नारी है इस जग की मूल… (कविता-3)

नारी है इस जग की मूल… (कविता-3)

नारी है इस जग की मूल

रे नर! दे न इनको शूल…..

     त्याग, समर्पण, सेवा धर्म

     करती यह तन्मय हो कर्म

     रखती हरदम सबका मान

     घर, आंगन की इनसे शान

     झोंक न खुद आँखो में धूल

     रे नर! दे न इनको शूल….

दिव्य गुणों से यह परिपूर्ण

करती विपदाओं को चूर्ण

साहस, धैर्य, पूर्ण है अन्तर्

लड़ती निर्भय और निरन्तर

समय भले कितना प्रतिकूल

रे नर! दे न इनको शूल…… 

    बांध न पग में इनके बंधन

    लगने दे सर पर जय चंदन

    मर्यादा का है इनको ध्यान

    करती कभी नहीं अभियान

    संशय तेरा है सब निर्मूल

    रे नर! दे न इनको शूल……

पावन, सूचि, प्रिय सम्बन्ध

समझ न इनको तू अनुबंध

इनसे ही शोभित संसार

मात्र  नहीं  नारी  श्रृंगार

यद्यपि रूप सुकोमल फूल

रे नर! दे न इनको शूल…..

      विविध रूप, नाना उपकार

      यह शुभ, शोभा की अवतार

      धर्मग्रन्थ सब वेद, पुराण

       देते इसके विपुल प्रमाण

        इनसे ही गौरव मत भूल

        रे नर! दे न इनको शूल…..

ममता, नम्रता की यह मूरत

लक्ष्मी, शक्ति, सरस्वती सूरत

कभी करो न इनका निरादर

मिले इन्हें समुचित नित आदर

कर लेगीं फिर सब अनुकूल

रे नर! दे न इनको शूल….

       नारी है इस जग की मूल

       रे नर! दे न इनको शूल…..

 डाॅ. राजेन्द्र सिंह “राही “

Special Article कविता और कहानी