” नारी ”  (कविता-1)

” नारी ” (कविता-1)

कोंख बसर में रख तूं पाला

राम कृष्ण महावीर बुद्ध ;

नानक ईशा कलाम

विवेकानन्द मनीषी प्रबुद्ध!

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पतिव्रत धर्म निभाने को

पाहन रूप धरी अहिल्या ;

सतीत्व को सत्यापित करने

अग्नि परीक्षा से गुजरी सीता!

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पति के स्वाभिमान की रक्षा में

सती हो गयी हिमालय नन्दनी ;

सबरी धीरज की सुकुमार हृदया

नारी इतिहास रहा सदैव वन्दनीय!

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मणिकर्णिका मनु लक्ष्मी बाई

अंग्रेजों को नाकों चने चबवाई;

भक्तिभाव उद्दात समर्पण मीरा

कृष्ण कृष्ण टेर एक तार बजाई!

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राधा प्रतिबिम्ब कृष्ण प्रेम की

तारामती पति धर्म निभाई ;

पुत्रशोक विह्वल माँ विलखती

अंचरा फाड़ शव कर्ज चुकाई!

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बिन बिन तृण दाने दिन भर

चञ्चु चुगाती  दूध पिलाती;

डयनों पर उड़ना सिखलाती

शावक को सिंह शेर बनाती !

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नारी तूं खेतों में खटती

चाक की मिट्टी लौंदे गढ़ती;

तूं कठोर परिश्रम से थकती

रहती पर आंखो में हंसती!

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नारी तूं सृजनिका ब्रह्माणी

नारी शक्ति प्रबोधन महतारी;

संस्कार मर्यादा की वाहिका

दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती नारी!

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-अंजनीकुमार’सुधाकर’

Special Article कविता और कहानी