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गणेश चतुर्थी पर श्री गणेश करें

श्रीमती कविता मल्होत्रा (संरक्षक-स्तंभकार-उत्कर्ष मेल)

गणेश चतुर्थी पर श्री गणेश करें

चिंतन ही जीवन का उद्देश्य करें

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बुद्धि समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त करने के लिए मनुष्य उम्र भर एक प्रतियोगी की तरह अनेक रास्तों से गुज़रता है।अधिकतर रास्ते स्वार्थ सिद्धि की बुनाई से गुँथे होते हैं इसलिए गंतव्य पर न पहुँच कर बहुत से मुसाफ़िर लुभावने परिदृश्यों के मकड़ जाल में उलझ कर रह जाते हैं और उम्र मुट्ठी से रेत की तरह फिसल जाती है।

वार्षिकोत्सव की तरह एक भव्य आयोजन में गणेश वंदना के रास्ते ईश स्तुति का दिखावा क्या किसी को बुद्धि का एक अँश भी प्रदान कर सकता है!

अगर बुद्धि ही नहीं होगी तो किसी भी तरह की समृद्धि को दीमक लगते देर कहाँ लगेगी!

सौभाग्य प्राप्ति के लिए मन्नतें माँगने वालों की मुरादें कब पूरी होतीं हैं!

बहुत सारा धन इस दिखावे के पँडाल में व्यर्थ करने से बेहतर है कि मनुष्य अपने मन को लगाम दे और एक संयमित जीवनशैली का चयन करके मनुष्य जीवन का परम उद्देश्य पूरा करने की ओर अग्रसर हो।

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धरती समझे अँबर को ऊँचा

अँबर को लुभाए धरा की गहराई

पत्थरों के आलिंगन से किसे मिली

बीज के वट वृक्ष हो जाने की ऊँचाई

रामराज्य की कामना में आधुनिक काल

अर्थ न जानें रामायण का,कंठस्थ हर चौपाई

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हर त्योहार पर विभिन्न प्रतियोगिताओं के आयोजन भी अब बाज़ारू हो गए हैं।बच्चों को सहभागिता के सर्टिफिकेट और सांत्वना पुरस्कारों के माध्यम से कुछ पाने के चक्रव्यूह में घेर कर उत्सव का वास्तविक अर्थ जानने से वँचित कर दिया जाता है और पिज़्ज़ा बर्गर की रिश्वत देकर उत्तम स्वास्थ्य को दाँव पर लगा दिया जाता है।

क्या है नूडल्ज़ की तरह टेढ़ी-मेढ़ी इस सभ्यता का सलीक़ा! जिसके लिए अपनी संस्कृति और संस्कारों की तालीम ही अज्ञात है उस पीढ़ी से वट वृक्ष की विराटता की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है!

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जो खुद से कभी भी हो न सका

वो भावी पीढ़ियों से कैसे करवाएँगे

भला कैसे उदित होंगे विवेकानंद अगर

अंधेरे,बादलों में छिपे भानु को दीप दिखाएँगे

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अगर बाज़ारू राख़ के नीचे संस्कारों की एक भी चिंगारी सुलग रही हो तो मौसमी बुख़ार की तरह इच्छाओं का कोलाहल भी एक निश्चित मियाद के बाद स्वतः ही शांति में परिवर्तित हो सकता है।लेकिन सर्वस्व रूपांतरण की क्रांति तभी घटित हो सकती है अगर दूसरों को हरा कर अपनी जीत का लक्ष्य बनाने वाली चिंताग्रस्त पीढ़ी समूची मानव सभ्यता को समानता के स्तर पर लाने का चिंतन करे और इस दिशा पर कदम भी बढाए।मौसम कभी किसी के चाहने से नहीं आते बल्कि मानव अपनी इच्छा शक्ति से हर मौसम का लुत्फ़ उठाने का इल्म सीख सकता है।ज़रूरत है केवल एक चिंतनशील हृदय की जो सारी सृष्टि में हरि का दर्शन किया करे।

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किसी को जलाने से बेहतर

हम बारह मासा जुगनू बन पाएँ

हर आँख की नमी में सात सागर

चिंतन को अपनी जीवननैया बनाएँ

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