पेड़ की व्यथा

पेड़ की व्यथा

दोस्तों नमस्कार, पहचाना मुझे? पहले थोड़ा मुश्किल होता मुझे पहचान पाना लेक़िन इस फोटो के साथ पहचान ही लिया होगा। हाँ कल आपमें से बहुत से आए भी थे, मैं दिखा भी होऊंगा आप सब को लेकिन आपने शायद ध्यान न दिया हो,

ओर ध्यान देते भी कैसे, इतना आसान थोड़ी ही था मुझे देख पाना। कल तो आप सब की नजरें भी उस रंग बिरंगे पुतले पर टिकी होंगी जिसे लोग रावण कह रहे थे। कल सभी का ध्यान उसी पर था, आपका ही नहीं पूरे नगर प्रशासन का ध्यान केवल उसी पुतले पर ही था, क्योंकि कल उसी का दिन था न।

असत्य पर सत्य की जीत का दिन…

ज्यादा लम्बी बात चीत न करते हुए मैं उस बात पर आता हूँ, जो आपको बताना चाह रहा हूँ।

बात नवमी की रात की है। रोज की तरह ही शाम होते ही मेरे आस पास कुछ लोगों की चहल कदमी थी। महिलाएं झाँकी देख कर निकल रहीं थी। कुछ व्यक्ति अपने दैनिक कार्यों को मेरे आस पास आकर कर रहे थे, तो कुछ कर्मचारी मेरे बगल में ही सफाई के काम में लगे हुए थे। कुछ ग्राउंड पर चूरि डालने मैं व्यस्त थे। ये हलचल देख कर मैं अब तक समझ चुका था कि ये हर साल की तरह ही रावण जलाने की तैयारी चल रही है।

ये सोच कर मैं अंदर से सिहर गया था क्योंकि जब से रावण के पुतले को यहाँ जलाया जाने लगा तब से, मैं भी कहाँ पूरे तरीके से सुरक्षित रहता हूँ। उस रावण से निकलने वाली आग से मैं भी तो थोड़ा बहुत झुलस ही जाता हूँ। खैर फिर भी खुद को थोड़ा बहुत सुरक्षित रखने में कामयाब हो जाता था, क्योकि रावण और मेरे मैं दूरी रहती थी। शाम होते होते वह समय भी आ गया, जिसे देख कर मेरी धड़कनों ने भी सामान्य से तेज गति मैं धड़कना शुरू कर दिया था। इस बार मेरा डर थोड़ा ज्यादा और जायज भी था क्योंकि जिस जगह हमेशा उस पुतले को खड़ा कर जलाया जाता था, अब उस जगह पर नगर पालिका ने अपनी दुकानों का निर्माण करा दिया। मैं डर रहा था कि कहीं इस बार इस पुतले को मेरे सहारे ही तो नहीं खड़ा किया जाएगा या कहीं इस बार ये मेरे नजदीक ही तो नहीं रहेगा। और हुआ भी वही जिस बात से मैं डर रहा था। पुतला इस बार पूरे ग्राउंड को छोड़ कर मेरे बिलकुल नजदीक खड़ा कर दिया जाने लगा। मैं बेचारा करता भी क्या बस खुद को कोसे जा रहा था, और याद कर रहा था सरकार के पर्यावरण और पेड़ बचाने के उन वादों को जो आज हर अखबार के पहले पेज की शोभा बढ़ाते नजर आते है। मगर मैं कर भी क्या सकता था, यही सोच कर अपनी स्तिथि पर आँसू निकाले जा रहा था जो मेरे अलावा किसी और को नहीं दिख रहे थे , शायद बासौदा की नगरपालिका प्रशासन मेरी स्थिति को समझ पाता मेरे उन आसुंओं को देख पाता  लेक़िन ऐसा नहीं हुआ किसी ने मेरे बारे में एक बार ही शायद ही है सोचा हो ।

खैर यही सोचते सोचते समय निकलता गया और घड़ी की टिक टिक के साथ मेरी धड़कने भी बढ़ती जा रहीं थी

हर बार की तरह ही कुछ बच्चे सुबह से ही उस रावण को देखने आने लगे थे दोपहर होते होते यह बच्चे भीड़ के रूप मे बढ़ने लगे

और मेरी धड़कने उसी भीड़ की तरह ही बढ़ती जा रहीं थी । शाम हुई लोग हजारों की संख्या में मेरे पास खड़े उस पुतले को निहार रहे थे अपने मोबाइल में उसकी फ़ोटो निकाल रहे थे और मैं बेबस सा उस रावण के साथ न जाने कितने ही लोगों के मोबाइल मैं उस फोटू का हिस्सा बन रहा था बो हिस्सा जिस पर शायद ही है किसी का ध्यान गया हो ,

मैं यहाँ मारे डर के अपनी व्यथा समझाने उस भीड़ में किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढ रहा था जो मेरा हाल समझ सके।

 लेक़िन अफ़सोस उस हजारों की भीड़ में भी कोई एक अकेला भी व्यक्ति मेरी स्थिती को नही समझ पाया ।

वहाँ एक तरफ खूब हल्ला मचा हुआ था रंगा रंग नृत्य चल रहे थे और यहाँ रावण को जलाने की तैयारी ,

वहाँ लोग राम बारात के आने का इंतजार बेसब्री से कर रहे थे और यहाँ मेरी हालत उस जेल के कैदी की तरह हो रही थी जिसे अपनी फांसी देकर मौत के हवाले करने की सजा तो सुना दी जाती है लेक़िन बो व्यक्ति मरने से पहले हर एक सेकेंड मर रहा होता है  अब से कुछ देर बाद रावण के साथ आग रूपी हवाले मुझे भी किया जाना था , और हुआ भी वही राम बारात आई पूजन अर्चन हुई और भगवान राम बढ़ कर चले आ रहे थे उस रावण को आग के हवाले करने जो कि मेरे बिलकुल पास ही था  ।

मैं चिल्लाते हुए ये कहने की कोशिस कर रहा था कि साहब माना कि दशहरा है रावण जलता है मगर इस रावण के साथ मुझे भी आप लोग आग के हवाले कर रहे हो  “मेरा क्या क़सूर”

मगर अफसोस  रामलीला मैदान में लाउडस्पीकर पर बज रहे गानों के शोर में मेरी पुकार कोई न सुन सका  आग से झुलसते हुए जब वेदना से मैंने चीत्कार करना शुरू किया तो रावण दहन की खुशी में चल रही आतिशबाजी ने उसे भी दबा दिया , ईश्वर की कृपा से मैं बच तो गया लेक़िन कितने दिन इस जगह पर खड़ा रहूं मुझे खुद नहीं पता !

मैं रहूँ न रहूं उससे किसी को फर्क नहीं पड़ेगा ये सरकारें हैं साहब जो एक तरफ तो पर्यावरण और प्रकृति को बचाने की बातें करती हैं वहीं दूसरी तरफ मुंबई के आरे के हजारों पेड़ो को विकास के नाम पर काट डालती है ,

फिर मैं कहाँ मेरी क्या औकात जो गंजबासौदा नगरपालिका की नजर मैं आ पाता और आया भी होऊंगा तो किसी को फर्क क्या पड़ता है मेरे एक पेड़ के होने न होने से ।

फिर भी मैं बार बार और हर बार सबसे एक सवाल पूछ रहा हूँ कि रावण को तो जलाओ पर मेरा क्या कसूर जो मुझे हर बार उसके साथ तिल तिल कर जलना पड़ता है साहब

 “मेरा क्या कसूर “

– अंकित शर्मा

Special Article