कोरोना भगवान की जय ?

कोरोना भगवान की जय ?

  • यशपाल सिंह

प्राचीन कथा है कि एक था हिरणाकश्यप। शक्तिशाली था । राजा था। अमर होना चाहता था, जैसे कोई भी राजा होना चाहेगा । ईश्वर की स्तुति की। ईश्वर प्रकट हुए मगर उन्होंने कहा कि अमरता को छोड़कर कुछ भी मांग लो। लेकिन वह तो अमर होना चाहता था। इसलिए उसने अपने मरने की विस्तृत शर्तें रख दी  जैसे कि ना वह घर से बाहर मरे ना भीतर, ना आदमी से ना जानवर से, ना किसी अस्त्र-शस्त्र से, न जमीन पर ना आसमान में, ना दिन में ना रात में आदि, आदि । उसको लगा कि इन शर्तों का पूरा होना असंभव है । ना नौ मन तेल होगा ना राधा नाचेगी । इसलिए उसकी मृत्यु भी असंभव हो जाएगी। शर्तें मान ली गई और बाद में उसको मारने के लिए भगवान को नरसिंह अवतार लेना पड़ा यानी आधा मनुष्य आधा शेर ।

मैं सोचता हूं अगर हिरणाकश्यप 21वीं सदी की दिल्ली में रह रहा होता तो उसे इतनी लंबी लिस्ट बनाने की जरूरत ना पड़ती। वह सीधे-सीधे भगवान से कह देता कि जिस दिन दिल्ली में यमुना का जल साफ हो जाएगा, उस दिन उसकी मृत्यु हो सकेगी और तथास्तु के साथ वह निश्चिंत हो जाता। उसे पूरा यकीन होता यह सोचकर कि जिस नदी को करोड़ों के बजट साफ नहीं कर सके, अनगिनत सरकारें साफ नहीं कर सकी, उसका भगवान भी क्या कर लेंगे। वह तो यथावत रहेगी । उद्योगों का जहर, घरों का मलबा, लोगों की लाश इसमें अनवरत बहेगी। लेकिन उसे क्या पता  कि भगवान तो आखिर भगवान है । वह अगर नरसिंह बन सकते हैं तो एक वायरस का अवतार भी तो ले सकते हैं, एक कोरोना वायरस, जिसने यमुना को साफ किया, हवा को साफ किया, पक्षियों को घर दिया, शांति को स्वर दिया।

अरे यह क्या विचार आ गया ।  क्या कहीं यह सचमुच भगवान का अवतार तो नहीं है जो पृथ्वी पर पाप बढ़ने की स्थिति में आता है । अब धरती पर कोई पाप की कमी तो है नहीं, और ना दिल्ली मैं शक्तिशाली, अमरता की कामना रखने वाले राजाओं की। इसलिए ऐसा सोचना पूर्णतः दिशाहीन चिंतन भी नहीं कहा जा सकता । कुछ ज्ञानी लोग यह व्याख्या भी देते ही हैं कि विष्णु के अवतार, मछली से लेकर मनुष्य रूप तक, मनुष्य के अनुवांशिक विकास की कहानी  कहते हैं । तो क्या हम अब वापस अनुवांशिक विकास की पहली पायदान पर पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं ।

मनुष्य जाति के खात्मे के इंतजाम तो हमने पहले से ही काफी कर रखे थे। और आजकल तो इंसान वैसे भी नाम को ही जिंदा है। कहते थे मनुष्य सामाजिक प्राणी है। यद्यपि सामाजिक दूरियां तो पहले भी कम नहीं थी पर अब तो मनुष्य केवल डिजिटल प्राणी बनकर रह गया है । बाजार में जाता है तो मुंह छुपाकर और बिना किसी से बात किए, ऐसे जल्दी-जल्दी वापस लौटता है जैसे खरीदकर नहीं सामान चोरी करके ला रहा हो। रास्ते में कोई कितना ही परिचित मिल जाए, बस दूर से ही दुआ सलाम होती है। दूसरों की तो बात छोड़िए, खुद दायां हाथ बाएं हाथ को छूने से डरता है, अपना ही हाथ अपने मुंह को छूने से डरता है, अपने कपड़ों को छूने से डरता है । अब यह जीना भी कोई जीना है । हो न हो नई सृष्टि की शुरुआत का समय आ ही गया हो और उस सृष्टि में जब हम आनुवंशिक विकास की पहली पायदान पर होंगे तो निश्चित रूप से वायरस ही भगवान के प्रथम अवतार के लिए सबसे मजबूत दावेदार होगा। तो बोलें कोरोना भगवान की जय ?

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