दस्तावेज दिखाने में परेशानी किसे ?

दस्तावेज दिखाने में परेशानी किसे ?

चीजें शीशे की तरह साफ हो रही  हैं , दंगाई सन्न है , विपक्ष धीरे-धीरे समझ रहा कि एन डी ए सरकार अपने मेनिफेस्टो के अनुसार आगे बढ़ रही । देश के मुसलमानों के लिए कोई एन आर सी नही है। कोई भी किसी से 1971 से पहले के दस्तावेज नही मांग रहा है। ऐसा कोई क्राइटेरिया ही नही है। जब एन आर सी होगी भी तो कम्युनिटी और सरपंच की गवाही के आधार पर भी नागरिकता रजिस्टर में नाम दर्ज होंगे। न कोई मुसलमान किसी हिन्दू को देश से निकाल सकता है और न कोई हिन्दू किसी मुसलमान को। हम पीढ़ियों से इस मुल्क की मिट्टी में साथ जीते मरते आए हैं। पर अब सोचिए कि इस बीच स्वरा भास्कर, अरुंधति रॉय, शबाना आज़मी, फरहान अख्तर, अनुराग कश्यप ओवैसी राहुल और प्रियंका गांधी जैसे खाये-पिए-अघाये लोगों ने क्या किया? इस देश के मुसलमानों को जमकर भड़काया। दिहाड़ी की कमाई करने वाले गरीब मुसलमान जिन्हें सी ए ए का सी और एन आर सी का एन नही मालूम था, को उकसा-भड़काकर पत्थरबाजी से लेकर आगजनी की आग में झोंक दिया।  बचा खुचा काम पी डी एफ और पश्चिम बंगाल और कश्मीर से आए ट्रेंड पत्थरबाज चचा जान कर गए । मासूम और इनोसेंट पत्थरबाजो के खिलाफ वसूली का केस और  उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो रही है। वे अदालतों के चक्कर लगाएंगे। गवाहियां तलाशेंगे, घर के बर्तन बेचकर वकील ढूंढेंगे। उधर वामपमथियों और बॉलीवुड के मठाधीशों का ये “फाइव स्टार गैंग” ए सी बंगलों में बैठा है। बड़ी गाड़ियों से घूम रहा है। महंगे विदेशी चश्मे लगाकर मीडिया को बाइट्स दे रहा है और फिर वही बाइट्स अपने “खास” वाट्सएप्प ग्रुप में शेयर कर चेलों-चपाटों से पूछ रहा है- “गुरु, कैसी रही आज की बाइट, माहौल ठीक बना न!”

इनमे से कोई भी खाया-पिया-अघाया सितारा उन गरीब मुसलमानों की जमानतें कराने नही आएगा। ये उस ओर पलटकर देखेंगे भी नही। लिख लीजिए इस बात को। इन्हें बस ट्विटर पर वामपंथ का ज़हर उलीचना है और ज़िंदगी मे ऐश करनी है। मोदी का विरोध करना या समर्थन करना, हर व्यक्ति की अपनी सोच है। ये लोकतंत्र है। सबको आज़ादी है। जितना ज़रूरी पक्ष है उतना ही विपक्ष भी। पर मोदी के विरोध के नाम पर गरीबों का इस्तेमाल कर अपनी दुकान चमकाने वाले फ्रॉड वामपमथियों की साज़िश से ज़रूर बचिए। वामपंथ इतिहास की सबसे फ्रॉड विचारधारा है। ये वामपंथी जब भी ले जाएंगे, खाई में ही ले जाएंगे।

आज के हालात देखकर बचपन का एक किस्सा याद आ गया। हमारे घर के पास एक नाला था और वहाँ कुछ लोग केकड़े पकड़ने आया करते थे, चूँकि उस वक़्त माँओं को इतनी चिंता नहीं होती थी कि उनके बच्चे कहाँ भटक रहे हैं तो हम कुछ दोस्त भी उन केकड़े पकड़ने वालों के साथ नाले में उनके पीछे पीछे घूमा करते थे, बल्कि उन लोगों से दोस्ती हो गई थी। उनको केकड़े पकड़ते देखने में हमें बड़ा मज़ा आता था। केकड़े पकड़ने की उनकी तरक़ीब भी बड़ी अजीबोगरीब थी, वो पहले केकड़ों के बिलों की पहचान करते, फिर प्लास्टिक की थैली हाथ में पहनकर बिल में हाथ डालते। लेकिन कभी कभी केकड़ों के बिल इतने गहरे होते थे कि उनका हाथ वहाँ तक पहुँच नहीं पाता था। फिर वो पानी में गोबर मिलाते और उस पानी को बिल में डाल देते, बस फिर क्या कभी एक, कभी दो और कभी कभी तो 5-10 केकड़े बाहर निकल आते और वो तुरंत उनको लपक लेते, सबसे पहले उसके डंक को तोड़ देते फिर बाक़ी अंगों को तोड़ते।

कुछ केकड़े इसी तरह बहुत गहरे बिलों में छिपे हुए हैं जहाँ हाथ डालना संभव नहीं है तो गोबर मिला पानी डाला जा रहा है, केकड़े बाहर आते जा रहे हैं, अब डंक भी तोड़े जाएंगे और बाक़ी अंग भी।कुछ लोगों को फिर भी तकलीफ़ है कि जब केकड़े बाहर आ ही रहे हैं तो इनको पकड़कर तुरंत डंक तोड़कर, इनको पकाया क्यों नहीं जा रहा? तो भाई केकडों की पहचान हो रही है ये क्या कम है वर्ना आजतक तो ये रेशम के कीड़े बनकर ही मजे ले रहे थे। आगे आगे देखिए अभी तीन सौ सत्तर , ट्रिपल तलाक और राम मंदिर की मिर्ची बड़ी तेज लगी है इन्हे ,इतनी जल्दी इन दंगाइयों को राहत नहीं मिलने से रही । अभी मोदी जी के तरकश में कई तीर बाकी है ।

_____ पंकज कुमार मिश्रा जौनपुरी 8808113709

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