सम्पादकीय

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बात करने से ही बात बनती है भाई : मनमोहन शर्मा ‘शरण’

अब वह समय भी आ ही गया जब हम सभी वर्ष 2020 को अलविदा कहने को बेसब्री से तैयार हो चुके हैं । पूरा वर्ष त्रहि–त्रहि करते निकल गया । जैसे कोई अनचाहा मेहमान आ जाए तब उधेड़बुन चल रही होती है कि कब यह उठे और चलता बने । अब हम मन बना चुके हैं कि सभी 20–20 को करें नमस्ते और आने वाले वर्ष 2021 का स्वागत करें । एक तो उसके उच्चारण में इसी ‘इक्कीस’ है जो शुभता में, प्रभुता में, सम्पन्नता में आप सभी को ‘इक्कीस’ करे ऐसी हमारी कामना है ।
वैसे कुछ संभावनाएं भी बनने लगी हैं । भारत की बात करें तो प्रतिदिन संक्रमितों की संख्या 50–60 हजार के पारा रहती थी वह सर्द मौसम में भी 22–23 हजार तक आने लगी है । ठीक होने वालों का प्रतिशत भी बहुत अच्छा है । साथ ही वैक्सीन के आने की प्रतीक्षा शायद और अधिक नहीं करनी पड़ेगी । अनलॉक सब हो चुका है किन्तु जिंदगी की चाल अनलॉन होकर पूर्व की भांति या उससे भी अधिक तीव्र गति से दौड़ने लगे, नव वर्ष 2021 में आप सभी के लिए यही मेरी कामना है ।
किसानों को आन्दोलन करते 20 दिन हो गए, इस बीच ठंड भी बढ़ी, बारिश भी आई, कोरोना का भय भी बना हुआ है किन्तु मानों वे ठान बैठे हैं कि बात मनवाकर ही चैन से बैठेंगे तभी आन्दोलन समाप्ति की घोषणा करेंगे । अब भूख हड़ताल भी करने जा रहे हैं । दूसरी ओर सरकार कई दौर की बातचीत कर चुकी है अर्थात् हल निकालने का प्रयास किया जा रहा है लेकिन 20 दिन का बीत जाना यह साफ संकेत दे रहा है कि प्रयास नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं ।
एक बात अवश्य किसानों की ओर से अच्छी की जा रही है कि वे इसे राजनैतिक रंग नहीं देना चाहते । कुछ छात्रें ने इसमें शामिल होने की पेशकश की, वापिस भेज दिया गया । राजनैतिक पार्टियों ने भी अपना समीकरण बिठाने का विफल प्रयास किया । किन्तु प्रश्न अब भी वही µ बात अब कैसे बने–––– । इस आंदोलन से भी प्रतिदिन हजारों करोड़ रुपयों का नुकसान हो रहा है । सरकार को भी और किसानों को भी सहमति का कोई रास्ता तो निकालना ही होगा, अपनी–अपनी बात पर दोनो अड़े रहेंगे तो हल होगा नहीं और कोरोना से निपटते हुए नाक में दम आ गया एक ओर नई मुसीबत मोल ले बैठे जिससे सभी आहत होंगे । बात करने से ही बात बनती है भाई––––!

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