चीत्कार

चीत्कार

निः शब्द हो जाती है

अंतरात्मा भी उस पल

 ख्वाबों को अपने सामने

जब तिनका तिनका बिखरते देखती है ।

लेकिन

खुद का एक यकीं हूं मै

 जरूरत नहीं मुझे बेपरवाही की

खुद में सुरूर हूं

खुद का गुरूर हूं

अपनी ही ढाल हूं

हां मै कमाल हूं ।

दुश्वारियों से बिखरती नहीं

फर्ज़ से विचरती नहीं ।

ब्रह्माण्ड का अभिमान हूं

हां मै ईश्वर का शाश्वत सत्य

जननी नारी हूं ।

औरत की आबरू लूट जाती है वो जिंदा जला दी जाती है बेकसूर एक जान ना जाने कितने मासूम से ख़्वाब दर्द की चीत्कार के बीच अपनी लूटी हुई अस्मत और जलते हुए जिस्म की तड़प के बीच बेसहाय सी दम तोड़ जाती है ,और हम जैसे नकारे लोग दुनिया भर की बाते , नारे , मोमबत्तियों की रौशनी में  खुद को चमकाने निकाल जाते हैं ।पर सच तो यह है इन बातों के जिम्मेदार वो बहशी जिनको सिर्फ अपनी हवस नजर आती है जिनकी आत्मा इंसान के शरीर में एक राक्षस की हो जाती है सिर्फ कुछ पल के लिए एक मासूम को इतना दर्द दे जाती हैं , औरत इतनी असाहाय नहीं थी कभी , काली , दुर्गा , जिन्हें हम पूजते हैं राक्षशो का संहार करने का दम रखती थी लेकिन समाज की खोखले संस्कारों ने जन्म से ही औरत के अंदर संस्कारो की दुहाई दे दे कर उनका ऐसा पोषण किया कि उसे सिर्फ शारीरिक बलात्कार का ही नहीं , आत्मा के बालात्कार को रोज अपने घर के अंदर भी झेलना पड़ता है , खुद के पालन कर्ता उसे इतना कमज़ोर बना देते हैं कि वो घर से निकाल , हर क्षेत्र में आगे होने के बावजूद अपनी अस्मत की रक्षा नहीं कर पाती है , और ऐसे दरिंदो की गन्दी सोच , हवस के आगे खुद को जार जार होता देख भी सिर्फ सिसकियों में अपने दर्द की चीख को दबते हुए महसूस कर मुक हो इतनी निर्ममता से एक जलन एक असहनीय पीड़ा की आगोश में सो जाती है , पर हां पीछे ऐसे कई दरिंदे छोड़ जाती है जो उसके मरने के बाद भी रोज नए नए तरीकों से उसका बलात्कार करते हैं सड़कों चौहराहों पर , और फिर घरो की चार दिवारी में औरत को एक फैसला सुना दिया जाता है  , घर की कोई लड़की कोई औरत बाहर नहीं जाएगी क्युकी समय बहुत खराब है वहीं बेटों की तरफ एक नजर यह भी नहीं कहा जाएगा अपनी मर्दानगी का इस्तेमाल करो तो किसी लड़की किसी सूरत की रक्षा के लिए अपनी नज़रों में लाओ तो इज्जत उस जननी औरत के लिए जिसने खून से सिच तुम्हे जिंदगी में आने के काबिल बनाया ।

मनीषा गुप्ता ( मिशा )

कविता और कहानी