देखते ही देखते वर्ष समूचा निकल गया

देखते ही देखते वर्ष समूचा निकल गया

देखते ही देखते वर्ष समूचा निकल गया

अपना पेट भरने को सँस्कार सब निगल गया

कविता मल्होत्रा

2020 मानव जाति के लिए एक अविस्मरणीय सँदेश बन कर उभरा है।वर्ष का आख़िरी महीना अपने साथ अनेक प्रकार की मिश्रित प्रतिक्रियाएँ लेकर आया है।

अनगिनत परिवारों ने कोविड-19 के विषाणु से ग्रस्त अपने अनेक सदस्य खोए हैं।बहुत से लोगों से उनके रोज़गार छिन गए हैं।महामारी के कारण होने वाले लॉकडाऊन के परिणाम स्वरूप, वर्किंग कल्चर दफ़्तरों को लोगों के घरों में ही ले आया।बच्चों से उनका बचपन छिन गया। न सँगी साथियों संग खेलने के अवसर रहे, न ही स्कूल के समय की पाबंदी रही।ऑनलाइन स्क्रीन टाइम बच्चों की सारी मासूमियत निगल गया।

डिजिटल इंडिया का डिजिटल होता बचपन, केवल रोबोटिक उपाधियों का कोष बन कर रह गया है। तमाम प्रोजेक्ट बच्चों के माता-पिता पूरे कर रहे हैं और बच्चों को दिए जा रहे ई सर्टिफिकेट ड्राइँग रूम की शोभा बढ़ाने लगे हैं।

वास्तविकताओं से कोसों दूर, आजकल के डिजिटाइज़्ड बच्चे भले ही ऑनस्क्रीन परफारमेंस के बेहतरीन खिलाड़ियों में अपने नाम दर्ज़ करवा लें, लेकिन प्राकृतिक शिक्षा के अभाव में परस्पर सहयोग की भावना से अँजाने हैं।

बड़े-बड़े मगरमच्छों के व्यवसाय ठप्प हो गए हैं इसलिए वो मछलियों को निगल कर ही अपना पेट भरने लगे हैं।मासूम मछलियाँ क्रूर मगरमच्छों का शिकार बन रहीं हैं।

आज भी अगर कहीं जीवँतता का अहसास है तो प्रकृति के सान्निध्य में विचरते परिंदों के जीवन का अवलोकन करके देखिए।परिंदे हमेशा की तरह आज भी तिनका-तिनका जोड़ कर अपने नीड़ बनाते हैं।जो भी भोजन उन्हें नसीब होता है, उसी से वो अपने बच्चों का पोषण करते हैं।निःस्वार्थ भाव से उन्हें, उड़ने की कला सिखाते हैं, और उनसे बग़ैर कोई अपेक्षा किए, उन्हें स्वतंत्र उड़ान भरने के लिए मुक्त कर देते हैं।

लेकिन मानव जाति ने सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर एक दूसरे को यथोचित योगदान देना भी बंद कर दिया है।

सभी उत्सव वर्चुअल हो गए हैं।मशीनी युग की हर पीढ़ी असमँजस में है।

ऐसी स्थिति में लोगों की मानसिकता को तराशना बहुत ज़रूरी है, ताकि प्रकृति के माध्यम से निःस्वार्थ सेवा भावना के बीज बोकर निःस्वार्थ प्रेम की फसल उगाई जा सके।

मानवता के उत्थान का यही एक उपाय बचा है जो बुद्धू होती जा रही तथाकथित, प्रगतिशील मानव जाति को बुद्ध होने के संकेत दे सकता है।

दशरथ माँझी ने पहाड़ खोद कर सड़क बना डाली थी लेकिन लॉकडाऊन से प्रभावित पीढ़ी रास्ते के पत्थर हटाने की बजाय अपने स्वार्थ साधते हुए दूसरों की राह का पत्थर बनती जा रही है। कौन जाने कितनी साँसें शेष हैं, इस का तो कोई हिसाब नहीं, लेकिन ये तो तय है कि अपने खातों में जमा काले कारनामों का खुलासा किए बिना तो किसी को भी घर वापसी का वीज़ा नहीं मिलने वाला।

खुद पेड़ लगाने की बजाय,लगे लगाए वृक्षों की जड़ो और शाखाओं पर प्रहार कर के प्राकृतिक आक्सीजन के स्त्रोत नष्ट करने पर तुली सभ्यता वेंटिलेटर पर कितने दिन और कैसा जीवन जी पाएगी, इसके अनुमान की कल्पना भी हृदय विदारक है।

एक दूसरे के सहयोग का संकल्प ही वास्तविक पूजन का विधान है, तभी तो प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखा कर प्रतिमाओं को पूजने के सब द्वार बंद कर दिए।

अगर रूह श्रृँगारित है तो आज भी शाश्वत प्रेम संभावित है।फिर देर किस बात की! नई सोच के साथ नए वर्ष का स्वागत करें।

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चाहतें किसी विषैले वायरस से कम तो नहीं,वक्त ने तमाम दावों को झुठला दिया

रोज़गार नहीं तो क्या हुआ,वात्सल्य की मुट्ठी भर रेज़गारी ने फाकों से सेहतमंद बना दिया

कोरोना वायरस के बर्फ़ानी क़हर ने सब रगों में दौड़ती हर समझदारी को जमा दिया

सूरज किसी विषाणु का ग़ुलाम नहीं,लौटाकर सारी धूप जग को,आईना सच का दिखा दिया

रेतीली है धरती तो क्या,अपने ही अँदर बहते झरने की आँच से,जलधार बँजर अवनि में उगा दिया

गठबँधन हर पाषाणी सभ्यता से करके,समूचे विश्व के लिए मंडप निस्वार्थ प्रेम का सज़ा दिया

ज़माना कहे पागल तो क्या,बह गया आँखों से काजल तो क्या,जलवा श्रृँगारित रूह का दिखा दिया

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