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भूकंप

मत बनाओ!

इंसानों गगनचुंबी इमारतें

धरती खोदकर

वरना: कुदरत का करिश्मा!

आंखों से देख ली

फिर भी नहीं मानते

अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करते रहते

सर पर मौत का छत डालकर

बना लेते सौ सौ तल्ले

और अहंकार में कहते

मेरे देश की बल्ले बल्ले।

जब सहती नहीं भार

पृथ्वी की परतें

सौ सौ तल्ले हजारों मकानों की

तो!मजबूरन आते भूकंप

डूब जाती तेरी बुद्धि की  वो!कील

जहां इंसानों को मलवे में दफ़न कर देते

हजारों हज़ारों बच्चे, बूढ़ों, जवानों को

 उस समय तुम क्या?कर लेते

प्रश्न!प्रश्न ही रह जाते

और कुदरत को दोष देकर

फिर करने लगते इंतजार….

अगले भूकंप की।

भीम प्रसाद प्रजापति

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