खामोश

खामोश

मै मंहगाई हूँ
तेरी कमर तोड़ने आई हूँ
कर ले तू लाख जतन
लूट के रहूँगी तेरा अमन
मेरा तुझसे रिश्ता पुराना है
तू मुझे बुलाये न बुलाये
मुझे तो तेरे घर आना है
तेरी ज़िंदगी पे तो मेरा हक़
सौफ़ीसदी मालिकाना है
मै डंके की चोट पे कहती हूँ
कोई क्या कर लेगा मेरा
मै अकेली नहीं हूँ
जमाखोरियों/कालाबाज़ारियों/सटोरियों
से रिश्ता पुराना है मेरा
मै इनकी छत्र छाया मे पनपती हूँ
कहकहे लगाती हूँ/ मज़े लेती हूँ
मुझे तू बड़ा प्यारा लगता है
जब अपने खर्चे का रोना रोता है
श्रीमति जी की झिड़कियाँ सुनता है
अपनी बिटिया से वादा खिलाफी करता है
अपना गुस्सा बेटे पे उतारता है
नींद मे भी मासिक किश्तें अदा करता है
कम से कम खर्च मे ऑफिस पहुँचने के
सैकड़ों जतन करता है
पर मै तेरा फायदा भी कराती हूँ
मेरे बढ्ने से तेरा वेतन बढ़ता है
ये अलग बात है
की कुछ नहीं होता है
तू जहां था वहीं दिखता है
मेरा शिकंजा कसता ही जाता है
चलो अब तो तुमसे दोस्ती हो गई है
एक राज़ की बात बताती हूँ
मुझसे निजात पाने का गुर सिखाती हूँ
पर बड़ा मुश्किल लगता है
प्रयास करके देखो
खूब मेहनत करो
अपनी आमदनी के नए रास्ते खोजों
थोड़ी अपेक्षाएँ कम कर लो
शायद कुछ बात बने
मैंने तो कह दिया है
अब करना तुम्हें है
मै तो जाने वाली नहीं
ये तो तय है ,,,,,,,,,

राजेश कुमार सिन्हा ,,,,,,,,,

कविता और कहानी