीवाल जी एक बार फिर मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो गए । उनसे भी कुछ उम्मीद लगाई जा रही होंगी किन्तु उनका मामला नहीं है, इसलिए केंद्र की तरफ ही टकटकी लगाए रहे, शायद कुछ हल निकलेगा, लेकिन इतने में दंगाई भीड़ अपना काम करने लगती है । हाहाकार मच जाता है और इतने मरे–इतने घायल यही सब समाचारों में, टीवी चैनलों में, घर–दफ्तरों आदि सभी स्थानों पर एक ही चर्चा, जो दिख रहा है वास्तविकता इससे परे है । दिल्ली दिलवालों की है दोस्त, यहां नफरत का कोई काम नहीं है । ‘नफरत की लाठी तोड़ो, लालच का खंजर फेंको–––––––आपस में प्रेम करो––––देश प्रेमियो!’

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