पश्चिम बंगाल: तू चल मैं आया

पश्चिम बंगाल: तू चल मैं आया

राजनीतिक सफरनामा

                                                                                                   कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

एक कहावत है कि जब नाव डूबने वाली होती है तो सबसे पहिले उस नाव में सवार चूहे ही भागते दिखाइ्र देते हैं । पश्चिम बंगाल में भी यही हो रहा हे । अब यह तो नहीं कह सकते कि ममता बैनर्जी की नाव वाकई डूबने वाली है पर उनकी नाव में जो सवार थे वे ऐसे ही भय से भागते दिखाई दे रहे हैं । भारत के लोकतंत्र का यह नया रूप है । यहां सिद्धांत नहीं कुर्सी महत्वपूर्ण होती है । हर बार जिस भी प्रदेश में विधान सभा चुनाव होते हैं वहां ऐसी भागमभाग दिखाई दे जाती है । भागते वो ही है जिनके पास सिद्धांत नहीं होते या जिन्हें केवल कुर्सी प्यारी होती है । यदि उन्हें वाकई अपनी ही पार्टी के सिद्धांतों से या उनके आचार-विचारों से परेशानी है तो वे चुनाव की राह ही क्यों देखते हैं पहिले भी पार्टी छोड़ सकते हैं या वाकई उन्हें कुर्सी का लोभ नहीं है तो अपनी पार्टी छोड़ने के बाद फिर ताल ठोकते दिखाई न देते । पर ज्यादातर बार ऐसा नहीं होता । चुनाव नजदीक आते ही उनकी लुप्त हो चुकी अंतरात्मा यकायक जाग जाती है और वे इस अकारण जागी हुई अंतरात्मा की आवाज पर अपनी ही पार्टी को छोड़ देते हैं और उस पार्टी का झंडा अपने गले में डाले लेते हैं जिसे बुरा भला कहते-कहते वे नेता बने हैं । नेताओं की अंतरात्मा आम लोगों की अंतरात्मा से बिल्कुल अलग होती है । आम लोगो की आंतरात्मा तो हर समय जागती रहती है पर नेताओं की अंतरात्मा केवल चुनावों के समय ही जागती है । वह जागती है और दलबदल लेती है । अभी अंतरात्मा जागने का दौर पश्चिम बंगाल में चल रहा है जहां चुनाव होने हैं । वहां प्रतिदिन किसी न किसी नेता की आत्मा उन्हें जगाकर झिंझौड़ रही है और वे बेचारे अपनी वर्तमान पार्टी का गमछा उतारकर नया गमछा पहन कर अपनी आत्मा की शांति के उपाय ढूंढ़ रहे हैं । उनकी यह जागी हुई आत्मा तब तक जागती रहेगी जब तक वहां चुनाव न हो जाये और वे फिर से कुर्सी पर आसीन न हो जायें । एक बार फिर कुर्सी पर बैठते ही उनकी आत्मा फिर से सो जाती है । राजनीति का यह नया ट्रेंड है । 21 वीं सदी वाला ट्रेंड इसमें सिद्धांत नहीं चलते इसमें समाजसेवा के केवल शब्द घोषित किए जाते हैं इसमें राजनीतिक दलों के प्रति प्रतिबद्धता केवल कुर्सी तक सीमित रहती है । जिस प्रदेश में चुनाव होते हैं वहां से ऐसी रोज खबरें आनी शुरू हो जाती है । अब तो आम व्यक्ति चुनावों के बारे में ऐसे ही अंदाजा लगा रहता है कि जिस प्रदेश में दल बदलने वाले नेताओं की संख्या बढ़ जाती है तो मान लिया जाता है कि निकट भविष्य में वहां चुनाव होने वाले हैं । पश्चिम बंगाल में चुनावों का परिणाम जो भी रहे पर वहां जो कुरूक्षेत्र का मैदान बना हुआ है उससे महाभारत के जीवंत द ृश्य कर अनुभव तो होने ही लगा । पश्चिम बंगाल मे हिंसा बहुत खतरनाक है इसे तो रोका जाना चाहिए । कोई किसी दल में रहे, मतभिन्नतायें अलग होती हैं पर मतभेद बिल्कुल अलग है । राजनीति में मतभिन्नतायें का तो स्थान है पर मतभेदों का नहीं और वो भी ऐसे मतभेद जो हिंसा में तब्दील हो जाऐं । पश्चिम बंगाल हिसंाग्रस्त तो वैसे भी रहता  है लोगों को मार दिया जाता है, उनके घरों को जला दिया जाता है यह सब कुछ तो बंद होना चाहिए । पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य बनता जा रहा है जहां हिंसा प्रमुख होती जा रही है । ऐसी स्थिति को तो रोका जाना चाहिए ं लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं होता । यह नहीं कहा जा सकता की इसके लिए दोषी कौन है पर प्रशासनिक व्यवस्थायें सत्तारूढ़ दल के पास रहती है इसलिये स्वाभाविक रूप से उन्हें दोषी कहा जा सकता है । वैसे भी पश्चिम बंगाल में हिंसा प्रमुख मुद्दा बनी हुई है । पश्चिम बंगाल के विधान सभा चुनावों की घोषणा तो कभी भी हो सकती है । पर वहां चुनावी हलचल पिछले कई दिनों से चल रही है । भाजपा जैसी पार्टी तो पिछलें कई सालों से वहां तैयारी में जुटी हुई है । उसका वहां कोई जनाधार था भी नहीं यही कारण है कि पिछले विधानसभा चुनावों में उसे ज्यादा सफलता नहीं मिली पर लोकसभा चुनावों में उसे उम्मीद से ज्यादा सफलता मिल गई इसलिए उनके हौसले भी बुलदं है । उसने उसी आधार पर अपनी शतरंज बिछा दी है । एक-एक मोहरे पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है इसी के चलते मोहरे यहां से वहां हो रहे हैं । ममता बैनर्जी पिछले दस सालों से वहां मुख्यमंत्री हैं तो स्वाभाविक है कि उनके खिला एन्टीइनकम्बेंसी वोटें तो रहेगीं ही । भाजपा इसका फायदा लेना चाहती है । ममता जी की पार्टी में जो भगदड़ मची है वह भी एन्टीइनकम्बेंसी वोटों के भय के कारण ही है । वैसे भी ममता जी ने अपने संघर्ष और जुझारू शेैली के चलते वामवंथियों को सत्ता से अलग किया था जिन्होने लम्बे समय तक पश्चिम बंगाल पर शासन किया । आज उनके लिए भी ऐसी ही चुनौती मिल रही है ।  चुनावों के परिणाम क्या होगें वह तो भविष्य के परिदृश्य में छिपा है पर इतना अवश्य हे कि इस बार जिस भी पार्टी की जीत होगी उसे बेहद संघर्ष करना होगा और इस संघर्ष को भविष्य में भी बनाए रखना होगा । राजनीति से अब विकास के मुददे तो वैसे भी गायब हो चुके हैं, पश्चिम बंगाल में भी ऐसे मुद्दे पटल से गायब हैं । केन्द्र की योजनाओं को पश्चिम बंगाल में लागू न करने की ममता जी की पालसी अब उन्हें भारी पड़ती दिखाई दे रही है । प्रधानमंत्री ने जिस तरह अपनी मन की बात में किसानों की सम्मान निधि पश्चिम बंगाल में न दे पाने का जिक्र किया था उससे वे कठघरे मे खड़ी होती दिखाई दीं । चुनाव के बाद की तस्वीर क्या होगी यह तो नहीं कहा जा सकता पर वर्तमान कठिन दिखाई दे रहा है । ममता जी अकेले पूरी ताकत के साथ प्रचार की कमान सम्भाले हुए हैं और भाजपा पूरे दलबल के साथ लगी हुई है । अभी का वातावरण सत्तारूढ़ दल के लिए कठिन साबित हो रहा है ।

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