वरदान जो मिलते मिलते रह गया

वरदान जो मिलते मिलते रह गया

मैं शायद आप से ज्यादा बहादुर हूं, जो अपनी व्यथा कहने की हिम्मत जुटा रहा हूं, व्यथा तो आप की भी यही है, पर आप में, मेरी तरह हिम्मत
कहाँ। कुछ हिम्मत जुटाओ तो आओ मेरे साथ,आप भी बता ही दो
अपनी व्यथा।पहले तो किसी कारण से डांट पड़ती थी अब लॉक डाउन में तो अकारण भी।
निकम्मे,निठल्ले,नाकारा का शानदार तमगा तो मिलना ही है, चाहे कितना काम कर लो।
हमारे काम के डंके तो
बिना बाहर गए ही पहुंच गये। बेटे के स्कूल की प्रिंसिपल मैम ने कुछ कार्य से हम दोनों को बुलाया था, हमारे वहां पहुंचने पर मैम ने हमारी श्री मती जी से कहा -इनको तो मैं जानती हूं, आप क्या करती हैं, बताइये। श्री मती जी भृकुटि तन गईं, इनको
आप कैसे जानती हैं? मैम
मन्द मुस्कान लिये बोलीं-
इनको तो पिछले दिनों ऑन लाइन क्लासिस के दौरान इनको ड्राइंगरूम आदि में पोंछा लगाते देखा है। वापसी में नथुने फुलाए श्री मती जी मौन ही रहीं,क्या करतीं घर की बात सरेआम लीक जो हो गई थी। अब तो श्री मती
जी कभी कभी मुश्ठी प्रहार का रस भी चखा देती हैं।उस दिन तो हद ही हो गई,बर्तन मांज के हटा ही था,अपने जी एम साहब को फोन लगा कर बोला-साहब जी अब तो
वर्क एट होम करते करते थक गए, कुछ भी करो, ऑफिस बुला लो, साहब बोले थोड़ी देर रुक जाओ बाद में बात करता हूं, बस भगोना,कड़ाही माँजनी रह गईं हैं।

कल तो कमाल ही हो गया,पत्नी जी ने सोचा दोपहर में थक हार कर गहरी नींद सोया हूँ,पहले
अपनी परम सहेली को फोन मिलाया कह रही थीं -“भला हो इस कोरोना के
मारे लॉक डाउन का,मेरे
ये तो बर्तन मांजना,झाड़ू
पोंछा,दाल सब्जी बनाना सब सीख गये, बस अब रोटी बनाना और सीख जाएं तो मैं समझूँगी,गंगा नहा ली।”यही बात फिर मुँह लगी पड़ोसन को भी
कही,अब तो हमारी कीर्ति पताका पत्नी जी ने न जाने कहाँ कहाँ फहरा दी होगी, उनकी सहेलियां व
पड़ोसन चटखारे ले ले कर कितनी जगह बखान कर चुकी होंगी।मेरी सासू
माँ को अपनी विजयगाथा
की प्रगति का नया संस्करण तो हर पहर प्रसारित करती ही रहती हैं।

रात को उत्तर रामायण देख रहा था,दस बजने को थे,उस दिन के एपिसोड का अंतिम चरण था,जिसमें भगवान शिव लवणासुर जैसे अधम व दुष्ट पापी को भी वरदान दे देते हैं,वो तो आशुतोष हैं, जल्दी ही प्रसन्न हो जाते हैं, मेरे मन में भी आया,क्यों न मैं भी भूखा
प्यासा रह कर शिव की आराधना कर वर पा लूं , शायद मेरी व्यथा का अंत हो जाये,यही सोच मैं जहाँ था,वहीं धूनी रमा
कर शिव तपस्या में लीन हो गया। कई दिन से भूखे प्यासे रह कर लगातार
मुझे तपस्या करते देख
भगवान शिव प्रकट हो गये, बोले-“वत्स मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूँ, जो वरदान मांगना चाहते हो मांगो!
मैं तो अनवरत चली आ रही अपनी व्यथा से ही
व्यथित था ही,कुछ और सूझा ही नहीं मैं एकाएक कह बैठा-“भगवन,बस यह वरदान दे दीजिये कि
मेरी पत्नी मुझे कारण अकारण डांट डपट न करे,मन बहुत व्यथित होता है।”
भगवान शिव मन्द मन्द मुस्कराये व बोले – वत्स मैं यह वरदान तुम्हें नहीं दे सकता,पार्वती ने स्वयं बस एक यही वरदान देने से मना किया है, यह तो नारी जगत को विवाहोपरांत मिला
विशेषाधिकार है,हाँ इस के प्रभाव का अनुभव कम करने का एक उपाय है-पत्नी की डांट डपट
को किसी मंदिर की अधिष्ठात्री देवी द्वारा दिया गये प्रसाद की तरह ग्रहण करो वह कभी कम कभी ज्यादा हो सकता है। जिस दिन यह प्रसाद न मिले उस दिन तुम्हें खुश व आनन्द मग्न होने,अपने
सौभाग्य पर इतराने का पूरा अधिकार है और हाँ
वत्स,तुमने भूखे प्यासे रह
तपस्या की,मंत्र जाप किया,एक वरदान तो हर
हाल में देना बनता ही है, मैं सोच ही रहा था कि अब कौन सा वरदान मांगू
इतने में श्रीमती जी की तेज़ आवाज़ कानों में पड़ी-“साढ़े छह बजे गये अभी तक कुम्भकर्ण की तरह सो रहे हो,मैं नहाने जा रही हूँ, मेरे आने तक
टेबल पर चाय बिस्किट सहित तैयार मिलनी चाहिए” मैं आंखे मलता हुआ रोज की अपनी नियति से हाथ मिलाने उठ खड़ा हुआ।
-राजकुमार अरोड़ा’गाइड’
कवि,लेखक व स्वतंत्र पत्रकार
सेक्टर 2,बहादुरगढ़(हरि०)

कविता और कहानी