खुशी हो या गम नशा का सेवन क्यों

खुशी हो या गम नशा का सेवन क्यों

पर्व-त्योहारों या गम को दूर करने के लिए अथवा विभिन्न सामाजिक पार्टीयों में विशेषकर फब पार्टीयों में नशीली पदार्थो जैसे शराब सिगरेट आदि का प्रचलन बढ़ रहा है और इसे बुराई के तौर पर देखने की प्रवृत्ति प्रायः कमजोर हुई है।नतीजा, युवा वर्ग इस ओर ज्यादा आकर्षित हुए हैं जो एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए बेहद चिंतनीय है।आर्थिक और शारीरिक नुकसान के साथ-साथ घर का सामाजिक-आर्थिक तानाबाना भी बिखर जाता है निश्चिय हीं नशीली पदार्थ का सेवन शरीर और आत्मा, दोनों को नाश करती है।जिससे मानवता का हनन होना लाजिमी है।
ऐसी पार्टीयों में नशा नही करने वालो की आवाज मुश्किल से सुनाई देती है। हालत यहां तक पहुंच गई है कि जो इन समारोहों में नशा की बात नहीं करते हैं उन्हें नीची निगाह से देखा जाता है और उन्हें दूसरी अथवा नीचले या देहाती समझकर घृणित निगाह से देखा जाने लगा या विवश किया जाने लगा है।आखिर इस निजी और अच्छे आचरण को भी नशा के शौकीन लोग भावनाओं और मौलिकता को भेदभाव की बलि चढा देते है सभी के लिए समान भावना अब भरोसेमंद नहीं रही।अब खानदान, मान- मर्यादा या बड़ो का आदर,साधु-संतो का सत्कार जैसी भावनाएँ का ह्रास लगातार चरम पर है। समाज के वरिष्ठ लोग खुल कर निराशा जाहिर करते हैं और युवाओं को समझाने की कोशिश करते है लेकिन वो भी भैंस के आगे बीन बजाने के समान है उल्टे बुजुर्ग लोग ही उपेक्षाओं के शिकार हो जाते हैं।

   नशीली पदार्थो या शराब का सेवन राक्षसी और तामसी प्रवृत्ति का माना जाता है प्रचीन काल में यह राक्षसों का  पेय था क्योंकि राक्षस लोग ज्यादा भोजन और उपद्रव करते थे इसलिए उन्हें मदिरा पिलाकर मता दिया जाता था ताकि वे ज्यादा सोयें और कम क्रूरता बरतें कम खायें क्योंकि उतना खाना मिलना दुर्लभ था।जिसका उदाहरण हमें रावण के भाई कुम्हकरण की कहानियों से मिलता है।कहने का तात्पर्य क्या इस तरह शराब या अन्य नशीले पदार्थ का प्रचलन हमारे युवाओ को खोखला और राक्षसी प्रवृत्ति की ओर नही ले जा रहा?क्या समाज में बढती क्रूरता नशा तो नही?ऐसे संवेदनशील मसले पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों सामाजिक संगठनो के प्रभावी पहल की आवश्यकता आखिर इन खोखले होते मानसिकता पर कब होगा? यह तथ्य चिंतापरक है। हालांकि देश के कुछ राज्यों में इसके रोकथाम के लिए सख्त कानून बनाया गया है जिसका असर विशेषकर बिहार में देखने को मिल रहा है जहाँ शराब का चलन कुछ हद तक कन्ट्रोल में है ऐसे प्रभावी कदम की आवश्यकता शायद देश के सभी राज्यो को भी है।एक आदमी को कभी भी हटाया जा सकता है, लेकिन एक व्यवस्था  को हटाना कठिन होता है धीरे धीरे नशा का सेवन व्यवस्था में तब्दील होती जा रही है।

आज का युवा वर्ग नशा को नैतिक जिम्मेदारी समझने लगा है शराब सिगरेट तम्बाकू गुटखा जर्दा ड्रग्स गाजा भांग जितने भी नशीली वसूतुएँ है सभी के सभी जानलेवा है यह न तो कभी किसी को खुशी दे सकता है और न कभी गम बाँट सकता है।फिर ऐसे पदार्थो का इस्तेमाल क्यों?आज हम गरीबी भूखमरी कुपोषण के साथ कई ऐसी जटिल बीमारियों से लड़ रहे है रोज नई नीतियां बन रही है जबकि अरबो -खरबो रूपये रोज पानी की तरह इनसब नशीली पदार्थो के इस्तेमाल पर बहा दिए जाते है ।हालांकि इन सब चीजो के नियंत्रण के लिए कानून है नशामुक्ति केन्द्र भी है लेकिन भटके हुए युवाओ की तादाद भी कम नही जिनके रोजमर्रा के रूटीन में यह शामिल हो चुका है।कई घर और कई लोग नित ही जानलेवा रोगों के शिकार भी हो रहे है।जितने भी अस्पताल है शायद ही कोई ऐसा हो जिनमें ऐसे मरीज ना पहुँचते हो जो नशे की वजह से जिन्दगी और मौत के बीच उलझकर न रहे हो।एक ऐसा पदार्थ जो धीरे-धीरे अंदर ही अंदर खोखला कर जाता जबतक पता चलता देर हो जाती है और पूरे परिवार की गाढी कमाई के साथ जीवन को भी निगल जाती है।रह जाता है सिर्फ अफसोस।मानव के चरित्र, गुण जीवन,सुख, आर्दश,नैतिकता, व्यवहार संस्कार और सरलता का विनाशक है नशा।जितनी दूर इससे रहेगे उतना बेहतर जीवन जी सकेंगे।
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नशा से तौबा कर लो

नशे के चुंगल में,
गिरफ्तार ना होना
वक्त से पहले तुम,
वर्बाद मत होना।

गम अगर आए,
मुस्कुराना सीख लेना
जोश में आकर तुम
नशे में गिरफ्तार मत होना।

नशा खुद ही गम है,
जबतक पता चलता
निकल जाता दम है
इसकी रंगीनियों में डूबकर
खुद को बर्वाद मत होने देना।

चंद लम्हों की रंगीनियाँ
तुमको बहलायेगी
जब आदत पड़ जाएगी
सारे कुकर्मो से जीवन
तुम्हारी जकड़ जाएगी।

वक्त रहते ही सभी
संभल जाओ दोस्तों
वरना आदत पड़ते ही
जीवन नर्क बन जाएगी ।

तौबा कहना हर
नशीले पदार्थों को
जिन्दगी में भर लो
हँसी और मुस्कुराहटो को।

                        आशुतोष
                     पटना बिहार
कविता और कहानी