….. नहीं नहीं ‘मंदी’ है भाई

….. नहीं नहीं ‘मंदी’ है भाई

गाँधी –पटेल के सपनों का भारत, फिर से सोने की चिड़िया कहलायेगा अपना भारत, 5 ट्रिलियन इकोनॉमी होगी यहां की, सभी देशवासियों को घर नसीब होगा । विदेश में जमा धन लौट आएगा भारत में । प्रत्येक नौजवान नौकरी/ रोजगार पर होगा । देश में भी काला धन बाहर आ जाएगा और देश नं 1 बन जाएगा । आपको भी याद ही होगा कुछ ऐसा ही––––– मित्रों, मैं कोई आश्वासन, सपने नहीं दिखा रहा हूं । बात इतनी सी है कि सन् 2014 से पूर्व यूपीए कार्यकाल में एक के बाद एक घोटालों का उदय होना, जिससे जनता उकता सी गई थी और परिवर्तन का मन बनाने लगी थी तभी एक सशक्त आवाज गूंजने लगी और इस प्रकार के सपनों या उम्मीद की किरण देशवासियों में जागने लगी या जगाई जाने लगी । परिवर्तन हुआ, जश्न हुआ और सपने परवान चढ़ने की उम्मीदें बुलन्द होने लगीं ।
फिर एक के बाद एक कठोर निर्णय लिए गये जिनसे जनता तिलमिलाई भी किन्तु एक आश्वासन था कि यह कड़वी दवा है हमारी भलाई के लिए । जैसे तैसे – नोटबंदी झेली, जीएसटी – जो अभी तक पूरी तरह से समझ से परे है, बहुत संशोधन पहले ही हो चुके हैं, बावजूद इसके अभी और सरल बनाने का प्रयास जारी है । आज जनता महंगाई से जूझ रही है, बेरोजगारी बढ़ती जा रही है और विकास दर घटती जा रही है ।
भाईयो और बहनो! आपको याद होगा कठोर निर्णय लेने का माद्दा रखने के कारण सराहना भी बहुत मिली और अंग्रेजी में तो MODI (Man of Determination Inside) आदि आदि , राष्ट्रवाद के नारे बुलन्द होने लगे, कठिनाइयों के बावजूद जनता ऐसी पार्टी, ऐसा नेता पसन्द करने लगे जिनके साथ सपने संजोए थे, हम होंगे कामयाब एक दिन ।
अब हम 2014 से 2019 को भी पार करके 2020 में प्रवेश कर रहे हैं । यदि आंकलन करते हैं जिसके लिए पूरा मीडिया, बुद्धिजीवी वर्ग सजग रहता है । हम पाते हैं कि जो हम सोचकर चले थे इसके इतर हम कुछ और पा रहे हैं । बेरोजगारी महंगाई चरम पर, विकास दर चरमरा रही है । अभी अंग्रेजी में तो हमने पर्यावाची कई पाये । अब हिंदी में कहीं गलती से यह न कह बैठें ‘मोदी’ नहीं नहीं ‘मंदी’ है भाई–––

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