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पूजा का शंख : अजय कुमार पाण्डेय

पूजा का शंख

            ज दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा की थाली सजाते हुए सविता ने शंख निकाला तो कुछ देर के लिए उसे हाथ में लेकर ठिठकी रह गई। इस शंख में उसे दो मासूम सी आंखें अपनी ओर ताकती दिखाई दीं। इन आंखों में एक करुणा थी, एक अपनापन था, एक शिकायत थी, कुछ बिछुड़ने का दर्द था। कुछ सवाल थे मानो पूछ रहे हों आप क्यों जा रही हो, उसे रोकने का आग्रह था उनमें। वे आंखें सजीव होकर बोल रही थीं मत जाओ, रुक जाओ…। सविता को आज वे छलछलाती आंखें उसी तरह याद आ गईं जैसी उस ने आज से अठारह बरस पहले चेन्नई से वापस आते समय अपने पीछे छोड़ी थीं।

            बात उन दिनों की है जब सविता की भाभी निर्मला को उपचार के लिए चेन्नई के एक सुप्रसिद्ध अस्पताल में भर्ती किया गया था। उन्हें हृदयाघात हुआ था एवं ओपन हार्ट सर्जरी हुई थी। अस्पताल की व्यवस्था के अनुसार मरीज की सेवा के लिए मात्र एक ही परिचायक की अनुमति थी। परिजनों को मरीजों से मिलने का समय शाम चार से पांच बजे तक का ही था अत: अस्पताल के पास ही एक सुइट किराये से ले लिया गया था। इस अस्पताल का बड़ा नाम था। यहां दूर दूर से लोग इलाज करवाने आते थे। मरीजों के परिजनों के रुकने के लिए अस्पताल के आस पास लोगों ने बड़ी बड़ी इमारतों में व्यवस्था कर रखी थी। दस बाई सोलह के कमरे में एक कोने में डबल बेड लगा था, दूसरे कोने में आधे भाग में अटैच बाथरूम था। बाथरूम की बाहरी दीवार में किचन का प्लेटफॉर्म बनाया गया था, उसके पीछे दीवार में छुट पुट सामान रखने के लिए एक आलमारी बनी हुई थी। कुछ अतिरिक्त शुल्क लेकर उन इमारतों के मालिक खाना बनाने के लिए गैस एवं मनोरंजन के लिए टी.वी आदि भी उपलब्ध करवा देते थे। आस पास कुछ दुकानें भी थीं जहां किराने से लेकर प्राय: हर तरह का सामान मिल जाता था। जिन लोगों को अधिक दिन रहना पड़ता था वे इन इमारतों में आकर रहते थे। उत्तर भारतीयों को प्राय: खान पान की दिक्कत होती है अत: वे अपना खाना स्वयं बनाते थे। यह इलाका मुस्लिम बहुल होने से एवं हिन्दी और उर्दू एक जैसी होने के कारण हिन्दी बोलने समझने में अधिक परेशानी भी नहीं होती थी। जब यहां आकर उपचार करवाने का निर्णय लिया था तो कुछ जानकारों ने बताया था कि यहां हिन्दी में बात करने पर लोग उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं और सहयोग भी नहीं करते हैं लेकिन इस जगह के उर्दू बोलने वाले व्यापारी हिन्दी समझते भी थे और पूरा सहयोग भी करते थे अत: उन्हें यहां अधिक दिक्कत नहीं हुई। बाकी जगह अंग्रेजी से काम चल जाता था।

            अस्पताल में प्रारम्भ के दो दिन तो मात्र विभिन्न प्रकार के परीक्षणों में ही निकल गए थे। उसके पश्चात निर्मला को भर्ती करके हृदय की ओपन हार्ट सर्जरी की गई थी। एक सप्ताह अस्पताल में ही रुकना था। मरीज की देखभाल के लिए एक अटेंडेंट रखने की अनुमति थी साथ ही एक विजिटर पास मिला था। सविता के साथ उसके भैया सोमेश और पति रोहित भी थे। अस्पताल में मरीज की देखभाल के लिए हम तीनों बारी बारी से रहा करते थे। बाकी दो लोग वहीं ‘अज़मत मंज़िल’ में रहते थे सोमेश ने पूरे एक महीने के लिए यह कमरा किराये पर ले रखा था। दक्षिण भारतीय व्यंजन खाने का अभ्यस्त न होना भी एक बड़ी समस्या थी अत: स्वयं खाना बनाने का निश्चय कर लिया था। मरीज़ को तो अस्पताल के न्यूट्रिशियन की सलाह पर वहीं से खाना उपलब्ध कराया जाता था। बाकी लोगों के लिए अपना प्रबंध स्वयं करना पड़ता था।

            यह इमारत एक मुस्लिम परिवार की थी। इसका मालिक अहमद अली था। उसका परिवार बहुत बड़ा था और उसमें काम करने वाले लोग भी प्राय: उसी परिवार के सदस्य ही थे। अहमद अली के किसी दूर के रिश्तेदार अल्ताफ का बेटा था अनीस। उम्र कोई बारह बरस की रही होगी उसकी। उसके परिवार की माली हालत कुछ अच्छी नहीं थी। अब्बू किसी मिल में छोटी सी नौकरी करते थे। अम्मी थोड़ा बहुत सिलाई कर के कमा लेती थी। अनीस कुल मिला कर सात भाई बहन थे अत: इतने से घर का गुजारा होना बहुत कठिन था। भाई बहनों में सबसे बड़ा होने के कारण और आर्थिक स्थिति अनुकूल न होने से पढ़ाई लिखाई तो दूर की बात थी, उसके अब्बू ने अहमद अली से कह कर उसे अज़मत मंज़िल में ही काम पर लगवा दिया था। अनीस उम्र में था तो बहुत छोटा और कहने को उससे छोटे मोटे ही काम करवाये जाते थे लेकिन ये छोटे मोटे काम ही इतने अधिक हो जाते थे कि उसे साँस लेने की भी फुरसत नहीं मिलती थी। वह सुबह छ: बजे से आ जाता था। अज़मत मंज़िल के हर कमरे की साफ सफाई, पानी आदि भरने से लेकर ज़रूरत का सामान ग्राहकों तक पहुँचाना, उसे सब करना पड़ता था। कहने को सरकार ने बाल मज़दूरी पर प्रतिबंध लगाया हुआ है लेकिन अहमद अली अनीस के काम को मज़दूरी की श्रेणी में नहीं मानता था। उसका कहना था कि यह तो घर का ही लड़का है। मैं इससे मज़दूरी कैसे करवा सकता हूँ? यह मेरे काम में मेरी सहायता कर देता है और उसके बदले मैं उसके खाने कपड़े का प्रबंध कर देता हूँ।

            अनीस को अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास था। उसके चेहरे पर एक आत्म विश्वास की चमक दिखाई देती थी। कभी लगता वह इतनी छोटी उम्र में कितना परिपक्व हो गया है। लेकिन था तो वह आखिर बच्चा ही। अभी उसका लड़कपन भी नहीं गया था। सोमेश उसे रोज़ पाँच दस रुपये अपने पास से भी दे देते थे अत: वह इस कमरे की साफ सफाई पर अतिरिक्त ध्यान देने लगा था। कभी किसी सामान की आवश्यकता हो तो वह दौड़ कर पास के ही बाज़ार से ले आता था। इस तरह उससे अनजान जगह में बहुत मदद मिल जाती थी। मेरे भाई ने पहले से सूचित कर दिया था अत: मैं अपने साथ आवश्यक कुछ बरतन भी साथ ले आई थी। गैस सिलेंडर और स्टोव का प्रबंध अज़मत मंज़िल की ओर से हो गया था। बाज़ार निकट होने से सभी सामान मिल जाता था अत: सविता ने स्वयं खाना बनाने का निर्णय ले लिया था। कभी खाना बच जाये या फिर अनीस भी मौजूद रहे तो वह उसके लिए भी बना लिया करती थी। अनीस को खाना और नाश्ता सब अज़मत मंज़िल में ही मिलता था उसे बाहर कुछ भी खाने की सख्त मनाही थी। उसे स्पष्ट निर्देश था कि वह किसी भी ग्राहक से पैसे या खाने का कोई भी सामान नहीं लेगा। और फिर हिन्दुओं के हाथ का तो कुछ भी नहीं। अनीस की उम्र सविता के बड़े बेटे अर्पित के बराबर ही थी अत: उसे देख सविता को अपने बच्चों की याद आ जाती थी। उसे अनीस में अपने बेटे की झलक मिलती थी अत: वह अनीस को उसी तरह ममत्व की नज़र से देखती थी। जानवर भी सच्चे स्नेह को समझते हैं फिर अनीस तो इंसान का बच्चा था और बच्चों को जहाँ प्रेम और अपनापन मिलता है वे वहाँ खिंचे चले आते हैं। अनीस जब भी काम से फुरसत पाता तो खाली समय में सविता के पास आकर बैठ जाता था और दुनिया भर की बातें करता था। न जाने सविता के साथ उसका क्या रिश्ता बन गया था कि वह अपनी छोटी से छोटी बातें भी साझा करने लगा था। उसकी बाल सुलभ बातों में सविता को बड़ा आनंद आता था। एक दिन अपने काम से फुरसत पाकर अनीस सविता के पास आया। खाने का समय हो रहा था और सोमेश भी अभी अभी ही अस्पताल से आये थे। सविता उनके लिए खाना लगाने जा रही थी। उसने अनीस से कहा

      “अनीस… खाना खायेगा? आ, थोड़ा सा तू भी खा ले।” अनीस थोड़ा झिझका फिर कहने लगा

      “नहीं, काकी”

      “थोड़ा सा ले ले न, बढ़िया आलू गोभी की सब्जी बनी है”

            सोमेश की थाली से सब्जी की भीनी भीनी सुगंध वातावरण में फैल रही थी। अनीस का ध्यान रह रह कर उसी ओर जा रहा था। वह ललचाई नज़रों से कभी कभी उस ओर देख लेता था। यह बात सविता ने भाँप लिया। उसने एक थाली में दाल, सब्जी रोटी और चावल के साथ अपने साथ लाया हुआ कटहल का अचार रखा और अनीस की ओर बढ़ा दिया। अनीस इस बात के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। वह हड़बड़ा कर एकदम पीछे हो गया। उसने कहा

      “नहीं काकी, मैं नहीं खाउँगा”

            सविता उसके हाव भाव देख कर समझ गई कि इसका मन तो है लेकिन वह खाने से मना कर रहा है। उसने पूछा “क्या बात है अनीस, क्यों नहीं खायेगा? क्या खाना अच्छा नहीं बना है?”

      “नहीं, वो बात नहीं है”

      “फिर, क्या किसी ने मेरे हाथ का खाना खाने से मना किया है?” सविता ने उसे छेड़ते हुए पूछा।

            अनीस का चेहरा थोड़ा मुरझा सा गया। कुछ झिझकते हुए वह बोला

      “मेरे अब्बू कहते हैं, हिन्दू के घर का खाना नहीं खाना चाहिए। आप लोग हिन्दू हो न?”

            सविता अवाक रह गई। इस छोटे से मासूम बच्चे के मन में किस तरह की बातें भरी जा रही हैं? उसने अनीस से पूछा

      “हिन्दू क्या होते हैं, तू जानता है? क्या हम लोग तुझ से अलग दिखते हैं या हमारे सिर पर सींग हैं?”

      “नहीं, आप लोग तो बहुत अच्छे हो।”

      “फिर क्यों मना करते हैं तुम्हारे अब्बू हमारे यहाँ खाने से? हम लोग ब्राह्मण हैं। हम लोग तो शुद्ध शाकाहारी हैं। हमारे यहाँ तो अण्डे तक नहीं बनते हैं।”

      “पता नहीं काकी, वो कहते हैं कि हिन्दू के घर का खाना हराम होता है।”

      “अच्छा, ये खाना हराम कैसे होता है? खाना तो आखिर खाना ही है जो जीवन के लिए आवश्यक है। बिना खाये तो कोई प्राणी ज़िन्दा भी नहीं रह सकता है। जीवन के लिए आवश्यक वस्तु हराम कैसे हो गई?”

      “पता नहीं। लेकिन मुझे मना करते हैं।” अनीस कह तो रहा था किंतु उसका मन खाने की भीनी भीनी खुशबू से ललचा भी रहा था। सविता ने उसकी मन:स्थिति ताड़ते हुए थाली उसकी ओर खिसका दी। अनीस कुछ डरते झिझकते हुए पहले कमरे के खुले दरवाज़े की ओर गया फिर उसे बंद करके वापस आया और खाने बैठ गया। सविता ने उससे दरवाज़ा बंद करने का कारण पूछ तो कहने लगा

      “कोई मुझे यहाँ खाना खाते देखेगा तो मेरी शिकायत कर देगा फिर मुझे खूब डाँट पड़ेगी।” सविता ने इस विषय में उससे अधिक बहस करना उचित नहीं समझा। वह अनीस की सरलता पर मन ही मन मुग्ध होकर बड़े स्नेह से उसे खाते हुए देखती रही। दरवाज़ा बंद करके अनीस भी निश्चिंत था। वह बड़ी तल्लीनता से सिर झुकाए खाने में मगन था। खाने के दौरान उसने एक शब्द भी नही कहा। खाने के पश्चात वह बोला

      “काकी, आज खाने में बहुत मज़ा आया। सब्जी के साथ ये क्या था?”

      “कटहल का अचार था। क्यों, अच्छा नहीं लगा?”

      “नहीं, सबसे अच्छा तो वही लगा। लेकिन ये कटहल होता क्या है?” अनीस अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए पूछ बैठा। सविता को उसके ये बाल सुलभ जिज्ञासा युक्त प्रश्न बड़े अच्छे लगते थे। अनीस जब से पैदा हुआ था वह इसी जगह रहा था। एक गरीब परिवार में उसकी परवरिश हुई थी। खान पान बहुत ही साधारण हुआ करता था। उत्तर भारतीयों का रहन सहन और खान पान से उसका परिचय लगभग न के बराबर था। वह हर बात जान लेना चाहता था।

      “कटहल एक बड़ा सा हरे रंग का फल होता है जिसमें बड़े बड़े काँटे होते हैं। प्राय: इसकी सब्जी बनाई जाती है। यहाँ भी तो होता होगा यह?” सविता ने अनीस से पूछा।

      “वो तो फ़नस होता है काकी।” अनीस ऐसे बोला मानो सविता गलत बोल रही हो और वह उसे सही नाम बता रहा है। सविता समझ गई यहाँ कटहल को फ़नस कहते हैं।

      “लेकिन हम लोग फ़नस की सब्जी नहीं खाते हैं।” अनीस ने कहा।

      “क्यों नहीं खाते? यह तो बहुत अच्छी लगती है। ये गर्मियों की सब्जी है। अभी ये नहीं मिलेगी, नहीं तो मैं बना कर तुम्हें खिलाती।” सविता ने कहा तो अनीस की उत्सुकता और बढ़ गई। वह कुछ और पूछने वाला था कि बाहर से अनीस को पुकारे जाने की आवाज़ आई। अनीस बड़ी फुर्ती के साथ उठा और बिना कुछ कहे दरवाज़ा खोलकर तेजी से बाहर की ओर दौड़ गया। सविता को आभास हुआ कि अनीस अपने मालिक से कितना डरता है। वह तो उसकी भोली भोली बातें सुन कर मुग्ध हो जाती थी। अनीस भी उसके वात्सल्य को महसूस करता था। इसके कारण कई बार वह मालिक से डाँट भी खा चुका था किंतु निश्छल स्नेह की डोर से वह खुद को नहीं बचा पाता था और समय मिलते ही खिंचा चला आता था। अनीस जब भी आता, दरवाज़े के पास ज़मीन पर बैठ जाता था वहाँ से उसकी नज़रें बाहर की ओर लगी रहती थीं। ज़रा सी आहट होने पर वह एकदम सतर्क हो जाता था। उसे डर लगा रहता था कि कोई उसे यहाँ बैठा देख कर अहमद अली को खबर न कर दे। अहमद अली ने उसे लोगों से अधिक मेल जोल न रखने की हिदायत दे रखी थी। एक बार अज़मत मंज़िल में ठहरे ग्राहक के बच्चों के साथ अनीस को खेलते हुए अहमद अली ने देख लिया था। बस उसके बाद उसकी क्या धुनाई हुई थी कि पूछो मत। उसे उस दिन खाना भी नहीं दिया गया और अल्ताफ अली के पास उसकी शिकायत भी कर दी गई। साथ ही उसे चेतावनी दी गई कि इसके बाद वह किसी ग्राहक से मेल जोल करने का प्रयास करेगा तो उसे नौकरी से निकाल दिया जायेगा। उसके बाद से अनीस बहुत सतर्क रहने लगा था। वह अहमद अली से बहुत डरता था।  

            एक दिन अनीस अपने दिन भर का काम निपटा कर आया और सविता के पास बैठ गया। फिर इधर उधर की बातें करते हुए पूछ बैठा

      “काकी, ये अलग अलग मज़हब क्यों होते हैं।”

            सविता उसका प्रश्न समझ नहीं पाई। उसने अनीस से पूछा वह क्यों यह सवाल पूछ रहा है। अनीस ने कहा

      “मेरे अब्बू कहते हैं कि हम लोग मुस्लिम हैं। हमें अपना मज़हब मानना चाहिए और अपने मज़हब वालों के साथ रहना चाहिए। जो लोग हमारे मज़हब को नहीं मानते वो क़ाफिर होते हैं। आप लोग तो मुस्लिम धर्म नहीं मानते हो, क्या आप लोग भी क़ाफिर हो?”

            सविता की समझ में नहीं आया कि वह क्या जवाब दे। वह अनीस की बाल सुलभ जिज्ञासा का दमन भी नहीं करना चाहती थी। उसे महसूस हुआ कि हम लोग बच्चों के मन में शुरू से ही धर्म के नाम पर भेद भाव के बीज बो देते हैं। वे यह तक नहीं जानते कि क्या अच्छा है क्या बुरा। सच तो यही है कि इंसान जब पैदा होता है, उस समय उसका कुछ भी नहीं होता है। उसे एक नाम, एक धर्म और बहुत से रीति रिवाज़ों से बाँध दिया जाता है जिसके इर्द-गिर्द उसका सारा जीवन घूमता रहता है। उसके मन में उसी समय से ही धर्म, सम्प्रदाय आदि के बीज बो दिए जाते हैं जो उम्र के साथ साथ सामाजिक वातावरण में अंकुरित होकर पनपने लगते हैं। अच्छे बुरे जो भी संस्कार उस समय बच्चे को सिखाए जाते हैं, उनका पालन वह अपने सम्पूर्ण जीवन भर करता है अथवा यह कहा जाए कि ढोता है। यदि उस समय बच्चों को सिर्फ़ इंसानियत और प्रेम का ही पाठ सिखाया जाए, जहां किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के विरुद्ध विद्वेष की भावना न होकर एकता का भाव हो और राष्ट्र के प्रति समर्पण हो तभी हम सही मायने में इंसान के चरित्र का निर्माण कर सकते हैं। कुछ देर सोच कर सविता ने अनीस से कहा

      “देखो अनीस, कोई भी धर्म या सम्प्रदाय बुरा नहीं होता है। हर धर्म में समाज को सुचारू एवं सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं ताकि लोग सही रास्ते पर चल सकें। समाज में बुराई न आने पाए। भलाई के कामों को पुण्य अथवा सवाब और आपराधिक कार्यों को पाप या अज़ाब की श्रेणी में रखा गया है। और इनके परिणाम स्वरूप स्वर्ग और नर्क या तुम्हारी ज़ुबान में जन्नत और जहन्नुम की अवधारणा बनाई गई है ताकि लोग बुरे कामों से दूर रहें और जीवन में अच्छे कार्य करते रहें।” सविता कुछ पल के लिए रुकी। उसने देखा अनीस बड़े ध्यान से उसकी बातें सुन रहा था। अचानक बाहर से अहमद अली की पुकार सुनाई पड़ी। अनीस एकदम उठ खड़ा हुआ और बिना कुछ कहे बाहर की ओर दौड़ गया। सविता को पता नहीं क्यों उस मासूम से बच्चे पर दया आने लगी थी। इस उम्र में जहाँ बच्चे पढ़ाई और खेल कूद में ही व्यस्त रहते हैं, वहाँ इस पर कितनी ज़िम्मेदारियाँ आन पड़ी हैं। इतना सब होते हुए भी आखिर वह है तो बच्चा ही। सविता ने घड़ी की ओर देखा तीन बजने वाले थे। अभी उसके पास थोड़ा समय था। चार बजे के आस पास रोहित आ जायेंगे। उन्हें चाय बना कर देना है। फिर उनके साथ वह भी अस्पताल चली जायेगी। उसने अपना काम समेटा और थोड़ी देर आराम करने के लिए बिस्तर पर जा लेटी।

            धीरे धीरे समय बीतता गया। निर्मला को आई.सी.यू. से निकाल कर स्पेशल वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया था। प्रतिदिन सुबह शाम एक फिजियोथेरेपिस्ट उनकी एक्सरसाइज़ करवा जाती थी। न्यूट्रीशियन अपने चार्ट के अनुसार भाभी के खाने की खुराक तय करती थी। उनके स्वास्थ्य में बड़ी तेज़ी से सुधार हो रहा था। डॉक्टरों का कहना था कि सब कुछ ठीक रहा तो तीन चार दिनों में भाभी को डिस्चार्ज कर दिया जायेगा। स्पेशल वार्ड में उनके आने के बाद सविता की भूमिका और बढ़ गई। अब उसे अपना अधिक समय अस्पताल में भाभी के पास देना पड़ता था। सोमेश भी अब काफी रिलैक्स महसूस करने लगे थे। जिस दिन भाभी को वार्ड में शिफ़्ट किया गया था उस दिन वे निश्चिंत होकर सोये थे। अधिक समय सविता के अस्पताल में रहने के कारण कभी कभी खाना सोमेश और रोहित भी बना लिया करते थे। अब उतना अधिक तनाव भी नहीं था। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था अत: सोमेश ने ही सविता और रोहित से चेन्नई के आस पास के पर्यटन स्थलों में घूम आने की सलाह दी और कहा

      “अब तो सब ठीक ही है। अस्पताल में भी अधिक काम नहीं है। डॉक्टर दो दिन बाद डिस्चार्ज़ कर देंगे। कल का दिन खाली है, यहाँ तक आए हैं तो आप लोग चेन्नई के आस पास घूम फिर आइए।” सविता जाना नहीं चाहती थी। उसे निर्मला की चिंता ज़्यादा हो रही थी किंतु सोमेश के जोर देने और सब संभाल लेने का आश्वासन देने पर वह तैयार हो गई।

      अगले दिन रोहित और सविता टूरिस्ट बस से चेन्नई एवं आस पास के स्थलों की सैर के लिए निकल पड़े। दिन भर टूरिस्ट बस में घूमने में निकल गया। विभिन्न स्थलों से वहां की प्रसिद्ध भिन्न भिन्न वस्तुएं खरीदते हुए गोल्डन बीच से सविता ने एक छोटा सा शंख स्मृति के तौर पर खरीद लिया था। इस तरह के टूरिस्ट स्थानों पर सैलानियों को देख कर छोटे छोटे स्थानीय दुकानदार हर वस्तु का मोल अधिक लगाते हैं। अगले दिन सुबह अनीस साफ सफाई करने आया। उसने सविता से पूछा

      “काकी, कल दिन भर नहीं दिखीं, तुम कहीं गई थीं क्या?”

      “हां रे, कल चेन्नई की सैर पर गए थे।” अनीस की नज़र सविता द्वारा लाए हुए छोटे से शंख पर पड़ी। उसने पूछ लिया

      “आपने ये शंख कितने में लिया काकी?”

      “सौ रुपये में”

      “सौ रुपये…?” अनीस ने बड़े आश्चर्य से दोहराया।

      “क्यों?”

      “बहुत मंहगा है काकी। आपको लेना था तो मुझ से बोल देतीं। बीस बीस रुपये में इससे बड़े शंख मरीना बीच में मिलते हैं। मैं ला देता।”

      “अच्छा तू ला सकता है?” सविता ने पूछा। उसने सोचा यह छोटा शंख तो मात्र शो पीस की तरह ही है, यदि अच्छा शंख मिल जाए तो उसे पूजा गृह में रखा जा सकता है। इसे तो बजाना भी कठिन है।

      “काकी, मैं काम निपटा कर दोपहर में ले आउंगा।”

      “ठीक है, तू ये पैसे रख ले।” सविता ने अपने पर्स से सौ रुपये का एक नोट निकाल कर अनीस को दे दिया। उसके पास चिल्लर नहीं थे।

      “देख अनीस, शाम को हमारी ट्रेन है। हम लोग यहां से सात बजे तक निकल जाएंगे, शाम तक तू आ जाना।” अनीस पैसे अपनी जेब में रख कर अपने काम में जुट गया। कुछ देर बाद वह अपना काम समाप्त कर चला गया। दिन भर अति व्यस्तता में बीता। अस्पताल में निर्मला के डिस्चार्ज की औपचारिकताएं पूरी करने में ही काफी समय निकल गया। शाम को चार बजे सविता रोहित और सोमेश वापस आ पाये थे। निर्मला को बड़ी सावधानी से बिस्तर पर लिटाकर बाकी लोग भी थोड़ी देर आराम करने लगे। धीरे धीरे समय बीत रहा था। कुछ देर पश्चात सविता और सोमेश वापसी के लिए सामान आदि की पैकिंग करने लगे। एक मरीज के साथ इतने दिन तक का सामान बहुत अधिक हो गया था अत: सोमेश ने सात बजे दो कैब भेजने के लिए फोन कर दिया था। रोहित ने चाय आदि का ऑर्डर दे दिया। अहमद अली ने एक व्यक्ति को चाय नाश्ता लेकर भेज दिया था। उसे देखकर सविता को अनीस की याद आई। वह शंख लेकर आने वाला था। उसने उस व्यक्ति से अनीस के विषय में पूछा तो उसने बताया कि वह दोपहर से छुट्टी लेकर गया है और अभी तक नहीं आया है। सविता ने घड़ी की ओर देखा। साढ़े छ: बज रहे थे। बस थोड़ी देर में ही उन्हें स्टेशन के लिए निकलना था। उसे थोड़ी चिंता होने लगी। सोमेश ने उसे चिंतित देख कर कारण पूछा तो उसने अनीस से शंख मंगवाने और उसे सौ रुपये देने की बात बतला दी। रोहित ने सुना तो उसने थोड़ी नाराज़गी दिखाते हुए कहा

      “तुम्हें तो हर किसी पर आंख बंद कर विश्वास करने की आदत है। तुम नहीं जानतीं ऐसे लोगों को। तुमने बता दिया था, हम लोग सात बजे यहां से चले जायेंगे। देख लेना वह हमारे जाने के बाद ही आयेगा। वह पैसे लेकर चंपत हो गया है।” सविता को रोहित का इस तरह अनीस के विषय में बोलना अच्छा नहीं लगा लेकिन उसे भी अनीस से ऐसी उम्मीद नहीं थी। उसका मन खट्टा हो गया था। जिसे वह अपने बच्चे की तरह स्नेह करने लगी थी वह इस तरह का व्यवहार करेगा, उसका मन नहीं मान रहा था। यदि अनीस को पैसों की आवश्यकता थी तो वह मांग लेता, वह मना थोड़े ही करती। वैसे भी विदाई के समय वह अनीस को कुछ न कुछ दे कर ही जाती किंतु अनीस की इस हरक़त से उसका मन क्रोध से भर उठा। बेमन से वह जाने की तैयारी करती रही।

            स्टेशन जाने के लिए नियत समय पर कैब आ गईं। एक क़ैब में सारा सामान जमाया गया। दूसरी में बड़ी सावधानी से निर्मला को बैठाकर सोमेश और सविता बैठ गए। सामान वाली क़ैब में रोहित बैठ गए। रोहित वाली क़ैब पहले निकली। दूसरी क़ैब ने चलना आरम्भ किया ही था कि सविता को लगा जैसे पीछे से कोई आवाज़ दे रहा है। उसने मुड़ कर देखा। पीछे दौड़ता हांफता एक बच्चा हाथ हिला कर उन्हें रुकने का संकेत कर रहा है। सविता ने ड्राइवर से रुकने को कहा। बच्चा पास आया तो सविता ने उसे पहचाना।

      “अरे अनीस तू…? अनीस बुरी तरह हांफ रहा था। उसके एक हाथ में शंख और दूसरे हाथ में अस्सी रुपये चिल्लर थे। उसने शंख और चिल्लर पैसे सविता की ओर बढ़ाते हुए कहा

      “काकी… बड़ी मुश्क़िल से बीस रुपये में मिल पाया है। दोपहर से घूम रहा था। कोई भी तीस चालीस से कम में देने को राजी नहीं हो रहा था। शाम को दुकान समेटते समय एक दुकान वाले ने बीस रुपये में दिया है।”

            अनीस की आंखों की मासूमियत और उसके भोलेपन पर न जाने क्यों सविता का मन भर आया। उसने अनीस से पूछा

      “क्यों अनीस क्या हुआ? तू इतन हांफ क्यों रहा है?

      “काकी, बहुत देर हो गई थी। कहीं आप लोग निकल न जाओ, इसलिए दौड़ता हुआ आया हूं न”

      “क्यों… दौड़ता हुआ क्यों आया है?”

      “चल कर आता तो आप लोग जा चुके होते”

      “तो तू मरीना ड्राइव पैदल गया था और वहां से दौड़ कर आ रहा है? कोई ऑटो वॉटो से नहीं आ जा सकता था?” सविता ने अनीस को झिड़कते हुए कहा।

      “ऑटो वाला ज़्यादा पैसे लेता काकी”

      “तो क्या हुआ? मैंने तुझे सौ रुपये तो दिये थे न?”

      “वो तो आपकी अमानत थे काकी। मेरी अम्मी कहती हैं, किसी की अमानत में ख़यानत नहीं करना चाहिये।” अनीस की सच्चाई और उसकी भोली बातें सुन न जाने क्यों सविता के हृदय में उसके प्रति स्नेह का सैलाब उमड़ आया। उसने क़ैब से उतर कर अपने पर्स से सौ रुपये का एक नोट निकाल कर अनीस के हाथ में रखते हुए बड़े लाड़ से उसके सिर पर हाथ फेरा। अनीस ने रुपये लेने से इंकार कर दिया और बोला

      “काकी मैं ये नहीं ले सकता।”

      “क्यों नहीं ले सकता रे?”

      “…” अनीस चुप रहा। वह बस नीचे ज़मीन की ओर देखे जा रहा था। वह बड़ा भावुक लग रहा था। उसके मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे। सविता ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। उसे अनीस की आंखों में एक गहरी उदासी पैठी नज़र आई। वह नहीं जानती थी कि इतने दिनों में ही कैसे वह बच्चा उससे कितना हिल मिल गया था। उसे लगा वह और कुछ कहेगी तो अनीस अपने आंसुओं को नहीं रोक सकेगा। उसने अनीस के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा

      “अरे पगले, तू क्यों इतना उदास होता है? हम लोग फिर आयेंगे। निर्मला काकी को दोबारा चेक अप के लिए लाना पड़ेगा न? हम यहीं ठहरेंगे।” जबरन सौ रुपये का नोट अनीस की जेब में डाल कर वह क़ैब में जा बैठी। उसका भी मन भर आया था। अनीस के निश्छल प्रेम से  वह अभीभूत हो उठी थी। उसने स्वयं को संभाला। सबके सामने वह खुद को कमजोर साबित नहीं करना चाहती थी। वह अनीस की ओर भी देखने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। सोमेश ने घड़ी की ओर देखा फिर ड्राइवर को चलने का आदेश दे दिया। क़ैब हल्के से हिचकोले के साथ चल पड़ी। हिम्मत कर सविता ने पीछे देखा। जिन सूनी फटी फटी आंखों से अनीस उसे जाते हुए देख रहा था वे आंखें सीधे उसके कलेजे को बेधती चली गईं। उनमें उसे रोक लेने का आग्रह था, एक प्रार्थना थी, अपनापन था, बिछुड़ने का दर्द था।

      “अरे, और कितनी देर लगेगी भई तुम्हें? पूजा का मुहूर्त निकला जा रहा है। ज़रा जल्दी करो।” रोहित की आवाज़ सुन कर उसकी तंद्रा भंग हुई। अपनी आंखों से बरबस ढलक आये आंसुओं को झट से उसने अपने आंचल से पोछा और जल्दी जल्दी पूजा की तैयारी में लग गई।

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