वारिष्ट साहित्यकार श्रीमती सविता चड्ढा की कलम से (अनुभव-4)

वारिष्ट साहित्यकार श्रीमती सविता चड्ढा की कलम से (अनुभव-4)

हम एक ही कार्यालय में काम करते थे । मैं प्रबंधक के रूप में कार्य कर रही थी और मेरी ड्यूटी थी 10:15 पर मुझे उपस्थिति  रजिस्टर चीफ के कमरे में चपरासी के हाथों भिजवाना होता था । मेरे आगे रजिस्टर होता और मैं अपनी उस मित्र की प्रतीक्षा करती रहती एक 2 मिनट  तक ताकि वह आ जाए तभी मैं रजिस्टर भेजूं। एक दिन मैंने उसे देखा वह आई ,उसने हाजिरी लगाई और जाकर अपनी सीट पर बैठ गई। मुझे बहुत हैरानी हुई कि वह मुझे पिछले कुछ दिनों से नमस्ते भी नहीं कर रही लेकिन मैंने कभी कोई प्रतिक्रिया उस पर प्रकट नहीं करी थी। लेकिन ऐसा भी मैं सहन नहीं कर पाई कि मेरी बहुत ही प्रिय मित्र मुझसे बिना बोले, मुझसे बिना सुप्रभात , नमस्कार के दिन का प्रारंभ करें। मैंने सोचा कल मैं उसे अपनी तरह से समझाने का प्रयास करूंगी।  कल जब अगले दिन जब वह कार्यालय में आई , मैंने उसे दूर से देखा वह बड़े हॉल में प्रवेश करने वाली है तो मैंने अपनी सीट घुमा कर खिड़की की तरफ कर ली और बाहर की ओर देखने लग गई ।उसने हाजिरी लगाई और बिना कुछ कहे बाहर चली गई ।

अभी 5 मिनट ही बीते थे कि मुझे कोई बाहर से कहने आया कि आपके स्टाफ की एक महिला वॉशरूम में बहुत जोर जोर से रो रही है, शायद उसकी तबीयत ठीक नहीं है । हमने उससे पूछा पर वह कुछ बोल नहीं रही। वह आपके  विभाग में काम करती है, आप उसको जाकर मिल लें। मुझे नहीं पता था अंदर कौन है लेकिन जब मैं गई तो अंदर मेरी वही मित्र जोर जोर से रो रही थी , सिसकियां भर रही थी, मैं बहुत हैरान हुई,  मैंने उससे पूछा ,”क्या हुआ” , उसने कहा” जा जा तेरे को देख लिया है, आज तूने मुझे देखकर पीठ फेरली और मुझे देखा भी नहीं।”

 मैं बहुत हैरान हुई कि पिछले एक हफ्ते से यह महिला मुझे इग्नोर कर रहे हैं ,मेरी अवहेलना कर रही है और आज मेरी एक पल की अवहेलना उससे सहन नहीं हो पा रही । मैंने उसे इतना ही कहा पिछले 1 हफ्ते से तुम भी तो मुझे नहीं देख रही, तुम भी मेरे साथ ऐसा ही व्यवहार कर रही हो ,तुम आती हो और हाजिरी लगाकर मुंह फुलाकर बैठ जाती हो, तुम्हारा घर बहुत दूर है , तुम थक जाती होगी यह सब सोचकर मैं रजिस्टर को अपने पास अधिक से अधिक रखने का प्रयास कर सकती हूं पर दो-तीन मिनट से अधिक नहीं रख पाती क्योंकि चीफ का चपरासी आकर रजिस्टर ले जाता है ,तुम शायद मुझसे इस बात से नाराज़ हो।”

 वह बोली “ऐसी कोई बात नहीं ।” लेकिन मैं जानती थी, हम एक ही बेच के थे और मैं प्रबंधक बन गई थी और वह अधिकारी रह गई थी , हो सकता है उसके मन में कोई ऐसी बात हो लेकिन उसमें मेरी तो कोई गलती नहीं थी , फिर उसने ऐसा क्यों किया‌. मुझे आज तक पता नहीं चल पाया और उसने साफ इंकार कर दिया कि उसकी कोई गलती नहीं थी लेकिन मैं अपनी जगह पर बहुत संतुष्ट थी कि मैंने उसे बता दिया कि जो उसे अच्छा नहीं लगता उसे वैसा व्यवहार दूसरे के साथ भी नहीं करना चाहिए । हम बाद में मिलते रहे , बातचीत होती रही लेकिन अंदर एक बहुत गहरी सी दूरी बनी रही । वह दूरी शायद इसलिए थी कि वह प्रमोशन के लिए इच्छुक नहीं थी और मुझे प्रमोशन में बहुत रुचि थी । यही कारण था कि मैंने बी .ए. करने के बाद में  एम.ए. हिंदी और एम.ए.  अंग्रेजी  किया ,अपने घर, अपने बच्चों के हिस्से का समय पढ़ाई में लगाया ताकि में प्रमोशन पा सकूं और आगे बढ़ सकूं। अगर मैं आगे बढ़ गई और वह नहीं तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी और क्या मैंने सिर्फ एक बार उसके साथ ऐसा व्यवहार करके कोई गलती की थी आप ही मुझे बता सकते हैं।

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