“रहे उजाला हर दिल में,ना कोई तमस हो  बारह महीने हर दिन बसँती प्रेम दिवस हो”

“रहे उजाला हर दिल में,ना कोई तमस हो बारह महीने हर दिन बसँती प्रेम दिवस हो”

ना रहे किसी भी रूह में, मैं मेरी की हवस

उतरे हर दिल में इश्क ए इब़ादत, तो मने

समस्त ब्रह्माण्ड में बसँती एक प्रेम दिवस

कितने भाग्यशाली होते हैं वो बच्चे जिन्हें उच्च शिक्षा के अवसर अपने देश में भी मिलते हैं और विदेशों में भी।अगर

समाज के ये तथाकथित उच्च शिक्षित विद्वान अपनी विद्वता का प्रयोग, समाज में व्याप्त अज्ञानता को ख़त्म करने के लिए करें तो निश्चित ही वो लोग अपनी शिक्षा के माध्यम से समाज की तस्वीर बदल सकते हैं।

लेकिन इक्का दुक्का लोगों को छोड़ कर कुछ लोग तो अपनी उच्च शिक्षा, उपाधियों और पदवियों के घमण्ड में अपना एक अलग समाज निर्मित कर लेते हैं और कुछ लोग

अपने वतन की मिट्टी को भुला कर विदेशों में ही बस जाते हैं।

ये तो सच है कि एक विकसित सोच से ही विश्व का कल्याण सँभव है।ये भी सच है कि हमारे देश में प्रगति का स्तर तभी ऊपर उठ सकता है,यदि प्रत्येक देशवासी सिर्फ अपने ही स्वार्थ के मोह से ना बँधा रहे बल्कि समस्त जगत की समस्याओं के समाधान हल करने में अपना सार्थक प्रयास करे।

कभी वर्गभेद, कभी जाति भेद, कभी आरक्षण के मुद्दे तो कभी मज़हबी मसलों की दीमक वतन के अमन को खोखला करती चली जा रही है।आज प्रत्येक क्षेत्र में हर उम्र में, हर किसी के ज़हन में एक दूसरे को पछाड़ने के लिए व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा का इज़ाफ़ा हो रहा है।परिणाम स्वरूप निस्वार्थ प्रेम की प्यास से समूचा विश्व तरस रहा है।

इस गँभीर परिस्थिति को स्वार्थ वश तो आसानी से नज़रअँदाज़ किया जा सकता है।लेकिन यदि किसी इँसान में ज़रा सी भी सँवेदनाएँ बाकी हैं तो अपनी मानवता के माध्यम से वो वैश्विक बँधुत्व का प्रयास तो कर ही सकता है।

केवल एक दिन को रँगीन काग़ज़ के फूलों से सजा कर ये आधुनिक समाज प्रेम का ओछा प्रदर्शन तो कर सकता है मगर किसी भी रिश्ते में सुगँध पैदा कर के उसे महका नहीं सकता।

प्रत्येक सृजन को एक निश्चित समय तक एक नियोजित कार्यशैली के रास्ते से गुज़रना पड़ता है।प्रत्येक बीज को अँकुरित होने तक यथोचित पोषण देना पड़ता है, तभी किसी गुलिस्तान में हरियाली पैदा होती है।

लेकिन जब तक किसी भी साँसारिक वृक्ष की छाया और फल सृष्टि की निस्वार्थ सेवा में सहर्ष समर्पित नहीं होते तब तक कोई भी प्रकृति के ऋण से मुक्त नहीं हो सकता।

हमारे समाज में सबसे बड़ी विडँबना यही है कि हर कोई एक दूसरे से अधिकार वश या स्वार्थ वश खुद तो सब कुछ पा लेना चाहता है, लेकिन स्वँय अपने दायित्वों को नज़रअँदाज़ करते हुए प्रत्येक ज़िम्मेदारी से मुक्त रहना चाहता है। ऐसे में यदि किसी को भी अपने दायित्व पूरा न करने के कारण यदि कोई कष्ट होता है तो उस कष्ट के कारण का दोषारोपण सब दूसरों के ही कंधों पर डालना चाहते हैं।इसलिए दूसरों को अपनी इच्छानुसार अपने अनुरूप ढालने के लिए घनघोर सँघर्ष की स्थिति जारी रहती है और विकराल युद्ध की सँभावनाओं को जन्म देती है। यही कारण है कि आज हर घर,एक अदृश्य अखाड़ा बना हुआ है और हर दिल कुरुक्षेत्र का मैदान, जहाँ चौबीसों घँटे नवीन रणनीतियाँ तैयार होती हैं, नतीजतन हर रिश्ते में राजनीति की घुसपैठ हो गई है।

कितना सरल था प्रकृति का गणित जो बिना किसी भेदभाव के सँपूर्ण सृष्टि में निस्वार्थता का उजाला फैलाने का सबक देता था। लेकिन मोह वश इँसान ने अपने ही सँविधान गढ़ लिए और अौर अपनी ही सुविधानुसार अपने अलग क़ायदे और क़ानून बना लिए।फलस्वरूप विभिन्नताओं में अभिन्नता वाला हमारा देश अभिन्न स्वार्थों के चलते अपने सँबँधों के बीच विभिन्न दीवारें निर्मित कर बैठा है।जब वतन की खुशहाली ही दाँव पर लगी हो और समग्र स्वीकारोक्ति कोई भी अपनाना नहीं चाहता हो, तो बसँत भी दबे पाँव दस्तक दे कर आगे बढ़ जाता है।

आज वक्त का तक़ाज़ा यही है कि अपनी सभ्यता और सँस्कृति को मानसिक रूप से विकलाँग होने से बचा लिया जाए और अपनी धरोहर को ससम्मान समेट कर रखा जाए जिस से –

फिर कोई जयचँद न उभरे फिर कोई ज़ाफर न उठे

ग़ैरों का दिल खुश करने को अपनों पर खँजर न उठे

यदि हम अपनी अज्ञानता का तम घटाना चाहते हैं तो हमें अपने चारों तरफ ज्ञान के जुगनू खुद ही निर्मित करने होंगे, जो स्वँय तो प्रकाशित हों ही साथ ही समस्त जगत को भी अपने उजाले से प्रकाशित कर सकें।

तो आइए इस बार प्रेम दिवस पर निस्वार्थ प्रेमदीप जलाएँ

दिखावे की दुनिया से बाहर आकर यथार्थ से प्रेम निभाएँ।

बँजर रहे ना कोई भी खेत,हर तरफ हरियाली हो

समूचे वतन में परस्पर भाईचारे की खुशहाली हो

प्रेम बन प्रेम के लिए जिएँ तो ज़िंदगी निराली हो

प्रेम दिवस की हार्दिक बधाई एवँ शुभकामनाएँ।

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