बच्चों तुम तक़दीर हो कल के हिंदुस्तान की : कविता मल्होत्रा

बच्चों तुम तक़दीर हो कल के हिंदुस्तान की : कविता मल्होत्रा

इस बार गर्मी की छुट्टियों से पहले ही स्कूल बँद हो गए, और बढ़ी हुई छुट्टियों के साथ ही बच्चों का नानी-दादी के घर पर जाना बँद हो गया, दोस्तों  के साथ बाहर खेलना-कूदना सब बँद हो गया।असमँजस की स्थिति में सभी बच्चे व्याकुल होकर लॉकडाऊन के ख़त्म होने का इँतज़ार कर रहे हैं।

पूछे मीरा होकर व्याकुल

कब बसेगा फिर से गोकुल

आजकल कोरोना वायरस के कारण हर कोई लॉकडाऊन में रहने को मजबूर है।हर देश की युवा पीढ़ी इँटरनेट के माध्यम से अपनी पढ़ाई, अपना मनोरँजन, अपने संबंध और अपनी तमाम इच्छाओं को पूरा करने में लगभग सक्षम है।

सब गृहणियाँ अपनी सेवाओं से छोटों बडों सभी का ध्यान रख रही हैं और कामकाजी मम्मियाँ वर्क फ़्रॉम होम के साथ साथ बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई का भी मोर्चा बखूबी सँभाले हुए हैं।

उन सभी भाइयों और पापा लोगों को सलाम हैं जिन्होंने अपने ऊपर सबसे ज़्यादा प्रेशर झेला है, जिसमें घर खर्च की व्यवस्था के साथ-साथ काम न रहने की गंभीर स्थिति का मानसिक अवसाद भी है। लेकिन इस सबके बावजूद सबने

घर के सभी कामों में हाथ बंटा कर अपने परिवार की मज़बूत रीढ़ का परिचय दिया है।

इन सब से ज़्यादा इस महामारी की जो मार किसी ने झेली है, वो हैं मासूम बच्चे, जिन पर अचानक से ऑनलाइन शिक्षा का दबाव डाला गया, और दोस्तों से दूर रह कर बँद चारदीवारी में रहने की सज़ा दी गई।

सज़ा इसलिए क्यूँकि अक्सर प्रेशर झेलते मम्मी पापा के झगड़ों से अँजान बच्चे आजकल साक्षात महाभारत देख रहे हैं।उस पर पूरा दिन की टोका- टाकी , ये मत करो वो मत करो, टी वी मत देखो, बाहर नहीं जाना है, दोस्तों से नहीं मिलना है, पढ़ाई करो, वक्त बर्बाद मत करो, इत्यादि, बहुत से एैसे कारण हैं जिनकी वजह से बच्चे डिप्रेशन में आ रहे हैं, उनके बिहेवियर बदल रहे हैं, क्यूँकि वो कुछ समझ नहीं पा रहे हैं कि अचानक ये बदलाव कैसा है क्यूँ है और इस से कैसे निपटा जाए।

इस त्रासदी की सबसे अधिक मार झेली है गाँवों से शहरों में कमाने आए मज़दूर वर्ग ने, जिन्होंने सुरक्षा के लिए पैदल ही हज़ारों मीलों की दूरी को नाप लिया, और देश की समूची अर्थव्यवस्था की पोल खोल दी।लाखों जानें दाँव पर लगीं फिर भी महामारी का प्रकोप कम नहीं हुआ।

एक विकासशील देश की वास्तविकता शायद कभी किसी के सामने न आ पाती, यदि ये महामारी का विषाणु समूचे विश्व को सँक्रमित न करता।

दरअसल आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत इस बात की है कि मानव जाति परस्पर ईर्ष्या-द्वेष को भुला कर निःस्वार्थ प्रेम की पींगें बढ़ाए और मानवता के उत्थान में अपना योगदान दे।

सब प्रकार के वर्ग भेद मिट जाएँ

हर तरफ़ महकती खुशहाली हो

हो विनम्रता से, हर रूह का श्रृँगार

हर कोई समूचे चमन का माली हो

पाषाणी प्रतिमाओं का न हो पूजन

सब दिलों में,खुशी की हरियाली हो

शैशव से दूर ही रखा जाए महाभारत

नम्रता से झुकी,हर-जन की डाली हो

इसमें तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि आज का बचपन कल के भारत की एैसी  मज़बूत बुनियाद बन कर उभरेगा, जिसने महामारी की दुर्दशा का दँश झेलकर खुद को संक्रमण मुक्त करते हुए, एक लीडर की भाँति हर चुनौती का सामना किया है।

लूडो,क़ैरम,साँप-सीढ़ी के

मोहपाश से निकल कर बाहर

जिस बचपन ने गली के नुक्कड़ों के

दुःख-दर्द साझे किए

माँ की लोरी, नानी-दादी के स्नेह की डोरी, जिसने त्यागी

समाज के बुज़ुर्गों की देखरेख सँभालकर,दबाव आधे किए

लौट आएँगे बन विवेकानंद,फिर से जन्मेंगे अब्दुल कलाम

हर रूह की राधा नाचेगी तब, बसेगा फिर से गोकुल धाम

Special Article कविता और कहानी