धरती का ये बेचारा भगवान

धरती का ये बेचारा भगवान

अच्छे दिन कब आएंगे,अब पूछ रहा,धरती का ये बेचारा भगवान।खाने को तो अन्न नहीं,फिर कैसे कह दें,यही है अन्नदाता किसान ॥
झूठे वादे और इरादे से खूब भरमा रहे हैं,ये सभी नेता बड़े  महान।ठिठुरन से भरे खुले मैदान में,ये धरतीपुत्र देखो सो रहे सीना तान।।
गर्मी की तपिश हो या सर्दी की ठंड,किसान करता है खूब काम ।ओस पड़े कितनी,फिर भी कभी रुकने का, नहीं लेता कोई नाम।।
हाड़ फोड़ मेहनत से देखो, वो हर वर्ष कैसे बोता है फसल तमाम।फिर भी क्या,कभी उसे  मिल पाया है निज लागत का पूरा दाम।।
निष्कपट भोला भाला ये आदमी,हमेशा ही तो,होता है,खूब बदनाम।शहर में,सभी इसे लूटते खसोटते,उतार ही लेते हैं इसकी,पूरी चाम।।
डेढ़ गुना आय के झांसे में आ कर, जिसको दे बैठे हैं हम सब  वोट।समझा न सके हित हमें,हितकारी कानून का,दिखता है उसमें खोट।।
हम ही सत्ता में लाये थे तुम्हें,हम से ही दूर हुए,पहन बन्द गले का कोट।वक्क्त आएगा जब हमारा,तब तुम रह रह कर सहलाओगे,अपनी चोट।।
ये तो एक न्याय युद्ध हैं, कब तक करते रहोगे, तुम यूँ, राहें अवरूद्ध।पीड़ित अन्नदाता की सुननी होगी गुहार,वो क्यों आज है इतना क्रुद्ध।।
पहले भी किसानों ने सर्वदा संघर्ष में,छोड़ी है हर बार अपनी पूरी छाप।दूर कर हर शंका,दर्द समझो उनका अन्तर्मन से,नहीं है,ये व्यर्थ विलाप।।
रचा जाएगा अब नया इतिहास,किसानों ने है सत्ता के हर द्वार को घेरा।मन में ले अग्न,सिर पे बांध लिया है कफ़न,भूल गए सब, क्या तेरा मेरा।।
-राजकुमार अरोड़ा गाइडकवि,लेखक व स्वतंत्र पत्रकार

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