वैक्सीनमय होता भारत

वैक्सीनमय होता भारत

राजनीतिक सफरनामा :   कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

पूरा देश वैैक्सीनमय हो गया है । हमारे देश की ,खासियत ही यह है कि यहां जो होता है वह सारे देश के माहौल को त्यौहारनुमा बना देता है । वैक्सीन आ गई और अब लगने भी वाली है जिसको लगेगी वह कोरोनाप्रूफ हो जायेगा । बहुत दिनों से आम व्यक्ति उम्मीद लगाये बैठा था मुंह पर मास्क लगाये-लगाये और लोगों से दो गज की दूरी बनाए-बनाए उसकी सांस फूलने लगी थी । हम तो भारतवासी दूरी बनाकर चलना हमारी संस्कृति मैं है ही नहीं और मास्क लगाकर अपना मुंह बंद कर लेना वो भी हमारी आदत में नहीं हैं  । हम तो बात करने के लिए मुंह में रखे पान को अंदर ही अंदर जीभ से एक ओर खिसका कर बातें करने लगते हैं । ऐसा नहीं है कि मास्क लगाकर हम मौन रहे हो, हम बातें तो तब भी करते रहे हैं पर चेहरे के भाव किसी को नहीं दिखा पा रहे थे । यदि हम किसी बात पर मुस्कुरा भी रहे हैं तो हमारी मुस्कुराहट सामने वाले को दिखाई ही नहीं दे रही है हमें जुबानी बोलना पड़ा है ‘‘भैयाजी हम आपकी बात पर मुस्कुरा रहे हैं’’ । चेहरे पर मास्क न होता तो भला बताने की क्या जरूरत सामने वाला आपकी मुस्कुराहट से मायने ढूंढने में लग जायेगा । गत वर्ष मार्च माह मेें अतिथि बनकर  आया कोरोना ‘‘तुम कब जाओगे अतिथि’’ की बैचेनी तक झंुझलाहट देने लगा है । अतिथि तो कुछ दिनों के लिए अच्छा लगता है । हमें भी लगा था कि कोरोना नाम का अतिथि महिना-पन्द्रह दिन में निपट जायेगा । हम तो ‘अतिथि देवो भव’’ के सिद्धांतों को मानने वाले लोग हैं सो हमने अतिथि के सम्मान में लाकडाउन कर अपने आपको घरों की चैखट के अंदर कैद कर लिया । अतिथि को काढ़ा का भोग लगाया पर अतिथि टस से मस तक नहीं हुआ । वह तो अंगद के पैर की भांति अपना स्थान सुरक्षित कर मस्ती से बैठा है । ‘‘एक-एक को देख लूंगा’’ के भावों को साथ, लाल आंख लिये वह मस्ती कर रहा है । अतिथि ऐसे थोड़ी ने होते हैं । हम समझ गए अब उसे निपटाने के प्रयास में लग गये । वैक्सीन उसे निपटा देगी । वैक्सीन वी.आईपी बन गई है । प्लेन से यात्रा कर पहुंच रही है जगह-जगह । जेड प्लस की सुरक्षा में रह रही है । जैसे हमारे वीआईपी रहते हैं परिंदा भी पर न मार पाए की स्टाइल में । कोई भी वीआईपी का सफर तब तक पूरा नहीं होता जब तक उसके बारे में कुछ असहमति न प्रकट की जाए । असहमति वीआईपी को और बड़ा वीआईपी बना देता है । वैक्सीन को भी इस प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ा । तरह-तरह के मत प्रदर्शित किए गए । असहमति बताने वालों को लगता है कि उनका मूल काम हर एक बात पर असहमति प्रकट करना ही होता है । वे हर उस बात पर असहमति प्रकट करना अपना दायित्व समझते हैं जो सरकार करती है भले ही इसमें असहमति प्रकट करने के कोई चांस न हों । वैक्सीन को लेकर भी ऐसा ही करने का प्रयास किया गया । समाजवादी पार्टी के लालटोपी लगाने वाले नेता अखिलेश यादव जी ने तो इसे भाजपा वैक्सीन कह दिया ‘‘मैं नहीं लगवाउंगा’’ लोगों ने ताली बजाई । चलो अच्छा है वह वैक्सीन किसी आम आदमी के काम आ जायेगी । वैसे ऐसा हर एक नेता को करना चाहिये । मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री जी ने भी पहले यह ही बोला था कि वे वैक्सीन नहीं लगवायेगें पर बाद में थोड़ा संशोधन कर लिया कि तीसरे चरण में लगवायेगें । विपक्ष तो विपक्ष है कह रहा है कि मुख्यमंत्री जी पहले एक दो चरण में लगने वाली वैक्सीन के परिणाम देख लेगें फिर खुद लगवायेंगे । नेता सबसे अधिक संशय से भरा होता है उसकी मजबूरी यह है कि वह अपने संशय और भय को व्यक्त भी नहीं कर पाता ऐसे में आम आदमी उसकी ढाल बन जाता है ‘‘हम तो जनता के सेवक है, पहले वैक्सीन हमारी जनता को लगे तब हमें’’ । एक ही डायलाग में सुरक्षा भी हो गई और जनता के प्रति बहने वाले असीम प्रेम का प्रदर्शन भी हो गया । वैक्सीन को लेकर असहमति दर्ज कराने वालों को इतना तो सोचना ही चाहिए कि वैक्सीन करोड़ों लोगों को लगाई जाने वाली है तो स्वाभाविक रूप से सरकार करोड़ों लोगों के लिए कोई रिस्क कैसे ले सकती है । वैसे भी डबलू एच ओ ने सौरभ इंस्ट्यूट आॅफ इंडिया की वैक्सीन ‘‘कोविडशील्ड’’ को अपनी एक्सपर्ट कमेटी से जांच कराकर स्वीकृति प्रदान की है वो सही मापदण्डों से परे कैसे हो सकती है । अनावश्यक भ्रम फेलाकर जनता को गुमराह करन अपराध ही माना जाना चाहिए । पर सवाल उठाने वाले इतना सोचते कहां हैं । वे तो कह देते हैं फिर उस कहे को सही सिद्ध करने के लिएकुतर्क देते रहते हैं । वैसे राजनैतिक पंडित इसे ही तो लोकतंत्र की खूबसूरती कह कर इसे ढंकन का प्रयास करते हैं । लोकतंत्र हर एक बात पर असहमति दर्ज कराने को खूबसूरती में तब्दील कैसे कर सकता है । देश हित के विषय तो कम से कम निर्विवाद रहने चाहिए । राजनीतिक दलों के मसले अलग हो सकते हैं और उन पर बहस भी हो सकती है पर राष्टीय मुद्दों को तो एकमतेन स्वीकार किया जाना चाहिये या तर्क संगत तथ्य प्रस्तुत करने चाहिये । अब जिसको जो कहना हो वैक्सीन लगने का काम तो प्रारंभ हो ही गया है । पूरा विश्व ही तो कोरोना से संघर्ष कर रहा है हर देश को जल्दीबाजी है कि वो जल्दी से जल्दी वैक्सीन को प्राप्त कर ले और अपने देश के नागरिकों को सुरक्षित कर ले । अतिथि वगैर वैकसीन के जा ही नहीं रहा है । इस बिन बुलाए अतिथि को भगना है तो सुरक्षा और सावधानी तो रखनी ही होगी । कितना कुछ तो नुकसान कर चुका है कोरोना । ऐसा लगने लगा मानो सारा कुछ थम सा गया है सिवाय कैलेण्डर के पन्नों के और घड़ी के कांटों के । वे थमे नहीं और आम आदमी थमा रहा । उकताहट तो होनी ही थी सो सभी को हो रही है । अब जब वैक्सीन आ गई तो एक बार फिर उम्मीद बढ़ी है कि हम बहुत जल्दी इस स्थिति से अपने आपको बाहर निकाल लेगें और सारा जीवन पूर्व की भांति चलायमान हो जायेगा ।

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