मध्यम कौन?

“मध्यमवर्ग”
मध्यम कौन?
जो बीच का हो !
या यूँ कहें दुल्हा दुल्हीन के बीच
लोकनियाँ है !
समस्याँ मध्यवर्ग की सोच में नहीं
उसकी सदियों से
वटवृक्ष के समान फैली
साखाओं में है
जो जड़ कर चुकी!
अंदर ही अंदर
स्तंभ बनकर!
वैसे ही मध्यमवर्ग कभी
जरूरतों से आगे बढ़कर
नयी चुनौतिओं का सामना
दंटकर नहीं कर पाता
बल्कि उसकी सोच उसे
“यथास्थिति का समर्थक”
सदा बनाये रखती है
वो सदा मध्यमार्ग के
रस्ते पर चलता है!
इसलिए वो रीति-रिवाज,
धर्म-परम्परा व जाँत-पाँत
नौतिकता के मायाजाल से
उसका मोहभंग हो नहीं पाता !
सदा गधे के तरह इनको ढोता है
वह कहाँ है?
सदा भूल जाता है
अपने वजूद को तलाश नहीं पाता है
छटपटाता,तड़पता,फड़फड़ाता रहता
पर “विवश्ता की बेड़ियों” में
फिर से बंघ जाता
इन्हें ठोने के लिए !
हाय् मध्यमवर्ग
उच्चवर्ग में पहुँचने के लिए
सदा हाथ-पाँव मारा फिरता
पर भूल जाता जितनी चादर हो
उतना ही टांग पसारना चाहिए!
जनसंख्या में सत्तर प्रतिशत से
अधिक होकर भी
सताईस प्रतिशत का ही लाभ पाता
उसपर भी मलाई कोई और
मार ले जाता!
मध्यवर्ग बीच का बीच में
सदा लटका रह जाता!
कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार
मैं जीव हूँ
तुझसे अनुरोध नहीं’
तेरा आवाह्न कर रहा हूँ !
हे ईश्वर मैं तेरा ही अंश हूँ
तुझमें मिलकर ही
एकदिन पुर्ण हो जाउँगा !
पूर्व के नौ रूप तूने
राक्षसों का वध करने के लिए
पर दसवाँ अवतार तुझे
मानव के भैस में छुपे राक्षसों के
संहार हेतु लेना होगा !
धरा पर पाप की अति हो चुकी
पृथ्वी माता तक त्राहिमाम् है
प्रकृति के जीव जन्तु का अस्तित्व तक खतरे में
दुनिया में मानवता भी अवशान पर
मानव मानव के रक्त का पिपासु बन बैठा
स्त्री का स्तित्व का असम्मानीय हुआ
अच्छा बुराई की भेद मिट चला समाज में!
सत्य का अल्ख जगाने
फिर से एक बार
आ जाओ तुम प्रभु
इस बार तुम्हारा संधर्ष तेरे ही अंश से है
देखना है विजय तेरी अप्राशित रहती है
या तेरी पराजय !
कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार

कविता और कहानी