वो जीत जो जीत सी ना लगे,              वो हार जो हार सी न लगे

वो जीत जो जीत सी ना लगे, वो हार जो हार सी न लगे

सम्पादकीय : मनमोहन शर्मा ‘शरण ‘

हमारे भारत की सुन्दरता–भव्यता यहां के त्यौहारों में देखते ही बनती है । हालांकि 2020 वर्ष कोरोना काल की भेंट चढ़ गया । जनता ने अपना दृष्टिकोण भी सूक्ष्म कर लिया है और आज में जीना प्रारंभ कर दिया जिसमें आवश्यकता की, रोजमर्रा की चीजें और स्वास्थ्य ठीक है, यही प्राथमिकता बन गई है । फिर भी 20–20 मैच देखने को मिले और उसमें भी मैच सुपर ओवर तक चला जाए तो रोमांच इतना बढ़ जाता है कि दर्शक झूम उठता है और अन्तर्मन से कह उठता है — पैसा वसूल –––– ।
जी हाँ मित्रो ! बिहार चुनाव में कुछ ऐसा ही दृश्य देखने–सुनने को मिला जहाँ एनडीए (जिसमें प्रमुखत भाजपा, जनता दल यूनाइटेड (नीतीश कुमार), हिन्दुस्तान अवाम मोर्चा (HAM) जिसके अध्यक्ष जीतन राम माँझी हैं, इन सभी की ओर से बिहार में ताबड़तोड़ रैलियां की गर्इं जिसमें प्रधानमंत्री जी की भी बहुत रैलियां हुर्इं, मुख्यमंत्री, गृहमंत्री से लेकर तमाम बड़े राष्ट्रीय नेताओं ने दमखम दिखाया और जंगलराज का भय दिखाया और राष्ट्रवाद का नारा दिया । दूसरी तरफ 31 वर्षीय युवा तेजस्वी यादव जो महागढ़बंधन के मुखिया बनकर उभरे तथा आज के संकटकाल में सबसे आवश्यक ‘नौकरी’–रोजगार देने का वादा किया, जिसका रैलियों में भरपूर स्वागत हुआ व समर्थन मिला । यह सब देखकर बड़े–बड़े मीडिया चैनलों ने एग्जिट पोल के नतीजे घोषित किए जिसमें तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने की भविष्यवाणी/घोषणा कर दी और फिर वोटों की गिनती शुरु हुई उसमें भी पहले महागढ़बंधन को बढ़त मिलती दिख रही थी और लगा कि एक्जिट पोल ही एक्जेक्ट पोल साबित होगा किन्तु ऐसा हुआ नहीं । कुछ अंतर से जादुई आंकड़ा महागढ़बंधन नहीं छू सका और एनडीए के चेहरे पर मुस्कान आ गई । अंतर थोड़ा ही सही पर जादुई आंकड़ा एनडीए ने छू लिया था । मंथन–मनन–चिंतन हुआ जिससे यह बात स्पष्ट हुई कि एक ओर बड़े बड़े राष्ट्रीय नेता, मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, दूसरी ओर देश के युवा की आवाज जिसमें युवाओं का दर्द और उसके मर्ज की घोषणा थी, ने सबको सर्दी के मौसम में पसीने छुड़ा दिये । इसीलिए इस हार में बड़ी जीत नजर आ रही है और वह जीत जिसमें हार का सा स्वाद मिल रहा है ।
अभी भी बिहार में एनडीए पूरा कार्यकाल करेगा इस पर टीका टिप्पणयाँ जारी हैं । ––––

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