हमारा जीवन हमारे कर्मों की आधारशिला है

This is the Universal  Truth.
यह एक सार्वभौमिक सत्य है हम जो ब्रह्मांड को देते हैं वही लौटकर हमारे पास आता हैl हम जो बोते हैं हमें वहीं काटना पड़ता है lआज की इन परिस्थितियों में संत कबीर के दोहे एकदम सटीक प्रतीत हो रहे हैं …..   “करता था सो क्यों किया अब कर क्यों पछताए बोया पेड़ बबूल का आम कहां से खाए”   हमारी धरती संत महात्माओं, ऋषि-मुनियों ,और तपस्वियों की धरती थी lभारत देश को हमारे पूर्वजों ने संस्कारों की धरती पर खड़ा किया थाl संस्कारों की जड़ें इतनी गहरी थी कि उसको हिला पाना भी संभव नहीं था lमगर धीरे-धीरे पढ़ लिख कर ऊंचाइयों को छूने की चाह इतनी अधिक बढ़ गई, इंसान का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना और सफलता के मुकाम हासिल करना मात्र रह गयाl और धीरे-धीरे लोग अपना देश छोड़कर विदेशों में जाकर बसने लगे lधन दौलत हमारी प्राथमिकता बन गई, और रिश्ते दोयम दर्जे पर पहुंच गए l रिश्ते खत्म होने लगे तो संस्कार कहां जीवित रह पाते lहमारे संस्कार हमारे सुरक्षा कवच थे lसंस्कारों के मिटते ही हमारा जीवन भी काफी असुरक्षित हो गयाl हमारे पूर्वजों के पास लंबी आयु और सुरक्षित जीवन का वरदान था ,जो आज की युवा पीढ़ी के पास नहीं है lआज पूरी दुनिया जिस संकट और महामारी से गुजर रही है, उसके गर्भ में बहुत गहरा रहस्य छुपा हुआ है lहमारा पूरा जीवन हमारे कर्मों कीआधारशिला हैंl हमारे शास्त्रानुसार  जन्म लेते ही हमारा जीवन 3 ऋणों से उक्त हो जाता है lजब तक मनुष्य इन 3 ऋणों से मुक्त नहीं हो जाता वह सुखी नहीं रह पाता यह 3 ऋण है…… 1)    माता-पिता का ऋण 2)   गुरुजनों का ऋण 3)   देव ऋण   माता-पिता का ऋण तो बुढ़ापे में उनकी सेवा करके ही उतारा जा सकता हैl मगर आज की संतान को माता-पिता से कोई सरोकार ही नहीं रहताl संयुक्त परिवार का चलन पूरी तरह से खत्म हो चुका हैl एकल परिवार के चलते बच्चों को माता-पिता बोझ प्रतीत होते हैंl धन-संपत्ति जमीन जायदाद की बात हो तो बच्चे उस पर अपना अधिकार समझते हैं और उनकी प्रॉपर्टी लेकर उन्हें वृद्धाश्रम भेज देते हैं lअब बुढ़ापे की लाठी यानी उनका पुत्र तो उनसे दूर हो जाता हैl साथ ही उनके बुढ़ापे का सहारा यानी उनकी दौलत भी उनसे छिन जाती हैl एक कहावत के अनुसार बेटा मां के दूध के कर्ज से ही मुक्त नहीं हो सकता, उस पर पिता का कर्ज भी उसके ऊपर चढ़ जाता हैl अब संतान जब माता-पिता के कर्ज का बोझ लेकर उस पर अपनी खुशियों के महल खड़े करती रहेगी ऐसे महल तो धराशाई होंगे हीl विदेशों में तो शुरू से ही यह चलन है कि माता-पिता बच्चों से अलग रहते हैंl जब तक उनमें अपनी देखभाल करने की क्षमता होती है, तब तक वह कर लेते हैं और फिर ओल्ड एज होम में जाकर रहने लगते हैंl मगर उनमें सबसे बड़ी समझदारी यह होती है कि वह अपनी धन दौलत जायदाद जीवित रहते हुए अपने बच्चों के नाम नहीं करतेl इसलिए बुढ़ापे में उनकी दौलत का सहारा तो उनके पास रहता ही हैl वैसे विदेशों में सरकार ही बुजुर्गों का खर्चा उठाती है lमगर बुढ़ापे में इंसान को जिस भावनात्मक सहारे, प्रेम ,अपनत्व और देखभाल की जरूरत होती है वह उन्हें संतान से नहीं मिलताl हमारे शास्त्रों में माता पिता को देवताओं और गुरुजनों से भी ऊपर स्थान दिया गया हैl इसलिए जो संतान माता पिता की सेवा कर उनके ऋण से उऋण हो जाती है तो गुरुजनों और देव ऋण से भी उसे काफी हद तक मुक्ति मिल जाती हैंl शिक्षा विद्या का प्रचार प्रसार कर के भी गुरु ऋण से मुक्ति पाई जा सकती हैl विद्या दान निमित्त धन दान करके भी इस ऋण से मुक्ति पाई जा सकती हैl आज ईश्वर के अवतार के रूप में आध्यात्मिक गुरु मानवीय मूल्यों की स्थापना कर लोगों का मनोबल बढ़ा रहे हैं lआज आध्यात्मिक शक्ति एक ताकत बनकर उभर रही हैl कोरोना महामारी के संकट से उबारने के लिए मेडिटेशन लोगों को मानसिक संबल दे रहे हैंl गुरुदेव श्री श्री रविशंकर जी, शिवानी दीदी, आनंदमूर्ति गुरु मां, सतगुरु व अन्य आध्यात्मिक गुरु मेडिटेशन मंत्रों, प्रार्थना व भजनों के माध्यम से  अपनी पूरी शक्ति लगाकर पूरी दुनिया को इस महामारी से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील है lआज अधिक से अधिक लोगों को इनका अनुसरण करते हुए सात्विक जीवन की ओर उन्मुख हो जाना चाहिएl यह संकल्प ही शायद हमारी ताकत बन सके और हम देव ऋण से भी उऋण हो सकेंगेl   मनुष्य के भीतर देवव्रतीऔर दैत्य वृत्ति दोनों का समावेश होता हैl देववृत्ति जहां इंसान को सदैव अच्छे कार्यों की ओर प्रेरित करती है, वही दैत्य व्रती  उसे पतन मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है lआज दुनिया में दैत्य वृत्ति यानी पाशविकता सारी सीमाएं तोड़ कर अपने चरम पर जा पहुंची है lजहां से रास्ता सिर्फ अंत की ओर ही जाता है lअब इंसान पापों के घड़े भरता ही जायेगा तो  टूटेगा हीl धरती जब पाप से पट जाएगी, तो धरती की माटी उसे कहां तक अपने अंदर समाहित करेगीl आखिरकार उसे भी अपना रुद्र रूप धारण करना पड़ता हैl संत कबीरदास जी के दोहे में माटी फरियाद कर रही है…..   “माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रोंदे मोहे इक दिन ऐसा आएगा मैं  रोज रौदूंगी  तोए”   पाशविक वृत्ति के लोगों ने जो मासूम कलियों को मसल मसल कर धरती मां की कोख में डाल दिया था। जिसकी  चीखें अभी तक धरती मां की कोख में चिंगारी की तरह दबी हुई थी। उसी की  आग से आज पूरी दुनिया जल रही है।                       बच्चे भगवान का रूप होते हैं हमारे देश में जहां कन्याओं की नवदुर्गा में पूजा होती है ।उन्हीं बच्चों के साथ जब दरिंदगी और अमानवीयता का व्यवहार किया गया। उनके मासूम शरीर को नोचा खसोटा  गया। उनकी हत्याएं की गई, उनकी आत्मांए तो न्याय की तलवार लेकर हमारे चारों ओर भटक रहीं थी ।ईश्वर ने भी कई बार न्याय का चाबुक चलाया, मगर इंसान पर तो हवस का भूत सवार था, वह अपने कुकर्मों मे संलग्न रहा। प्रकृति ने ज्वालामुखी, भूकंप ,बाढ़,  भू संखलन और सुनामी जैसी आपदाओं द्वारा इंसान को चेतावनी देने की बहुत कोशिश की मगर इंसान नहीं संभला । दुनिया के सभी देशों में अपराध, हिंसा, आतंकवाद ,सत्ता का लालच ,तानाशाही ने इंसान में इंसानियत खत्म कर दी है ।और बड़े बड़े देश भी स्वयं को महाशक्ति कहलाने के लिए दूसरे देशों पर हमले करने,  और सत्ता हथियाने में संलग्न रहते हैं। इंसान की प्रवृत्ति अधिक से अधिक पाने की लालसा में लिप्त रहती है। संतुष्टि और मानसिक शांति इंसान के स्वभाव में है ही नहीं। जिसके फलस्वरूप प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध लड़ा गया। द्वितीय विश्वयुद्ध में 6 और 9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर जो परमाणु बम फेंकने की गलती की थी उसे इतिहास कभी माफ नहीं कर सकता ।ईश्वर भी शायद उसी गलती की सजा आज अमेरिका को दे रहा है। दुनिया प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध से तो गुजर ही चुकी है। इससे पहले कि तीसरा विश्व युद्ध लड़ा जाता ईश्वर ने पूरी दुनिया को ऐसी महामारी के मुंह में ढकेल दिया है, जिसके सामने महा शक्तियों ने भी अपने घुटने टेक दिए हैं। इस महामारी को पूरी दुनिया तृतीय विश्व युद्ध की तरह ही देख रही है ।यह ईश्वर द्वारा इंसान को दी जा रही चेतावनी है।   अतः मैं पूरी दुनिया को यह समझाना चाहती हूं, कि हमारे अच्छे बुरे कर्म सब लौटकर हमारे ही पास आते हैं। और उसका अच्छा और बुरा परिणाम पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ता है ।अधिकतर लोगों की यह सोच भी है, हमने कुछ गलत नहीं किया तो फिर हमें क्यों सजा मिली ।मगर दूसरी तरफ हमें यह भी सोचना चाहिए कि हमारे सामने कोई अत्याचार और पाप हो रहा है और हम उसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं कर रहे, तो हम भी उस पाप के भागीदार बन जाते हैं ।यह तो सभी जानते हैं कि गेहूं के साथ घुन को भी  पिसना पड़ता है।   संत कबीर दास जी ने इन पंक्तियों में अपना दर्द व्यक्त किया है……    “चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोए। दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए”   कोरोना महामारी हमें चेतावनी देने और संदेश देने आई है। घर में रहे ,अपने परिवार के साथ रहे, अपने बुजुर्गों को अपने साथ रखें। वह हमारी जिम्मेदारी है ,उन्हें खुशी से निभाए। उन्हें लावारिस ना छोड़े, आज कोरोना ने इंसान को लावारिस कर दिया है, कितनी दुखद स्थिति होती है, जब आपको बीमारी में अपनों की सहानुभूति और सांत्वना भी ना मिले। अंतिम समय में आप अपने परिवार वालों को देख भी ना सके। अब मरने के बाद आपके प्रियजन आपको  कंधा भी ना दे सके, और लावारिस की तरह आपका अंतिम संस्कार कर दिया जाए !इसी तरह वृद्ध आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की भी यही स्थिति होती है ।                        सादा जीवन उच्च विचार की धारणाओं  के साथ जीवन यापन करें ।अपनी जरूरतों को कम करना तो इस महामारी ने सिखा ही दिया है।  अधिक धन कमाने की लालसा में बेईमानी और भ्रष्टाचार के पथ पर ना चले। आज हमारे सामने ऐसे अनगिनत लोग हैं जिन्होंने पैसे के लालच में अपने जीवन को नर्क बना लिया। एक कहावत है अंत भला तो सब भला! सुब्रतो राय , विजय माल्या, नीरव मोदी और राणा कपूर जैसे हजारों उदाहरण है, ,जिन्होंने पूरा जीवन भ्रष्टाचार के पैसों पर ऐश किया।  और अब बुढ़ापे में जेल में सड़ना पड़ रहा है ।इनकी सजा यहीं खत्म नहीं होगी इनके आगे आने वाली पीढ़ियों को भी इसकी सजा भुगतनी होगी।   अतः अपने बच्चों को संस्कारित करें। भारत को सुदृढ़ बनाएं। एक नए भारत का निर्माण करें ।अपनी जड़ों की तरफ लौटे। अंत में मैं उस महान शख्सियत यानी हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी जी का धन्यवाद करना चाहूंगी, जिनकी प्रखर बुद्धि ,कुशल नेतृत्व, ,नम्रता ,सादगी ,संस्कार युक्त जीवन, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक सोच ने कोविड-19 की इस संकट की घड़ी में जिस  समझदारी से देश को संभाल रखा है ,उसकी भारत ही नहीं पूरी दुनिया में सराहना हो रही है ।यह हमारी खुशकिस्मती है ,कि मोदी जी इस समय देश के प्रधानमंत्री हैं ।वह हम देशवासियों की प्रेरणा है ।हमारा संबल है। उनकी सकारात्मक सोच उनके सुविचारओं की शक्ति और हमारी एकता और सहयोग अवश्य ही हमारे देश को और पूरे विश्व को इस संकट की घड़ी से उबरने में सहयोग देंगे। मैं तहे दिल से उन सभी डॉक्टरों, नर्सों सुरक्षाकर्मियों, सेवा कर्मियों ,मीडिया, किसान और उन तमाम लोगों का धन्यवाद करती हूं ।जिनकी वजह से हम लोग घरों में सुरक्षित जीवन यापन कर रहे हैं ।और उनके जज्बे को सलाम करती हूं। हम होंगे कामयाब की भावना रखते हुए स्वस्थ रहें !सुरक्षित रहें !घर में रहे! ताकि हम कोरोना को बाहर कर सके।                           धन्यवाद                 जय हिंद                     पूर्णिमा ढिल्लन
Special Article कविता और कहानी