बच्चों को दे स्वच्छ वातावरण, ताकि खुलकर बोल सके

बच्चों को दे स्वच्छ वातावरण, ताकि खुलकर बोल सके

घर में कोई शादी हो या पूजन – पाठ, या कोई भी अन्य आयोजन, खर्च और रिश्तेदारों की फिकर से इतर इन आयोजनों का सबसे अधिक आनंद इस घर के बच्चे ही उठाते हैं। जिन्हें न खर्च की फिक्र होती है न ही रिश्तेदारों के नखरे झेलने की, वह तो अपनी ही मौज में मस्त होकर अपने चार यार ढूंढ़कर मग्न हो जाते हैं। उनका यही अंदाज ही तो उन्हें बच्चा बनाता है। जिस बचकाने में न कोई बंधन होता है और न की कोई चिंता उन्हें सताती है कई बार तो भूखे पेट भी दिनभर अपने दोस्तों और खिलौनों के साथ गुजार कर भी यह खुश रहते हैं। सही मायनों में बच्चों की यह खुशी और बेरोकटोक शैतानियां घर के बड़ों के चहरे पर मुस्कान लाती हैं। अपनी व्यस्तत दिनचर्या में घर के बड़ों को भी इनकी शैतानियों से राहत मिलती है। इनके मासूम उपद्रवों से वह शुकून भी पाते हैं।

        बच्चों की मासूमियत और शैतानियों के पीछे कई बार एक अजीब सा सन्नाटा पसर जाता है, वह अचानक चुपचाप से, शांत से रहने लगते हैं। इस शांति के बीच घर वालो के लिए कई बार उनका बच्चा समझदार हो जाता है और वह इसके पीछे कोई वजह तलाशने की कोशिश नहीं करते। उनका यह वहम उस मासूम से बचपन और बचकानी शरारतें दोनों धीरे-धीरे छीनता जाता है और वह बच्चा अपनी दुनिया से दूर एक अलग सी दुनिया में खोने लगता है। यह दुनिया उसे भीड़ भरे आयोजनों में भी अकेला कर देती है। वह न किसी से अधिक बात करते और न ही खेलते, न ही पहले जैसे मौजीले स्वभाव के रहते बस अपने अंदर एक उदासी सी समेटे बैठे रहते हैं। भौतिक सुख सुविधाओं की दौड़ में जब तक माँ-बाप कुछ समझ पाएं तब तक बहुत देर हो जाती है।

       जी हाँ, हम बात कर रहे हैं बाल लैंगिक शोषण की जो आज के समय में एक ऐंसी समस्या बनकर सामने आ रहा है जिससे बच्चों की सुरक्षा को लेकर हर एक वर्ग चिंता की गर्त में   है। यह शोषण कोई और नही बल्कि उनका कोई अपना ही उनके साथ करता है। जिसे वह अपना समझकर विश्वास जताता हैं वही अपना इस पीड़ित से उसका हंसता खेलता बचपन छीन लेता है और उन्हें अवसाद, अनिद्रा और उदासी जैसी कई अनेकों सौगात देता है। इन अपनों में उसके पिता, भाई, चाचा, मामा, चचेरे /ममेरे रिश्तेदारों के साथ पारिवारिक दोस्त भी शामिल हो सकते हैं जो बिना संदेह में आए आसानी से बच्चों को अपना शिकार बना लेते हैं। यह वही अपने होते हैं जो हर समय उन बच्चों को आसपास रहते हुए यौनिक गतिविधियों को अंजाम देते हैं।

     भारतीय परिवारों के यौन संबंधी चर्चाओं को घर के अंदर या स्कूलों में अधिक तवज्जो नहीं दी जाती जिसके कारण घर के बच्चे यौन शिक्षा से अछूते रह जाते हैं। आज भी, अधिकतर अपराधी, पीड़ित बच्चे का कोई जानकार या पीड़ित के परिवार का जानकार या पीड़ित बच्चे का कोई करीबी ही होता है। इस निकटता के कारण ही अपराधी अनुचित लाभ उठाता है, क्योंकि वो जानता है कि वो किसी भी तरह के विरोध से बचने में सक्षम है, ये एक पारिवारिक विषय माना जाता है जिसके सार्वजनिक होने के डर से भी इसे दबा दिया जाता है। और इसके बाद अपराधी द्वारा बार-बार पीड़ित बच्चे का शोषण होता है। शोषण की बात मन मे आते ही हमारा ध्यान लड़कियों की ओर जाता है और हमें लगता है कि शोषण केवल लड़कियों का होता है, सिर्फ लड़कियों ही नहीं यह उन लड़कों के मामलों में भी होता है जो स्वतंत्र रूप से अपने माता-पिता के साथ वर्जित मान लिए गए विषय पर बात करने के लिए सक्षम नहीं हैं। ये पूरे समाज की मानसिकता है जो बुरे लोगों को प्रोत्साहित करने का काम करती है। कुछ लोग मासूम बच्चे के दिमाग में बैठे डर का लाभ उठाते हैं, वो बेचारा मासूम बच्चा/बच्ची जिसे यौन उत्पीड़न के बारे में कोई जानकारी नहीं होती वो दिन प्रतिदिन इस का शिकार होता जाता है।

              बाल यौन शोषण हमारे समाज द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक कुकृत्यों में से सबसे ज्यादा उपेक्षित और हाशिये पर की चिंता है। इसे नज़रंदाज़ करने के करण भारत में बाल यौन शोषण की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। इस प्रकार की घटनाओं के विभिन्न आयाम हैं जिसके कारण समाज इसका सामना करने में असमर्थ है। बाल यौन शोषण न केवल पीड़ित बच्चे पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता है बल्कि पूरे समाज को भी प्रभावित करता है। भारत में बाल यौन शोषण के बहुत से मामलों को दर्ज नहीं किया जाता, क्योंकि ऐसे मामलों को सार्वजनिक करने पर परिवार खुद को असहज महसूस करता है। इसके बारे में एक सामान्य धारणा है कि, “ऐसी बातें घर की चार-दिवारी के अन्दर ही रहनी चाहिये।” बाल यौन शोषण की बात के सार्वजनिक हो जाने पर परिवारजनों को गरिमा के खराब होने के बारे में लगातार भय बना रहता है। यदि इन्ही परिवारों में बच्चों को यौन संबंधी शिक्षा पर जोर दिया जाने लगे और उन्हें गुड टच वेड टच बताया जाए तो यही बच्चे अपने साथ गलत होने की दशा में अपने परिवार को बता पाएंगे। ऐंसी स्थिति में बच्चा भी सुरक्षित रहेगा और परिवार की गरिमा भी।

          बच्चा चाहे सदियों से शोषण की मार सह रहे दलित का हो या उनका शोषण करने वाले सवर्ण का, आभाव में जीवन यापन करने वाले निर्धन का हो या ऐश-ओ-आराम से जीने वाले धनवान का, जनता के पैसों से मौज उठाने वाले नेता का हो या अपनी मेहनत से पूँजीपतियों की जेब भरने वाले किसान का, सबको अपना बच्चा बहुत प्यारा होता है। फिर इन बच्चों की सुरक्षा को लेकर माँ बाप भला कैसे चूक जाते हैं। माँ बाप को चाहिए कि वह अपने बच्चों पर हर समय नजर रखें उनकी सुरक्षा को लेकर प्रत्येक गतिविधि पर नजर रखें। यदि बच्चा तनिक भी असहज हो या मायूसी में घिरा नजर आए तो उससे बात करने का प्रयास करे। उसकी भावनाओं को समझने का प्रयास करें। मां बाप घर में बच्चों के अनुकूल माहौल बनाएं ताकि बच्चे अपनी हर बात खुलकर सामने रख सकें और जब भी उनके साथ कुछ अनुचित हो तो वह बेहिचक खुल कर बोल सकें। केवल तभी अपनों के वेश में छुपे बचपन के विरोधियों को मात दी जा सकती है। बच्चों के शरारत न करने को उनकी समझदारी न समझें बल्कि उनकी मायूसी की तह तक जाने का प्रयास करें तभी हर माता-पिता अपने बच्चों को सुरक्षित रख पाएंगे। जय हिंद

अभिलाष ठाकुर, ( सामाजिक कार्यकर्ता, भोपाल )

Special Article