नेहरू जयंती विशेष – आधुनिक भारत के सक्रिय राजनेता  !

नेहरू जयंती विशेष – आधुनिक भारत के सक्रिय राजनेता !

            जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को ब्रिटिश शासन काल के भारत में इलाहाबाद बदला हुआ नाम प्रयागराज  में हुआ था । जवाहर के पिता मोतीलाल नेहरू एक धनी बैरिस्टर जो कश्मीरी पण्डित थे। मोती लाल नेहरू सारस्वत कौल ब्राह्मण समुदाय से थे,  उनकी माता का नाम  स्वरूपरानी थुस्सू था, जो लाहौर में बसे एक सुपरिचित कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थी । मोतीलाल की दूसरी पत्नी थी व पहली पत्नी की प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई थी। जवाहरलाल तीन बच्चों में से सबसे बड़े थे , जिनमें बाकी दो लड़कियां थी। बड़ी बहन, विजया लक्ष्मी जो बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनी तथा सबसे छोटी बहन, कृष्णा हठीसिंग एक उल्लेखनीय लेखिका बनी और उन्होंने अपने परिवार-जनों से संबंधित कई पुस्तकें लिखीं। नेहरू जी ने अपने पूरे जीवन काल में आधुनिक भारत का को सपना देखा आज वो प्रासंगिक है ।जवाहरलाल नेहरू आजादी के बाद भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री के रूप में अपने राजनीतिक कैरियर की दूसरी पारी शुरू की ।  स्वतन्त्रता के पूर्व और पश्चात् की भारतीय राजनीति में केन्द्रीय व्यक्तित्व थे। महात्मा गांधी के संरक्षण में, वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सर्वोच्च नेता के रूप में उभरे और उन्होंने 1947 में भारत के एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में स्थापना से लेकर 1964 तक अपने निधन तक, भारत का प्रतिनिधित्व  किया। वे आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य – एक सम्प्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतान्त्रिक गणतन्त्र – के वास्तुकार माने जाते हैं। कश्मीरी पण्डित समुदाय के साथ उनके मूल की वजह से वे पण्डित नेहरू भी बुलाए जाते थे, जबकि भारतीय बच्चे उन्हें चाचा नेहरू के रूप में जानते हैं । उन्होंने अपने भारत में कभी भ्रष्टाचार को पनपने नहीं दिया । उन्होंने अपने अधीनस्थ अधिकारियों और मातहतों को कहा था कि जनता के लिए करो जनता का करो , स्वयं के लिए तो पशु भी कर लेते है । उनके इसी स्वभाव से लोग उनसे प्रभावित थे किन्तु आज अधिकारी सिर्फ और सिर्फ अपने लिए करता है । एक अदना सा ऑफिस का सरकारी बाबू भी करोड़ों की संपत्ति बना लेता है । जज साहब के नाक के नीचे से उनका पेशकार घूस खाता है ,तारीख डालने की फीस वसूलता है । गरीबों के काम को आजकल के नेता ऐसे नकारते है जैसे ये गरीब किसी और मुल्क से आए है और इनके लिए मतदान नहीं करते । ऐसी विसंगतियों से युक्त भारत की कल्पना नेहरू जी ने कभी नहीं की थी । आज समाज को ऐसी विसंगतियों से निकलना होगा । देश को सही दिशा में ले जाने के लिए ,अफसरशाही ,भ्रष्टाचार , और महिला अत्याचार जैसे बुराइयों के खिलाफ एकजुट होना होगा ।

         हमारे देश प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिवस 14 नवंबर को पूरे देश में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। नेहरू जी को लोग प्यार से चाचा नेहरू या चाचाजी कहकर भी बुलाते थे। पं0 जवाहर लाल नेहरू बच्चों को बहुत प्यार करते थे, यही कारण है कि उनके जन्मदिन को अब बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। पंद्रह साल की छोटी सी उम्र में वे इंग्लैंड चले गए और  दो साल रहने के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया जहाँ से उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। 1912 में भारत लौटने के बाद वे सीधे राजनीति से जुड़ गए । उन्होंने आयरलैंड में हुए सिनफेन आंदोलन में गहरी रुचि ली थी। 1912 में उन्होंने एक प्रतिनिधि के रूप में बांकीपुर सम्मेलन में भाग लिया एवं 1919 में इलाहाबाद के होम रूल लीग के सचिव बने। 1916 में वे महात्मा गांधी से पहली बार मिले जिनसे वे काफी प्रेरित हुए। उन्होंने 1920 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में पहले किसान मार्च का आयोजन किया। 1920-22 के असहयोग आंदोलन के सिलसिले में उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा। नेहरू जी सितंबर 1923 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बने। उन्होंने 1926 में इटली, स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड, बेल्जियम, जर्मनी एवं रूस का दौरा किया। बेल्जियम में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में ब्रुसेल्स में दीन देशों के सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने 1927 में मास्को में अक्तूबर समाजवादी क्रांति की दसवीं वर्षगांठ समारोह में भाग लिया। इससे पहले 1926 में, मद्रास कांग्रेस में कांग्रेस को आजादी के लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध करने में नेहरू की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के खिलाफ एक जुलूस का नेतृत्व करते हुए उन पर लाठी चार्ज किया गया था। 29 अगस्त 1928 को उन्होंने सर्वदलीय सम्मेलन में भाग लिया एवं वे उनलोगों में से एक थे जिन्होंने भारतीय संवैधानिक सुधार की नेहरू रिपोर्ट पर अपने हस्ताक्षर किये थे। इस रिपोर्ट का नाम उनके पिता श्री मोतीलाल नेहरू के नाम पर रखा गया था। उसी वर्ष उन्होंने ‘भारतीय स्वतंत्रता लीग’ की स्थापना की एवं इसके महासचिव बने। इस लीग का मूल उद्देश्य भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से पूर्णतः अलग करना था।1929 में पंडित नेहरू भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन के लाहौर सत्र के अध्यक्ष चुने गए जिसका मुख्य लक्ष्य देश के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना था। उन्हें 1930-35 के दौरान नमक सत्याग्रह एवं कांग्रेस के अन्य आंदोलनों के कारण कई बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने 14 फ़रवरी 1935 को अल्मोड़ा जेल में अपनी ‘आत्मकथा’ का लेखन कार्य पूर्ण किया। रिहाई के बाद वे अपनी बीमार पत्नी को देखने के लिए स्विट्जरलैंड गए एवं उन्होंने फरवरी-मार्च, 1936 में लंदन का दौरा किया। उन्होंने जुलाई 1938 में स्पेन का भी दौरा किया जब वहां गृह युद्ध चल रहा था।

                      द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से कुछ समय पहले वे चीन के दौरे पर भी गए।पंडित नेहरू ने भारत को युद्ध में भाग लेने के लिए मजबूर करने का विरोध करते हुए व्यक्तिगत सत्याग्रह किया, जिसके कारण 31 अक्टूबर 1940 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें दिसंबर 1941 में अन्य नेताओं के साथ जेल से मुक्त कर दिया गया। 7 अगस्त 1942 को मुंबई में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में पंडित नेहरू ने ऐतिहासिक संकल्प ‘भारत छोड़ो’ को कार्यान्वित करने का लक्ष्य निर्धारित किया। 8 अगस्त 1942 को उन्हें अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर अहमदनगर किला ले जाया गया। यह अंतिम मौका था जब उन्हें जेल जाना पड़ा एवं इसी बार उन्हें सबसे लंबे समय तक जेल में समय बिताना पड़ा। अपने पूर्ण जीवन में वे नौ बार जेल गए। जनवरी 1945 में अपनी रिहाई के बाद उन्होंने राजद्रोह का आरोप झेल रहे आईएनए के अधिकारियों एवं व्यक्तियों का कानूनी बचाव किया। मार्च 1946 में पंडित नेहरू ने दक्षिण-पूर्व एशिया का दौरा किया। 6 जुलाई 1946 को वे चौथी बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए एवं फिर 1951 से 1954 तक तीन और बार वे इस पद के लिए चुने गए। नेहरू जी ने भारतीय राजनीति के इतिहास में ना सिर्फ इसलिए खुद को दर्ज करवाया कि वो प्रथम प्रधानमंत्री रहे अपितु वो इसलिए जाने जाते है कि वो एक भावनात्मक व्यक्तित्व भी रहे । एक अच्छे मार्गदर्शक और लेखक के रूप में भी अपनी छाप छोड़ उन्होंने राजनीति में लेखन के चलन का आगाज किया । उनकी लिखी कई पुस्तकें आज भी वर्तमान भारत को पुरातन भारत से जोड़ती है । उन्होंने सक्रिय राजनीति से कभी सन्यास नहीं लिया और कांग्रेस के मूल विचारधारा को जीवित बनाए रखा ।

           ____ पंकज कुमार मिश्रा

                    ( असिस्टेंट प्रोफेसर एवं पत्रकार, केराकत जौनपुर 8808113709)

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