लॉक डाउन में दिव्य ज्ञान

लॉक डाउन में दिव्य ज्ञान

कोई न कोई ज़ुर्म तो जरूर था ही,जिसमें सभी शामिल थे,तभी तो हर इन्सान चेहरा छुपाए घूम रहा है” सच ऐसे हालात में घर रहना ही बचाव है, अंधेरे में हाथ थामने का समय है और सुनसान में

गुनगुनाने का है, एक दूसरे को धीरज बंधाने का है पर इस दौरान पति पत्नी,बच्चे, छोटे बड़े,सब

को दिव्य,भव्य व अनोखी अनुभूतियां भी हुई है। पत्नियां अब सुबह शाम पति का चेहरा निहारते निहारते ऊब  ही गईं हैं, अजीब परिस्थितियां हो गईं हैं,न नाई,न बाई, न कमाई, न घुमाई, न मिठाई,न शहनाई, दिन भर दिखे लुगाई!पर क्या करें, वक्त तकलीफ का जरूर है,पर मुस्कराने से कटेगा।

पति के राशिफल में लिखा था-‘ऊंचाइयां छूने का योग है’-“सुबह से पंखे

व जाले साफ कर रहे हैं”

सब राशिफल गड़बड़ा गये है-सुखद यात्रा का योग था,वो अस्पताल में

पड़े हैं, जिनका हल्दी लगने का योग था वो साबुन व सेनेटाइजर का

इस्तेमाल कर रहे हैं और  जो अमुक शादी में नाचने

की तैयारियां कर रहे थे, वो घर में झाड़ू पोंछा लगा रहे हैं।

अभी कल ही की बात है

जो बाई लॉकडाउन से पहले घर आती थी,उसे श्री मती जी ने कुछ मदद

देने के लिये बुलाया था,

उस को कह रही थी-‘देख

निम्मो जब बाद में काम करने आएगी न!घर बिल्कुल ऐसे ही साफ

करना,फर्श देख कैसे चमक रहा है’ इस पर निम्मो बोली -“मेम साहब बुरा मत मानना, मर्द का हाथ तो आखिर मर्द का ही होता है।”अन्दर ड्राईंग रूम में बैठा मैं सोच रहा था इस स्तुति गान पर क्या करूँ-शरमाऊं या

गर्व का एहसास करूँ।

सच तो यह है कि महिलाएँ जितना प्रेम से कामवाली से बोलतीं हैं, उससे आधे प्रेम से पतियों से बात करें तो पति चार  गुणा ज्यादा काम कर दे।

भारतीय पत्नी के भी क्या

कहने,अपने पति को ही अपना सब कुछ मानती हैं

बस कहना ही नहीं मानतीं। कोरोना से लड़ना है, घबराना नहीं है,बीवी से घबराना है, लड़ना नहीं है।

अभी परसों ही श्री मती जी शाम को बालकनी में बैठी बोलीं-अब तुम किसी काम के नहीं रहे,

मेरे पूछने पर बोलीं-पहले

आपका डर दिखा कर बच्चों को डांट दिया करती थी-“शाम को पापा को आने दे तो बताऊंगी ” अब तो तुम्हारे घर बैठे  

बैठे वो डर भी बच्चों के दिल से निकल गया।

इस लॉकडाउन में तो हालात इतने नाज़ुक हो

गये,मुझे बाज़ार से शेव कराने की आदत है,बाल

भी नहीं कटे,परसों देर शाम को पिछली गली की

रानो आ धमकी,बोलीं- ‘मैनें सुना है, तुम्हारे घर कोई बाबा आये हैं, कोरोना वाला धागा देते हैं’ पत्नी जी को बोलना   ही पड़ा कि कोई बाबा

वाबा नहीं,ये तो  मेरे पति हैं,दो महीने से न तो बाल   ही कटे,न शेव करा पाये, तो ये हालत हो गई है।

बच्चे भी अब बोर होने लगे हैं,उन्हें मॉम से अब मैम ज्यादा अच्छी लगने लगी है,पर क्या करें बेचारे! स्कूल बंद है।बड़े बुजुर्गों को भी नित नये दिव्य ज्ञान की अनुभूति  हो रही है कि अब उनकी

अनवरत उपस्थिति ही सबको खलने लगी है,उन

के अब एम डी (मैनेजिंग डायरेक्टर)बने रहने के दिन नहीं, अब एम डी (मूक दर्शक) बनने के दिन है। नई पीढ़ी को सही 

बात भी टोका टाकी लगती है।

सास बहू के रिश्ते भी पहले की तरह सहज नहीं रहे।ऑफिस जाने वाली

बहु घर, सास भी घर।दोनों ही एक दूसरे पर हावी होना चाहती हैं।बहु की ये हालत कि वह काम

करे तो सांस फूल जाती है, न करे तो सास फूल जाती है।कहीं कहीं इस

अवसर के लाभ से सास

बहु दोंनो के रिश्ते मधुर व

प्रगाढ़ भी हुए हैं,यही तो

परिवार का वास्तविक सौंदर्य हैं।

कुछ पति तो इस लॉक डाउन में समय की नजाकत को समझते हुए 

पाक कला,झाड़ू पोंछा

लगाने,बर्तन मांजने में इतने प्रवीण हो गए हैं, कि पत्नियों को बहुत ज्यादा

घबराहट होने लगी है कि लॉकडाउन खुलने के बाद

कैसे काम चलेगा?

और कहीं आलम तो ये

भी है, पत्नियों को पति से काम कराने में हर तरह से

खूब मशक्कत करनी पड़ रही है।सामाजिक दूरी का

पालन करते हुए रसोई के

पारम्परिक हथियारों का

इस्तेमाल भी करना पड़ रहा है। सोना तप तप कर

कुन्दन बन रहा है।वर्क ऐट होम,वर्क इन होम हो गया।बेचारे पति की तो हालत उस बहू जैसी हो 

जिसके सिर पर हर समय

सास सवार रहती है कि

आटा भी गूँथवाये  साथ में कहे भी आटा गूंथती है

तो हिलती क्यों है!इन बेचारे कामकाजी पतियों की तो विडम्बना ये भी है 

कि काम करने है, पर मेन

गेट,दरवाजे बंद करके कहीं बाहर पत्नी जी की

किसी पड़ोसन को भनक न लग जाये आखिर सामाजिक प्रतिष्ठा को भी

बचाये रखना है!

अभी परसों शाम की ही 

बात है,मैं थक हार कर 

लेटा हुआ था, मुझे  गहरी नींद में समझ पत्नी संध्या

पूजा करते हुए आरती के बाद प्रभु से प्रार्थना कर रहीं थी-‘हे दाता आप बहुत दयालू हो,सदा आपकी कृपा बनी रहे,हे

प्रभू अगले जन्म भी यही

पति मुझे मिले, बस यही विनती है, इसे स्वीकार करें’ मेरी तो यह सुन बांछे ही खिल गईं,मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ,मुझ

से रहा ही नही गया, मैं तो

नींद से जगा और पत्नी जी को अपने पास बुलाया,मैंने आखिरी बात सुन ली है, ये क्या बात!

तीस साल गुजर गये यह

सुनते सुनते – मेरे तो कर्म ही फूट गये तुमसे शादी कर के,मैं तो उस घड़ी को

रो रही हूं, जब हाँ भर बैठी, न जाने कब छुटकारा होगा,अब यह क्या?अगले जन्म फिर मेरे लिये कामना! पत्नी जी मुस्कराते हुए बोलीं-

“पिछले तीस साल खूब 

ठोक पीट के ठीक किया

जैसे तैसे अपने लायक बनाया और लॉकडाउन में पूरा समय लगा कर

तुम्हारा कायाकल्प ही कर दिया,अब मैं अगले जन्म एक नये इन्सान पर

दोबारा से इतनी मेहनत क्यों करूँ?”

अब आप ही बताओ मेरे

बस में क्या है?ऊपर भी

तो सुनवाई इन्हीं की ही

होनी है,चलो तैयार करते हैं,अपने को अगले सफर के लिये!

-राजकुमार अरोड़ा गाइड

कवि,लेखक व स्वतंत्र पत्रकार

सेक्टर 2  बहादुरगढ़(हरि०)

Special Article कविता और कहानी