सत्याग्रह के सही मायने !

आज के समाज में  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के विचार निसंदेह प्रासंगिक है । जिस सत्य अहिंसा और सद्भाव की बात राष्ट्रपिता गांधी करते थे वो आज के वर्तमान समय में लालच लाचारी और भ्रष्टाचार की भेट चढ़ चुकी है । प्रत्येक वर्ष हम दो अक्टूबर को महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म दिवस मनाते है ,इस दिन को ना सिर्फ हम राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाते है अपितु इस पूरे सप्ताह को स्वछता सप्ताह मनाते है । मैंने एक पत्रकार होने के नाते गांधी दर्शन को बड़े गंभीरता से पढ़ा , गांधी जी ने कहा था कि हम जैसा समाज से चाहते है हम उसी के अनुसार स्वयं को बदलना चाहिए । बड़े कर्मठ और प्रभावी व्यक्तित्व रहा है गांधी जी का जबकि बनारस की सकरी गलियों से निकलने वाला बेहद गरीब और छोटे कद का एक शास्त्री देश का गर्व बना , नारा दिया जय जवान जय किसान । ये वही लाल बहादुर शास्त्री थे जिनके एक आग्रह पर पूरे राष्ट्र ने एक दिन भोजन त्याग किया था । स्वतन्त्रता संघर्ष के दौरान गांधी जी सबसे करिश्माई व सबसे अधिक स्वीकृत नेता के रूप में उभरे। कहते है कि चर्चा गांधी जी से ज़्यादा उन को लेकर होती है जो गांधी जी के विचारों से प्रभावित नहीं थे , अफवाहों ने उन्हें हिंसा वादी बानाया किन्तु समाज ने गांधी जी को ज़्यादा गांधी जी बनाया। उनसे मिलने वाले अनेक लोग बताया करते थे कि साधारण शक्लोसूरत वाले इस इंसान में कुछ तो आकर्षण है, जो लोगों को इनकी तरफ़ सहज़ ही खींच लेता था। अमूमन समाज का एक बड़ा धड़ा है, जो गांधी जी के रचनात्मक कार्यों को लेकर उनका जबरदस्त प्रशंसक है तथा गांधीवादी कहलाता है।दूसरी तरफ़ बंटवारे में मिले दंश,  पाकिस्तान से आती हिन्दुओं की लाखों लाशों व उनकी लड़कियों के साथ नृशंस बलात्कार के मध्य गांधी जी द्वारा जबरदस्ती पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलाने तथा भगत सिंह जी की फांसी को न रोकवा पाने व नेता जी सुभाष चन्द्र बोस से उनके ज़िद की हद तक मतभेद के कारण भी कई लोग गांधी जी से खिन्न रहते हैं।स्वतन्त्रता संघर्ष में गांधी जी की उपयोगिता कुछ यूँ थी कि उन्होंने बिना हथियार और शारीरिक  संघर्ष के अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ाई को जनांदोलन का रूप दे दिया। पूरे संघर्ष में सत्य व अहिंसा के साथ शुरुआत कर वह धीरे-धीरे तीव्रता बढ़ाते गए। असहयोग (1920) से लेकर सविनय अवज्ञा (1930) ऐसे आयाम साबित हुए जिससे अंग्रेजों को आर्थिक नुक़सान खूब हुआ, पर अंग्रेज चाह कर भी हिंसक नहीं हो पाए।चौरी चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को रोक दिया, जिस पर उनकी खूब आलोचना हुई कि जब आंदोलन अपने शबाब पर था, तभी गांधी जी ने हाथ पीछे खींच लिए।गांधी जी भारतीय जनमानस की मानसिकता से परिचित थे। वह जानते थे कि चौरी चौरा कांड ने अंग्रेजों को मौका दे दिया है हथियार उठाने का। और जब अंग्रेज हिंसक होते तो भारतीय जनमानस तब ठंडी हो जाती और फिर कई दशकों तक वह किसी दूसरे आंदोलन के लिए तैयार न होती।

          अतः शनैः शनैः वह भारतीय जनमानस को तैयार करते गए बड़े संघर्ष के लिए। सविनय अवज्ञा पूर्ववर्ती असहयोग से ज़्यादा तीव्र था। सविनय अवज्ञा से ज़्यादा तीव्रता दिखाई उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जब उन्होंने नारा दिया ‘करो या मरो’ !जहाँ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वह रिक्रूटिंग सार्जेंट बन कर भारतीयों को अंग्रेजी सेना में जाने को प्रेरित करते रहे ताकि अंग्रेज उनकी निष्ठा देख पिघल जाए, वहीं द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन को बिल्कुल स्वतः स्फूर्त होने जाने दिया ‘करो या मरो’ कह कर,स्वदेशी व पंचायती राज व्यवस्था पर उनका बहुत बल रहा ताकि विदेशी अर्थव्यवस्था व शासन से पिण्ड छूटे। सत्य के साथ भी उन्होंने कई प्रयोग किये। जैसा कहते थे, तो जीवन भी लगभग वैसा ही जीते थे। इसी दौरान कई ऐसा मानते हैं कि उनसे जाने-अनजाने कई भूलें भी हुईं। जैसे असहयोग आंदोलन के दौरान ख़िलाफ़त आंदोलन से जुड़ जाना। तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य के ध्वस्त होने और ख़लीफ़ा की ख़िलाफ़त खत्म हो जाने से दुनिया भर के मुसलमान उद्वेलित हो गए थे क्योंकि उन्हें अपने धार्मिक स्थलों की भी बड़ी चिंता हो रही थी बदले हुए हालातों में।

         इसी दौरान हिन्दू-मुस्लिम के मध्य बढ़ती कटुता को वह देख नहीं पाएं। देश के विभाजन को न रोक पाना उनके लिए एक बड़ा कलंक था। तिस पर सरदार पटेल जी व नेता जी बोस से ज़्यादा वह पंडित नेहरू जी पर भरोसा दिखाते थे, जिनसे कि राजेन्द्र बाबू भी कुछ खास ख़ुश नहीं रहते थे।फिर जब जिन्ना ने देखा कि ऐसे पाकिस्तान न बनेगा तो उसने प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस का आह्वान कर दिया 1946 के मध्य अगस्त में। फिर तो मुस्लिम लीग व उसके समर्थकों ने जो कत्लेआम व लूटपाट मचाई कि सबके होश उड़ गए। बंगाल में सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुँचा। पूरा का पूरा एक बांग्लादेश ही तैयार हो गया चाहे हिन्दुओं के कत्लेआम से या फिर डरा-धमका कर अथवा बलात्कार कर धर्म-परिवर्तन से। बिहार में जरूर मुंहतोड़ जवाब मिला। उधर बनने वाले पश्चिमी पाकिस्तान में तो जो नँगा नाच हुआ कि इंसानियत दहल गयी। पश्चिमी पाकिस्तान से आती ट्रेनें इसकी साक्षी थीं। लाखों लोगों की हत्याएं हुईं, न जाने कितनी औरतों/लड़कियों के बलात्कार हुए व असंख्य उधर ही रख ली गईं। फिर बंटवारा ऐसा हुआ कि बाबा साहेब अंबेडकर जी को कहना पड़ गया कि यह बंटवारा जब हुआ ही धर्म के नाम पर तो फिर पूर्ण रूप से होता क्योंकि ऐसा गलत बंटवारा कर हम भविष्य में एक बड़ी समस्या को जन्म दे रहें। सरदार पटेल जी भी त्रस्त हो गए थे। नतीज़ा यह रहा कि आज पाकिस्तान व बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यक लगभग साफ़ हो गए या साफ़ होने के मुहाने पर हैं। निस्संदेह बाबा साहेब इस मामले में गांधी जी से ज़्यादा दूरदर्शी साबित हुए।

           इधर महात्मा गांधी फिर से ज़िद पर अड़ गए। इन्हें लगा कि सब इनकी तरह ही हैं कि एक गाल पर मारे तो दूसरी बढ़ा दो, जिससे शत्रु लज्जित हो जाएगा। हुआ उल्टा। शत्रु ने दूसरे गाल पर भी जोर का चमेट मार दिया। थ्योरी फेल हो गयी कि वो मारे तो भी आप मार खाते रहे, भले खत्म हो जाएं। तिस पर वैसे नराधम पाकिस्तान को राजस्व में से 55 करोड़ ₹ देने की उन्होंने ज़िद पकड़ ली। सुनते फिर किसी की नहीं थे। ख़ैर हिंदुस्तान के दोनों तरफ़ पाकिस्तान का जन्म हुआ, इधर दोनों बाजुओं को कटाकर बचा दिव्यांग हिंदुस्तान। एक के जिन्ना बादशाह बने, तो दूसरे के नेहरू जी। दोनों संतुष्ट हुए तब जाकर।गांधी जी का हाथ नेहरू जी के कांधे पर था। नेता जी लापता हो चुके थे तथा दूर नेपथ्य में सरदार पटेल जी व बाबा साहेब अंबेडकर जी टुकुर-टुकुर ताक रहे थे। भगत सिंह जी, चन्द्रशेखर आज़ाद जी जैसे रणबाँकुरे इस माटी के लिए भरी जवानी में हुतात्मा हो चुके थे। वह तो भला हो कि सरदार पटेल जी ने उतने पर भी किसी तरह बाकी रियासतों को जोड़ा। वह लौह पुरुष जो ग़र प्रधानमंत्री बने होते तो सम्भवतः कश्मीर की समस्या कब की खत्म हो चुकी होती और पाक अधिकृत कश्मीर भी हमारे राजमुकुट से टूटा न होता।

_____ पंकज कुमार मिश्रा ( एडिटोरियल कॉलमिस्ट एवं पत्रकार 8808113709)

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