समस्याएँ –लाँकडाउन में मजदूरों की।

समस्याएँ –लाँकडाउन में मजदूरों की।

अभी कुछदिनों पूर्व तक प्रथम लॉकडाउन के दौरान देश में अचानक बढ़ती कोरोना संक्रमण की संख्या के लिए देशवासियों , नेताओं ,पत्रकारों  मीडिया और अन्य उन सभीसामान्य लोगों के द्वारा जो  लॉक डाउन के पश्चात देश को कोरोना मुक्त होजाने का स्वप्न देख रहेथे,उन तबलीगी जमातियों को अत्यधिक कड़वाहट से भर कर दोषी ठहराने लगेथे जिन्हों ने लॉक डाउन के नियमों और आदेशों का उल्लंघन कर सभाएँ की थी और विदेश से आए थे और पकड़े जाने के भय से भागे भागे फिर रहे थे । देश के कोने कोने में फैलकर उन्होंने संक्रमितों की संख्या बढ़ा दीऔर लॉकडाउन केप्रयत्नों को विफल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।अपने नियम विरोधी कार्यों से वे महत आलोचना के पात्र बने। किन्तु उन संक्रमितों का भी स्वास्थ्यकर्मियों ,चिकित्सकों के द्वारा इलाज किया गया । समस्या का यह विशद पहलू है जिसका प्रभाव अवश्य ही देश के स्वास्थ्य पर गहरा पड़ा है।किन्तु एक दूसरी बड़ी समस्या जो इस दौरान उठ खड़ी हूई है वह देश की सामाजिक समस्या से बहुत अंशों में जुड़ी है और  इस कोविद -19के संक्रमण  को दिनोंदिन  बढ़ाते जाने मे निश्चय ही उसकी बड़ी भूमिका सिद्ध होनेवाली है। वस्तुतः यह समस्या उन मजदूरों, श्रमिकों की है जो बड़े बड़े शहरों में वर्तमान परिस्थिति के कारण अचानक ही बेरोजगार हो गये और लाख सरकारी आश्वासनों के बाद भीजिन्हे इन शहरों में अपना कोई भविष्य नहीं दीखा और वे  वापस अपने गृह प्रदेश जाने को व्यग्र होगये।  इस व्यग्रता ने सारी बन्दिशें तोड़ डालीं। इनकी भीड़ अनियंत्रित हो सड़कों को भरने लगी  । न ही सोशल डिस्टेंसिग की परवा रही न ही लॉक डाउन के किसी भी नियम की।  यह स्थिति प्रथमतः तो निश्चित ही प्रशासन पर ऊंगली उठाती है जो वादे के अनुसार इनकी सुरक्षा की सही जिम्मेवारी लेने में असमर्थ रहा।  द्वितीयतःइनमें असुरक्षा की भावना स्वयंमेव उत्पन्न ुई जो अत्यंत स्वाभाविक परिणम था ,याकि राजनैतिक कारणों से भरी गयी,। यह  तो गम्भीर जाँच का विषय हो सकता है पर इन मजदूरों की स्थितियों को एक सुधी की दृष्टि से देखने की आवश्यकता अवश्य है।

येश्रमिक उन शहरों के नहीं हैं जहाँ ये काम कर रहे हैं । इन ने खेती बाड़ी , अपने राज्य स्थित छोटे मोटे रोजगार छोड़कर शहरों कीओर बेहतर श्रममूल्य पाने औरजीवन स्तर को सुधार सकने की लालसा से अपने गृह राज्य से पलायन किया है। छोटे बड़े उद्योग धन्धे , छोटी बड़ी फैक्टरियों मे अपनी आजीविका तलाशने की कोशिश में बड़े शहरों में ये फैल गये।   प्रश्न तो गाँव की श्रमिक आबादी का गाँवों मे ही समायोजन का होना चाहिये था पर वहाँ उनकी उच्चाकाँक्षाओं की पूर्ति  हो ही नहीं सकती अतः बड़े बड़े शहरों की ओर पलायन इनका हश्र बना। ये श्रमिक , औटो चालक से लेकर विभिन्न सरकारी गैर सरकारी विभागों और छोटी बड़ी फैक्ट्रियों ,गृह निर्माणादि विभागों से जुड़े विशेषकर ठीकेदारों के अधीन रहकर काम करनेवाले हैं। लॉकडाउन की परिस्थितिजन्य विवशता में ये अचानक ही बेरोजगार हो गये।केन्द्र अथवा  राज्य सरकारों के अनुरोधों के वावजूद भी इनको नियमित जीवन यापन के योग्य इनके नियोक्ताओं ने प्रबंध नहीं किया। एक अनिश्चित कालीन बन्दी मे यह उनकी स्वाभाविक  किन्तु सहानुभूतिहीन , स्वार्थप्रेरित प्रतिक्रिया थी।एकऐसी दुनिया में जो आदमी के पारस्परिक सम्बन्धों को   व्यापारिक सम्बन्धों से पृथक नहीं कर सकती, वहमात्र उपयोग की वस्तु बनता जा रहा है। उपयोग नहीं तो सम्बन्ध भी नही।बदलते जीवन मूल्यों के परिप्रेक्ष्य मे मजदूरों के साथ ऐसे ही व्यवहार की अपेक्षा थी।सम्बन्धित राज्य सरकारों द्वारा शेल्टर होम और भोजनादि के इमानदार प्रयत्नों में कमी, रोग की भयावहता और अपने सगेसमबन्धियों , परिवार के सभी सदस्यो के पास जाने की आतुरता ने इन्हे घर की ओर पलायन को विवश किया। और इनकी भीड़ सड़कों पर बढ्ती गयी। धर पहुँचने की शीघ्रता में, पैदल ,साईकिल , ट्रकों आदि परभेड़ बकरियों की तरह ठूँसी हुई स्थिति मे भी यात्रा करना  इन्हें गवारा हो गया।  धीरे धीरे यह स्थिति भयावह होती चली गयी। अन्दर ही अन्दर प्रवाहित विरोध की राजनीति ने इसे पर्याप्त हवा दी। समस्या को सुलझाने की जगह उसे उसे गम्भीर ही करने की कोशिश की।यों भी यह देश स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही राजनीति के हाथों का खिलौना बन गया है। आपद विपद में अवसर को भुनाने से इन्हें कोई रोक नहीं सकता।अब लॉकडाउन के आरम्भ होने के इतने दिनों पश्चात जब पूर्णतः वायरस मुक्ति के कोई आसार नहीं दीखते,नेता ,जनता, मीडियाएवम् अन्य संगठनों के मन मे दबी हुई भावनाएँ इन स्थितियों की  प्रतिक्रियास्वरूप जब उभरती हैं तो लॉकडाउन के औचित्य  पर ही पहला सवाल उठ खड़ा होता है। अगर यह परम आवश्यक था तो सर्वप्रथम इन मजदूरों के लिए ही उचित व्यवस्था क्यों नहीं की गयी?आज की बजाय श्रमिक ट्रेनें तब ही दौड़ सकती थीं।यह अत्यन्त स्वाभाविक प्रश्न है। पर तब शायद लॉकडाउन में अनावश्यक विलम्ब हो जाता और इस लॉक डाउन का पूर्णतः कार्यान्वयन ही नहीं हो पाता। देश की लाकडाउन की प्रथम अवधि बहुत अंशों तक सफल रही। संभवत तबलीगी जमातियों की भगदड़ ने ही इसमें एक बड़ा व्याघात बना।

और अब ये श्रमिक।  अधीरता एक बड़ा कारण है। किसी एक स्थान पर नहीं होना भी संभवतः दूसरा कारण।खाने पीने रहने की व्यवस्था के प्रति आश्वस्त नहीं होना तीसरा बड़ा कारण।जीवन मात्र दो रोटियों , चार पूड़ियों से नहीं चल जाता। जीवन से सम्बन्धितअन्य समस्याओं का निदान भी इस वर्ग की बड़ी आवश्यकता हो सकती थी।रोजगारहीन होकर चंद रोटी केटुकड़ों के सहारे परदेश में रहने से अच्छा अपने गाँव मेंदो रोटी खाकर सम्मानजनक जीवन बिताना था।यहएक मनोवैज्ञानिक समस्या थी जिसका अनुमान कर प्रशासन को पहले ही सही कदम उठाने चाहिए थे।अन्यथा रेलवे ट़्रैक पर  सोने अथवाट्रकों मे छिपकर भागने को वे विवश नहीं होते।लोकडाउन का यह परिणाम जहाँदिल को दहला देने मे समर्थ है वहीं अनियंत्रित भीड़के स्वरूप में अथवा छिप छिपाकर पलायन की यह स्थिति ,सम्बद्ध राज्यों मे संक्रमण की भयावह स्थिति पैदा करने में भी उतनी ही समर्थ है।

देश के समस्त विकास और  चाकचक्य के मूल में इनकी ही ईमानदार चेष्टाएँ और समर्पण है।इनके प्रयत्नों से हमें जीवन की सारी सुविधाएँ प्राप्त होती हैं पर यह वही वर्ग है जिसको सबसे कम महत्व दिया जाता है।अब, जब कि ये अपने गृह राज्यों को लौट रहे हैं तब सम्भवतः इनके अभाव का एहसास उन राज्यों को हो ,जहाँ ये कार्य से जुड़े थे।

वस्तुतः  यह समस्या मुख्यतः उन राज्यों की तब भी थी और अब भी उनकी  ही है। राज्य से रोजी रोटी की तलाश में पलायन अगर तब उनकी विवशता थी तो बेरोजगारी के भय से पुनः गृह राज्यों की ओर पलायन भी आज उनकी विवशता है  ।

संभवत- उनका मूल राज्य अपनी उत्पादक गतिविधियों में उनकी सम्मानपूर्वक समायोजन कर सकें और उनके बल पर अपनेराज्य के विकास को तीव्र गति दे सकें ।अगर ऐसा हो तो उनका भाग कर आना सार्थक हो जाएगा।

पर   क्षणिक आवेश और बहकावेमें अथवा देखादेखी मे भाग कर आए अधिकाँश तथाकथित मजदूर अवसर पाने पर पुनः उन राज्यों की और जाना चाहेंगे।इस प्रकार का आवागमन  इस कोरोनाकाल में संक्रमण जन्य संकट ही पैदा कर सकता है।यह एक सम्भाव्य स्थिति है जिसे नकारा नहीं जा सकता। 

अधिकाँशतः गाँवों से जुड़े ये लोग गाँवों मे पूर्ववत सम्मान भी पा सकें ,सन्देह इसमें भी है।कोरोना जनित भय ने उन्हें सतर्क कर दिया है।

सरकार ने संकट से निजात दिलाने के लिए काफी प्रयत्न किये हैं पर अधीरता और भय जन्य मनोवैज्ञानिक समस्याओं से त्रस्त हो  कितनों ने प्राण गँवा दिये  । काश इसकी कल्पना पहले की जा सकती तो बढ़ते हुए कोरोना संक्रमण पर विराम लग सकता।

आशा सहाय।

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