माँ (कविता-7)

माँ (कविता-7)

पूरे घर का
काम समेट कर
थकान से चूर
सुस्ताने को लेटी माँ
बेटी के आते ही
फुर्ती से रसोई में
बेसन,सूजी ढूँढ
पकौड़ी-हलवा
बनाने लगती है!

सबके सामने
चुप रहने वाली माँ
बेटी के आते ही
उसके सम्मुख अकेले में
मुखर हो उठती है!

कुछ दिनों
मायके में रहने
आई बेटी को
जाते समय माँ
अपने लिए
शौक से लाये
साड़ी/सूट को
“ये रंग तुझ पर ज्यादा खिलेगा”
कह कर, जबर्दस्ती बैग में
रखने लगती है!

अकेले होने पर
अपनी पुरानी स्मृतियों में
डूबने-उतराने के लिए
अपनी माँ और पिता के
लिखे पत्रों के पुलिंदे को
जिसे रामचरितमानस
गीता से भी अधिक
पवित्र मान सहेजे रखती है
उसे खोल कर
कोई पत्र निकाल कर
पढ़ने लगती है माँ!
कोई आहट होते ही
झट से समेट कर
चेहरे पर हँसी ओढ़ लेती है!

बेटी के
विवाह का एल्बम
खोल कर बैठ जाती है
मुद्रिका समारोह से
देखना आरम्भ करती है
सगाई, महिला संगीत
बारात, वरमाला की तस्वीरें
देखते हुए मुस्कराती रहती है,
फेरों की तस्वीरें देखते हुए
गम्भीर होती जाती है,
आँखों में आँसू भर जाते हैं
जो विदाई की तस्वीरों को
देख ऐसे बहते हैं कि
रोके नहीं रुकते हैं!

धूप-छाँव सी
होती है हर माँ!
अपने बच्चों के दुख में
शीतल छाँव बन जाती है
बच्चे अपना सुख-दुख
उँडेल कर माँ के सम्मुख
निश्चिंत हो जाते हैं!

सागर से अधिक
गहरी माँ के हृदय की
कोई थाह नहीं ले पाता,
सबके मन की
समझने वाली के मन को
कोई जान नहीं पाता!

स्नेह के दो बोलों से ही
चल पड़ती है
उसकी उदास दुनिया,
उन्हीं दो बोलों में ही
पहुँच जाती है वो खुशी से
सातवें आसमान पर!

बड़ी भोली
बड़ी सलोनी
ममतामयी होती है माँ!
बिन बोले, बिन कहे
समझ जाती है
बच्चों के मन की,
पर कह कर भी क्या
कोई समझ पाता है
माँ के मन की बात!
इसी से कभी-कभी
होती है माँ उदास!
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डा० भारती वर्मा बौड़ाई

Special Article कविता और कहानी